आत्मविश्वास ज्योतिष
आत्मविश्वास कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त किया जाए।। यह मनुष्य की चेतना की वह स्थिति है जिसमें वह स्वयं पर अपने निर्णयों पर और अपने अस्तित्व पर भरोसा कर पाता है।। जब यह शक्ति अत्यधिक कम हो जाती है तब व्यक्ति भीतर से टूटने लगता है।। वह निर्णय लेने से डरता है अपने विचारों को महत्व नहीं देता और बाहरी परिस्थितियों को स्वयं से अधिक शक्तिशाली मानने लगता है।।
ज्योतिष इस अवस्था को ग्रहों की दुर्बल या विकृत स्थिति से जोड़कर देखता है जबकि वृत्तिगत दृष्टि इसे मानसिक आदतों, पुराने अनुभवों और आत्म-संवाद के परिणाम के रूप में समझाती है।। दोनों दृष्टियाँ अलग नहीं हैं बल्कि एक ही सत्य को दो स्तरों पर स्पष्ट करती हैं।।
जब आत्मविश्वास अत्यधिक गिर जाता है तब उसके कुछ स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते हैं।। व्यक्ति स्वयं पर संदेह करने लगता है।। निर्णय लेते समय भय होता है अतःबार-बार दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता महसूस होती है।। भीतर हीन भावना और अपराधबोध सक्रिय रहता है जिसके कारण से भविष्य को लेकर अनावश्यक आशंका बनी रहती है और प्रयास करने से पहले ही मन हार मान लेता है।।
ज्योतिषीय दृष्टि से आत्मविश्वास का सीधा संबंध सूर्य, मंगल, चंद्र और लग्न से होता है।। सूर्य आत्मसम्मान और आत्मबल का ग्रह है अतः जब सूर्य दुर्बल होता है, नीच अस्त या पापग्रहों से पीड़ित होता है अथवा षष्ठ अष्टम या द्वादश भाव में स्थित होता है तब व्यक्ति स्वयं को महत्वहीन समझने लगता है।। उसे अपने अधिकारों, समाज या सत्ता से भय महसूस होने लगता है।।
मंगल की दुर्बलता साहस और निर्णय शक्ति को कम कर देती है अतः व्यक्ति पहल करने से डरता है।। भीतर क्रोध होता है पर वह बाहर प्रकट नहीं हो पाता और दमन के रूप में मन को कमजोर करता है।।
चंद्र की पीड़ा आत्मविश्वास को स्थिर नहीं रहने देती कभी व्यक्ति स्वयं को सक्षम महसूस करता है, तो कभी बिल्कुल असहाय जिससे भावनात्मक निर्भरता बढ़ जाती है और मन दूसरों की प्रतिक्रिया से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता है।।
शनि का अत्यधिक प्रभाव व्यक्ति को स्वयं के प्रति कठोर बना देता है जिससे आत्म-आलोचना बढ़ जाती है।।व्यक्ति स्वयं को अयोग्य मानने लगता है और हर प्रयास में विलंब करता है।।
ज्योतिषीय उपायों की बात करें, तो यहाँ यह समझना आवश्यक है कि केवल मंत्र या बाहरी कर्म पर्याप्त नहीं होते।। सूर्य के लिए प्रातः जल अर्पित करते समय यदि मन में यह भाव रखा जाए कि मैं अपने अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ तो यह उपाय प्रभावी होता है।। रविवार को स्वच्छ वस्त्र धारण करना और आत्मसम्मान से जुड़े छोटे निर्णय स्वयं लेना सूर्य को भीतर से सशक्त करता है केवल जप नहीं आत्म-स्वीकृति का अभ्यास भी आवश्यक है।।
मंगल के संतुलन के लिए शारीरिक श्रम अत्यंत उपयोगी होता है।। नियमित पैदल चलना योग सूर्य नमस्कार या किसी भी रूप में शरीर को सक्रिय रखना मंगल की ऊर्जा को सही दिशा देता है।। दबे हुए क्रोध को पहचानना और उसे स्वस्थ रूप में व्यक्त करना भी आवश्यक है।।
चंद्र की शांति के लिए रात्रि में मोबाइल और सोशल मीडिया का सीमित उपयोगजल के पास कुछ समय बिताना और अपनी भावनाओं को लिखना मन को स्थिर करता है।।
शनि के लिए सबसे बड़ा उपाय स्वयं को दोष देना बंद करना है।। धीरे-धीरे, पर नियमित प्रयास करना और सेवा भाव अपनाना शनि की कठोरता को संतुलित करता है।।
वृत्तिगत दृष्टि से आत्मविश्वास बढ़ाने का पहला नियम यह है कि व्यक्ति अपने भीतर चलने वाली नकारात्मक आवाज को पहचानना सीखे।। जब मन कहे कि मैं नहीं कर सकता तो तुरंत यह प्रश्न करना चाहिए कि यह विचार तथ्य है या केवल आदत मात्र है।।
रोज़मर्रा के छोटे निर्णय स्वयं लेना आत्मविश्वास को धीरे-धीरे पुनः स्थापित करता है।। आत्मविश्वास सफलता से नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व स्वीकार करने से बढ़ता है।तुलना आत्मविश्वास की सबसे बड़ी शत्रु है।। दूसरों से तुलना करने के स्थान पर अपनी प्रगति को अपने ही अतीत से तुलना करना अधिक स्वस्थ होता है।।शरीर और मन का संबंध भी यहाँ महत्वपूर्ण है।। सीधा बैठना धीमी और स्पष्ट वाणी और आँखों में आँख डालकर बात करना इनसे मन की वृत्ति स्वतः बदलने लगती है।। शरीर की मुद्रा बदलते ही चेतना का स्वर बदल जाता है।।
प्रतिदिन स्वयं से एक वाक्य कहना उपयोगी होता है
मैं पूर्ण नहीं हूँ, पर मैं सक्षम हूँ।।यह एक साधारण वाक्य नहीं बल्कि आत्म-संवाद की दिशा बदलने का अभ्यास है।।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सत्य समझना आवश्यक है।।आत्मविश्वास ग्रह नहीं देतेग्रह केवल यह दिखाते हैं कि चेतना कहाँ कमजोर हो गई है।। उपाय ग्रहों के साथ साथ चेतना की वृद्धि के भी होने चाहिए।।अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि जब आत्मविश्वास अत्यधिक गिर जाए, तब केवल ज्योतिषीय उपाय या केवल मनोवैज्ञानिक अभ्यास पर्याप्त नहीं होते।। ज्योतिष चेतना की स्थिति को स्पष्ट करता है और वृत्तिगत अभ्यास उस चेतना को बदलने का मार्ग देता है।।जो व्यक्ति यह समझ लेता है किमैं ग्रहों का परिणाम नहीं हूँ ग्रह मेरे भीतर की अवस्था का संकेत हैं वह धीरे-धीरे अपना आत्मविश्वास पुनः प्राप्त कर लेता है।।
जितना जान पाया लिखने का प्रयास किया है कुछ भी घुमाने छिपाने की वृति ही नहीं है।।अब अच्छा लिख पाया या परिश्रम व्यर्थ हो गया यह निर्णय तो आपका स्वतंत्र अधिकार है।।
डॉ सुशील कश्यप
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