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Showing posts from February, 2026

राहु की महादशा

ज्योतिष के जानकारों और छात्रों के लिए सबसे रोचक विषय अगर कोई है तो वह है राहु। जिन लोगों को ज्योतिष की गहरी जानकारी नहीं होती, उनके भीतर भी राहु को लेकर एक अलग तरह का भय देखने को मिलता है। सच तो यह है कि राहु ज्योतिष का सबसे रहस्यमयी ग्रह माना जाता है। इसे अंधकार का प्रतीक भी कहा गया है। कई लोग राहु को कलयुग का राजा तक कहते हैं, क्योंकि कलयुग में झूठ, नकारात्मकता और धोखे का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। आज हम बात कर रहे हैं राहु की महादशा की। राहु की महादशा पूरे 18 वर्ष की होती है। जीवन के ये 18 वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। विषय बहुत विस्तृत है, इसलिए इसे दो भागों में समझना उचित रहेगा। इस भाग में चर्चा करेंगे कि राहु महादशा शुरू होते ही जातक के जीवन में किस प्रकार के परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। राहु भ्रम का कारक है। महादशा के प्रारंभ में अक्सर जातक मानसिक रूप से भ्रमित होने लगता है। उसे लगने लगता है कि वही सही है और बाकी सभी गलत हैं। एक प्रकार का आत्मविश्वास और जिद उसके स्वभाव में आ सकती है। राहु का स्वभाव झूले की तरह है—एक पल में ऊँचाइयों पर पहुंचा देना और अगले ही पल नीचे ...

बारहवें भाव में स्थित केतु

बारहवें भाव में स्थित केतु को  अनुकूल या प्रतिकूल कह देना सही नहीं होता क्योंकि इसका फल पूरी तरह भाव स्वामी दृष्टि और दशा पर निर्भर करता है।। बारहवाँ भाव व्यय हानि एकांत निद्रा विदेश अस्पताल कारावास गुप्त जीवन और मोक्ष से संबंधित है।।केतु स्वभाव से ही त्याग  विच्छेद और पूर्वजन्मी संस्कारों का ग्रह है इसलिए बारहवें भाव में यह अपने मूल स्वभाव के अनुरूप कार्य करता है।।इस स्थिति में जातक के जीवन में अनियंत्रित या अनपेक्षित व्यय स्पष्ट रूप से देखा जाता है।।यह व्यय विलास पर नहीं बल्कि ऐसी परिस्थितियों पर होता है जिन्हें टाला नहीं जा सकता जैसे उपचार, स्थान परिवर्तन, विदेश संबंधी खर्च, एकांत जीवन या सेवा कार्य और यदि द्वितीय और एकादश भाव कमजोर हों तो धन संचय कठिन हो जाता है पर यह स्थिति अपने आप में दरिद्र योग नहीं बनाती।। बारहवें भाव का केतु जातक को अकेले रहने की प्रवृत्ति देता है।।यह सामाजिक असफलता नहीं अपितु समाज से अरुचि होती है।।व्यक्ति भीड़ से बचता है निजी जीवन को गोपनीय रखना चाहता है और सीमित संपर्क पसंद करता है।।कार्यक्षेत्र में ऐसे जातक पर्दे के पीछे काम करने वाले, शोध, लेखन, ...

आत्मविश्वास ज्योतिष

आत्मविश्वास कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त किया जाए।। यह मनुष्य की चेतना की वह स्थिति है  जिसमें वह स्वयं पर अपने निर्णयों पर और अपने अस्तित्व पर भरोसा कर पाता है।। जब यह शक्ति अत्यधिक कम हो जाती है तब व्यक्ति भीतर से टूटने लगता है।। वह निर्णय लेने से डरता है अपने विचारों को महत्व नहीं देता और बाहरी परिस्थितियों को स्वयं से अधिक शक्तिशाली मानने लगता है।। ज्योतिष इस अवस्था को ग्रहों की दुर्बल या विकृत स्थिति से जोड़कर देखता है  जबकि वृत्तिगत दृष्टि इसे मानसिक आदतों, पुराने अनुभवों और आत्म-संवाद के परिणाम के रूप में समझाती है।। दोनों दृष्टियाँ अलग नहीं हैं बल्कि एक ही सत्य को दो स्तरों पर स्पष्ट करती हैं।। जब आत्मविश्वास अत्यधिक गिर जाता है तब उसके कुछ स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते हैं।। व्यक्ति स्वयं पर संदेह करने लगता है।। निर्णय लेते समय भय होता है अतःबार-बार दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता महसूस होती है।। भीतर हीन भावना और अपराधबोध सक्रिय रहता है जिसके कारण से भविष्य को लेकर अनावश्यक आशंका बनी रहती है और प्रयास करने से पहले ही मन हार मान लेता है।। ज्योतिषीय दृष्टि से आत्...

छठे भाव में मंगल राहु की युति

जन्म कुंडली के छठे भाव में राहु अथवा सूर्य स्थित हो तो ऐसा जातक किसी का दबाव और प्रभाव नहीं मानता है और न ही किसी के प्रभाव से प्रभावित होता है।। मंगल देव स्थित हो तो यह स्थिति और भी ज्यादा वृहत रूप से फलित होती है।।मंगल देवता के स्थित होने पर ऐसे जातक को प्रभावित करना सामने वाले के भाग्य में कमी और कष्टों में वृद्धि भी कर देता है।। ऐसा जातक शत्रुहंता होता है अर्थात उसकी हानि की इच्छा रखने वाला स्वयं हानि उठाता है।। सूत्र स्वतः पूर्ण सिद्ध है और 100 % फलित होता है बस चलित में स्थान परिवर्तित नहीं होना चाहिए।। डॉ सुशील कश्यप 

राहु की महादशा: एक ज्योतिषीय विश्लेषण

ज्योतिष के जानकारों और छात्रों के लिए सबसे रोचक विषय अगर कोई है तो वह है राहु। जिन लोगों को ज्योतिष की गहरी जानकारी नहीं होती, उनके भीतर भी राहु को लेकर एक अलग तरह का भय देखने को मिलता है। सच तो यह है कि राहु ज्योतिष का सबसे रहस्यमयी ग्रह माना जाता है। इसे अंधकार का प्रतीक भी कहा गया है। कई लोग राहु को कलयुग का राजा तक कहते हैं, क्योंकि कलयुग में झूठ, नकारात्मकता और धोखे का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। आज हम बात कर रहे हैं राहु की महादशा की। राहु की महादशा पूरे 18 वर्ष की होती है। जीवन के ये 18 वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। विषय बहुत विस्तृत है, इसलिए इसे दो भागों में समझना उचित रहेगा। इस भाग में चर्चा करेंगे कि राहु महादशा शुरू होते ही जातक के जीवन में किस प्रकार के परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। राहु भ्रम का कारक है। महादशा के प्रारंभ में अक्सर जातक मानसिक रूप से भ्रमित होने लगता है। उसे लगने लगता है कि वही सही है और बाकी सभी गलत हैं। एक प्रकार का आत्मविश्वास और जिद उसके स्वभाव में आ सकती है। राहु का स्वभाव झूले की तरह है—एक पल में ऊँचाइयों पर पहुंचा देना और अगले ही पल नीचे ...

अष्टम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति का प्रभाव

अष्टम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति पर लिखने का प्रयास प्रारंभ किया है।। अष्टम भाव की स्थिति अत्यंत गूढ़ और जटिल होने के कारण इस लेख को लिखना सरल नहीं है फिर भी लिखने का प्रयास कर रहे है, अष्टम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति को सामान्यतः सहज फल देने वाला ग्रह नहीं माना गया है  परन्तु इसे केवल निर्बल या निष्फल मानना भी उचित नहीं है।।अष्टम भाव आयु आकस्मिक घटनाएँ गुप्त धन रहस्य, रोग भय  परिवर्तन और गहन मानसिक प्रक्रियाओं से संबंधित होता है।। जब गुरु जैसे धर्म, ज्ञान, विस्तार और संरक्षण देने वाले ग्रह भाव में स्थित होते है तब इसके परिणाम अति जटिल हो जाते हैं।।अष्टम भाव का गुरु व्यक्ति के जीवन में स्थिरता की अपेक्षा उतार-चढ़ाव अधिक देता है।। ऐसे जातक को जीवन में अचानक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, विशेषकर शिक्षा विश्वास आर्थिक सुरक्षा और संबंधों के क्षेत्र में विशेष सावधानी रखनी जरूरी हो जाती है।।गुरु यहाँ अपने स्वभाव के अनुसार रक्षा करता है पर वह रक्षा संकट को रोककर नहीं बल्कि संकट की सीमा तय करके करता है।।अष्टम में स्थित गुरु दीर्घायु की रक्षा करता है पर पूर्ण स्वास्थ्य क...

नित्य सुनाई दिखाई देने वाले भ्रामक ज्योतिषीय सूत्र: राहु दस में दुनिया बस में

राहु दस में दुनिया बस में यह वाक्य सुनने में बहुत अच्छा  लगता है, पर जीवन की वास्तविकता इससे मेल नहीं खाती है क्योंकि व्यवहार में बार-बार देखा जाता है कि दशम भाव में राहु होने पर भी बहुत से लोग जीवन में कोई ठोस काम नहीं कर पाते।।वे सोचते बहुत हैं करना बहुत चाहते हैं पर उनका जीवन आगे नहीं बढ़ता और यही तथ्य इस कथन की सच्चाई पर सबसे बड़ा प्रश्न लगा देता है।। दशम भाव कर्म का भाव है और  यह बताता है कि व्यक्ति अपने जीवन में क्या करेगा और कैसे करेगा  राहु इस भाव में आकर कर्म को साफ नहीं करता, बल्कि उसे उलझा देता है व्यक्ति के मन में कई इच्छाएँ होती हैं, पर यह तय नहीं हो पाता कि सही दिशा कौन-सी है।।उसका आज कुछ करने का मन होता है कल कुछ और और इसी कारण प्रयास बिखर जाते हैं और कोई परिणाम नहीं मिलता है।।ऐसे अनेक जातक होते हैं जिनकी कुंडली में राहु दशम में है पर वे नौकरी में टिक नहीं पाते या बार-बार काम बदलते हैं।।व्यवसाय शुरू करते हैं पर उसे चला नहीं पाते।।समाज में पहचान बनाने की इच्छा रहती है, पर उसके लिए आवश्यक धैर्य और निरंतरता नहीं बन पाती अतः धीरे-धीरे हताशा बढ़ती है और व्यक्ति ...

ओवर थिंकिंग अर्थात विचारों का लगातार अनियंत्रित रूप या मानसिक समस्या पर ज्योतिषीय दृष्टिकोण

ओवर थिंकिंग अर्थात विचारों का लगातार और अनियंत्रित रूप से चलते रहना आज के समय में एक मानसिक समस्या मानी जाती है लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह कोई नई बात नहीं है।।शास्त्रीय ज्योतिष इसे मन,चित्त और बुद्धि के असंतुलन के रूप में देखता है अतः जब मन बार-बार भविष्य, आशंका, भय और कल्पनाओं में उलझ जाता है और वर्तमान क्षण से कट जाता है, तब व्यक्ति भीतर ही भीतर थकने लगता है जिसके कारण निर्णय लेने में कठिनाई होती है मन बेचैन रहता है और मानसिक शांति धीरे-धीरे कम होने लगती है।। मन का प्रतिनिधित्व चंद्रमा करता है जब चंद्रमा कमजोर होता है या राहु, शनि अथवा बुध के प्रभाव में आ जाता है, तब मन स्थिर नहीं रह पाता।।ऐसा व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को भी बार-बार सोचता है, एक ही विषय को कई बार मन में घुमाता है और किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता है चंद्रमा की यही अस्थिरता मानसिक तनाव की सबसे बड़ी जड़ बन जाती है।। बुध ग्रह विचार, तर्क और सोचने की क्षमता से जुड़ा हुआ है अतः जब बुध बहुत अधिक सक्रिय हो जाता है  राहु के साथ या शनि की दृष्टि में, तब सोच आवश्यकता से अधिक तेज हो जाती है।।व्यक्ति हर बात का जरूरत से...