अज्ञात भय
अज्ञात भय को लेकर प्रश्न पुनः पुनः समक्ष आता है और अब नित्य ही ऐसा होने लगा है तो लगता है कि अज्ञात भय धीरे धीरे महामारी का रूप धारण करने लगा है।।अतः इस विषय पर आज ज्योतिषीय दृष्टिकोण को लिखने का प्रयास कर रहे है। अज्ञात भय पर बहुत ज्यादा लिखने की आवश्यकता है, अतः कोशिश रहेगा कि नित्य या दो दिन में एक लेख इसी विषय पर लिखे,
ज्योतिष में अज्ञात भय को किसी एक ग्रह से जोड़कर नहीं देखा जाता।।यह भय किसी बाहरी घटना से नहीं, बल्कि मन और अवचेतन पर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव और दबाव से जन्म लेता है।।अक्सर व्यक्ति स्वयं नहीं समझ पाता कि डर किस बात का है लेकिन भीतर लगातार आशंका बनी रहती है यही अज्ञात भय है।।इस भय की जड़ सबसे पहले चंद्रमा में होती है।।चंद्रमा मन भावनात्मक सुरक्षा और मानसिक संतुलन का ग्रह है।।
अतः जब चंद्र पीड़ित होते हैं तो मन बिना कारण के असुरक्षित महसूस करने लगता है।।ऐसे व्यक्ति को घबराहट होने लगती है नकारात्मक कल्पनाएँ स्वतः बनने लगती हैं और भविष्य को लेकर मन शांत नहीं रह पाता।।
रात के समय यह भय और गहरा हो जाता है।।चंद्र के साथ शनि राहु या केतु का संबंध इस स्थिति को और बढ़ा देता है किंतु यदि चंद्र संतुलित हों तो भय अधिक समय तक टिक नहीं पाता।।चंद्र के बाद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राहु की होती है क्योंकि राहु वास्तविक भय पैदा नहीं करता वह भय को बढ़ाता है।।राहु के प्रभाव में व्यक्ति को लगता है कि कुछ गलत होने वाला है, लेकिन क्या यह स्पष्ट नहीं होता है और छोटी सी आशंका बड़ी चिंता बन जाती है।।भविष्य की कल्पनाएँ डरावनी होने लगती हैं और मन बार-बार उसी दिशा में घूमता रहता है।।राहु यदि चंद्र या लग्न से जुड़ा हो या अष्टम या द्वादश भाव में हो तो यह भय और अधिक फैल जाता है।।शनि इस भय को एक अलग रूप देते हैं शनि डर नहीं दिखाते हैं अपितु वह सुरक्षा का भाव छीन लेते हैं क्योंकि जब शनि पीड़ित होते हैं, तो व्यक्ति को भविष्य अस्थिर लगता है।।आर्थिक सामाजिक या पारिवारिक स्तर पर एक गहरी असुरक्षा जन्म लेती है।।अकेलापन बढ़ता है और मन में यह भावना आने लगती है कि सब कुछ हाथ से निकल सकता है।।साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि की महादशा अंतर्दशा में यह अनुभव अधिक स्पष्ट होता है।।शनि का भय धीरे-धीरे भीतर जमता जाता है और लंबे समय तक बना रहता है।।
केतु इस भय को शब्दों से परे ले जाते हैं।।केतु भय को स्पष्ट नहीं करते वे उसे शून्यता में बदल देते हैं।।मन भारी लगता है जीवन से जुड़ाव कम होने लगता है और अस्तित्व से जुड़े प्रश्न उठने लगते हैं।।कई बार मृत्यु या शून्य का भय भी इसी कारण आता है।।केतु यदि चंद्र के साथ हों या चतुर्थ अथवा द्वादश भाव में हों तो यह स्थिति और गहरी हो जाती है।।यह भय दिखाई नहीं देता लेकिन भीतर लगातार मौजूद रहता है।।
अष्टम भाव भी अज्ञात भय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।।अष्टम भाव अवचेतन, मृत्युबोध और अचानक होने वाली घटनाओं से जुड़ा होता है।।यदि इस भाव में पाप ग्रह हों अष्टमेश पीड़ित हो या अष्टम भाव की दशा चल रही हो तो व्यक्ति को लगता है कि कोई अनजानी विपत्ति आने वाली है किन्तु क्या और कबयह स्पष्ट नहीं होता, लेकिन मन तैयार नहीं रह पाता।।द्वादश भाव इस भय को नींद और एकांत में सक्रिय करता है।।रातमें भय होना और अकेलेपन में घबराहट होना या नींद में भय दिखाई देना इसी का संकेत है।।यह भय बाहर से नहीं अपितु भीतर से उठता है।।समग्र रूप से देखा जाए तो अज्ञात भय कोई मानसिक कमजोरी नहीं है अपितु यह चंद्र, राहु, शनि और केतु की संयुक्त प्रतिक्रिया है जो अवचेतन भावों से जुड़ जाती है और जब मन का संतुलन टूटता है और अवचेतन सक्रिय हो जाता है तब यह भय आकार लेता है।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है।आने वाले लेखों में इस पीड़ा के निदान के उपाय पर भी लिखने का प्रयास रहेगा।।
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