वैदिक ज्योतिष और नवम भाव
विषय अत्यंत सरल है किन्तु बहुत बार इस विषय पर लिखने का आग्रह प्राप्त होने पर लिखने का प्रयास किया है।।
वैदिक ज्योतिष में नवम भाव को भाग्य, धर्म, गुरु, तीर्थ यात्रा, पुण्य, शास्त्र ज्ञान और ईश्वरीय कृपा का भाव माना गया है।।यह भाव केवल भौतिक सौभाग्य का ही संकेत नहीं देता बल्कि जीवन में मिलने वाले अदृश्य संरक्षण मार्गदर्शन और पूर्व जन्म के संचित पुण्यों का भी प्रतिनिधित्व करता है।।द्वादश भाव को व्यय, त्याग, विदेश, एकांत, आश्रम, अस्पताल, कारागार, शय्या सुख, आध्यात्मिक साधना और मोक्ष का भाव माना गया हैइसलिए जब भाग्येश इस भाव में स्थित होता है तो भाग्य की अभिव्यक्ति सामान्य रूप से प्रत्यक्ष नहीं होती।।कई बार ऐसा लगता है कि व्यक्ति बहुत प्रयास कर रहा है पर उसे तुरंत वैसा परिणाम नहीं मिल रहा जैसा वह चाहता है।।परंतु समय आने पर परिस्थितियाँ अचानक उसके पक्ष में बदलती दिखाई देती हैं।।यह इस स्थिति का एक सूक्ष्म पक्ष है कि भाग्य कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करता है।।द्वादश भाव दूरस्थ स्थानों और विदेश से भी संबंधित माना गया है।।इसलिए भाग्येश का यहाँ स्थित होना यह संकेत दे सकता है कि व्यक्ति को अपने जन्म स्थान से दूर जाकर अधिक अवसर प्राप्त हों।।अनेक बार विदेश यात्रा विदेशी संपर्क या दूर स्थानों से जुड़ी परिस्थितियाँ जीवन में उन्नति का कारण बन सकती हैं।।द्वादश भाव त्याग दान और सेवा से भी जुड़ा हुआ है।।इसलिए इस स्थिति वाले जातक के भीतर परोपकार दान या सेवा की भावना भी देखी जा सकती है।।कई बार ऐसे लोग आश्रमों तीर्थ स्थलों,आध्यात्मिक संस्थाओं या साधना से जुड़े वातावरण की ओर आकर्षित होते हैं।।इनके जीवन में गुरु या मार्गदर्शक की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।। हालाँकि यह भी समझना आवश्यक है कि केवल भाग्येश का द्वादश भाव में होना ही अंतिम परिणाम तय नहीं करता है अपितु ग्रह की शक्ति उसकी राशि नवांश स्थिति, अन्य ग्रहों की दृष्टि और संपूर्ण कुंडली का संतुलन भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।।यदि भाग्येश नीच का हो शत्रु राशि में हो अस्त हो या पाप ग्रहों से अधिक पीड़ित हो तो व्यक्ति को भाग्य के फल मिलने में विलंब हो सकता है।। कभी-कभी अधिक व्यय अनियोजित खर्च या जीवन की दिशा को लेकर अस्थिरता भी देखी जा सकती है।।इसके विपरीत यदि भाग्येश बलवान हो स्वगृही हो, उच्च का हो या शुभ ग्रहों की दृष्टि प्राप्त कर रहा हो तो यह स्थिति अच्छे फल भी दे सकती है।।ऐसे जातक को विदेश से लाभ तीर्थयात्राओं का अवसर आध्यात्मिक झुकाव और कई बार अप्रत्याशित रूप से मिलने वाली सहायता प्राप्त हो सकती है।।कई बार यह अनुभव भी होता है कि कठिन समय में किसी न किसी रूप में सहायता मिल जाती है मानो कोई अदृश्य संरक्षण साथ चल रहा हो।।इस प्रकार भाग्येश का द्वादश भाव में होना केवल हानि या व्यय का योग नहीं माना जाना चाहिए।।वास्तव में यह भाग्य को एक सूक्ष्म और आंतरिक दिशा में ले जाने वाली स्थिति भी हो सकती है।।यह व्यक्ति को यह अनुभव करा सकती है कि जीवन का वास्तविक सौभाग्य केवल धन और वैभव में नहीं,बल्कि धर्म, सेवा, त्याग और ईश्वरीय कृपा में भी निहित होता है।।
विषय सरल होने पर त्रुटि की संभावना अधिक होती है ऐसा मेरा निजी अनुभव है वैसे भी मनुष्य अल्पज्ञ ही होता है सर्वज्ञ हो ही नहीं सकता है।शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब भगवान शिव है।।
डॉ सुशील कश्यप
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