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Showing posts from April, 2026

भ्रमित और आकस्मिक दो राहु के प्रमुख अस्त्र हैं।।

भ्रमित और त्वरित दो शब्दों में राहु का सारा बल और चरित्र छिपा हुआ है।। राहु जिस भाव में स्थित होता है जिस भाव से संबंध बनाता है वहां पर अकस्मात परिणाम देता है।। अतः भ्रमित और आकस्मिक दो राहु के प्रमुख अस्त्र हैं।। जब भी राहु की दशा,महादशा,अंतर्दशा प्रारंभ हो तो भ्रम से सर्वथा बचने का प्रयास करें और आवेग को अपने जीवन से निकाल दें।। तीव्रता,अभी,आज ही,बिल्कुल आदि शब्दों का प्रयोग और चिंतन बंद कर दें।। राहु पर विभिन्न ग्रहों का प्रभाव विभिन्न फल उत्पन्न करता है।। जिस भाव में राहु स्थित है उस भाव से संबंधित रिश्ते असहज होने लगते हैं।। प्राप्ति में बाधा और भ्रम का समावेश होने लगता है।। इसके निदान के लिए शास्त्र ने ही बताया है कि राहु को मंगल कंट्रोल कर लेता है गुरू के समक्ष सरल हो जाता है  और बुद्धि के द्वारा इसका परिवर्तन संभव है।। अतः नित्य व्यायाम करें।। कच्ची जमीन या घास पर पैदल चलें।। रात्रि में देर से भोजन न करें।। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करने का नियम बनाए।। लेखन का नियम अवश्य अपना लें।। यदि भाग्यवश अच्छे गुरू या आचार्य का सानिध्य प्राप्त हो जाए तो स्वयं का सौभाग्य समझें।। अच्छे स...

मानसिक तनाव,अवसाद आदि के मूल में चंद्र व बुध

आजकल ज्योतिषीय समाधान के लिए मिलने वाले अधिकतर लोगों का प्रश्न मानसिक तनाव,अवसाद, एंजाइटी इत्यादि को लेकर होता हैं। प्रत्यक्ष रूप से कई लोगों का प्रश्न शिक्षा, कैरियर, पारिवारिक क्लेश आदि आदि प्रश्नों के रूप में सामने आता है, अधिकतर लोगों इन प्रश्नों के मूल में भी मानसिक तनाव,अवसाद, एंजाइटी आदि ही निहित होता है, तो आज इन्हीं प्रश्नों का ज्योतिषीय आंकलन करते है..... मानसिक तनाव हमेशा बाहर की परिस्थितियों से नहीं आता अपितु इसका सीधा संबंध हमारे भीतर के मन और विचारों से होता है।।ज्योतिष में मन का संबंध चंद्र से और सोच विचार का संबंध बुध से माना जाता है।।जब ये दोनों संतुलित रहते हैं तो व्यक्ति शांत और स्पष्ट रहता है लेकिन जब इनमें असंतुलन होता है तो तनाव बढ़ने लगता है।। चंद्र मन का प्रतिनिधित्व करता है।।यह हमारी भावनाओं संवेदनशीलता और यादों से जुड़ा होता है।।यदि चंद्र कमजोर हो जाए तो व्यक्ति छोटी छोटी बातों को भी दिल से लगाने लगता है।।वह जल्दी दुखी होता है पुरानी बातों को पुनः पुनः याद करता है और भीतर एक हल्की बेचैनी बनी रहती है जिसके कारण यही धीरे धीरे मानसिक तनाव बन जाती है।। बुध विचारों...

केतु भाग 2

ज्योतिष शास्त्र में केतु को प्रायः केवल विच्छेद औरवैराग्य का ग्रह मान लिया जाता है परंतु केतु का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है।।यह केवल दूर करने वाला नहीं बल्कि भीतर की ओर मोड़ने वाला ग्रह है।।यह व्यक्ति की चेतना को बाहरी जगत से हटाकर अंदर की गहराइयों में ले जाता है।।केतु का स्वभाव ही पृथकता का है।।जहाँ अन्य ग्रह व्यक्ति को समाज संबंध, उपलब्धि की ओर प्रेरित करते हैं वहीं केतु इन सबके बीच एक अदृश्य दूरी बना देता है।। जब केतु कुंडली के प्रमुख भावों प्रथम चतुर्थ पंचम अष्टम या द्वादश में स्थित होता है तो व्यक्ति का स्वभाव भीतर की ओर झुकने लगता है।।यह अंतर्मुखता केवल किसी भय या कमजोरी का परिणाम नहीं होती बल्कि एक गहन आंतरिक जागरूकता का संकेत भी देती है।।ऐसा व्यक्ति बाहर से शांत संयमित दिखाई देता है।।उसे भीड़ दिखावा और बाहरी आकर्षणों में सहजता नहीं मिलती।।वह अपने अनुभवों को भीतर ही जीता है और अपने विचारों को गहराई में समझने का प्रयास करता है।।यही कारण है कि वह कम बोलता है परंतु जो समझता है वह अत्यंत गहरा होता है।।केतु की यह प्रवृत्ति व्यक्ति को आत्म आकलन की अद्भुत क्षमता प्रदान करती...