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Showing posts from March, 2026

क्या बुध की दशा में भी मानसिक तनाव हो सकता है???

क्या बुध की दशा में भी मानसिक तनाव हो सकता है??? जब भी मन की चंचलता की बात होती है, तो लोग सीधे चंद्रमा को जिम्मेदार मान लेते है लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है।।चंद्रमा मन को अनुभव कराता है जबकि बुध उस अनुभव को सोच में बदलता है।।इसलिए मन की असली हलचल बुध से भी जुड़ी होती है।।आपने कभी ध्यान दिया होगा मन कभी कभी बिना रुके चलता रहता है।।एक विचार आया फिर दूसरा फिर तीसरा और कुछ ही समय में मन थकने लगता है।।यही मानसिक चंचलता है और यह तभी अधिक होती है जब बुध असंतुलित हो।।बुध का स्वभाव ही चलायमान है।।वह स्थिर नहीं रह सकता इसलिए जिन लोगों का बुध सक्रिय होता है उनका दिमाग हमेशा कुछ न कुछ सोचता रहता है।।वे जल्दी समझते हैं जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं और हर चीज़ को जल्दी पकड़ लेते हैं।।यह एक गुण है लेकिन तभी तक जब तक उसमें संतुलन है।।समस्या तब शुरू होती है जब सोच की गति तो तेज हो जाती है लेकिन उसमें दिशा नहीं रहती।।फिर वही मन हर छोटी बात को बार-बार सोचता है।।एक निर्णय लिया फिर उस पर संदेह हुआ फिर दूसरा विचार आया।।यह प्रक्रिया चलती रहती है और धीरे धीरे व्यक्ति खुद ही अपने विचारों में उलझ जाता है।।यदि बु...

शुक्र राहु की युति

राहु शुक्र की युति पर लिखना प्रारंभ किया है कुछ समय पश्चात केतु शुक्र की युति पर भी लिखने का प्रयास रहेगा।। शुक्र और राहु की युति को इच्छा-प्रधान युति माना जाता है क्योंकि यहाँ प्राकृतिक सुखकारक ग्रह शुक्र पर छाया ग्रह राहु का प्रभाव जुड़ जाता है।।यह युति व्यक्ति की कामना आकर्षण संबंधों की समझ भोग की वृत्ति और संतोष की क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।। इसे समझने के लिए शुक्र और राहु दोनों की ग्रह प्रकृति, उनकी स्थिति, भाव संबंध और दशा प्रभाव को  देखना आवश्यक होता है।। शुक्र स्वभावतः सौम्य ग्रह है और भोग सुख स्त्री प्रेम विवाह  कला सौंदर्य विलास और सामाजिक सामंजस्य का कारक है।। राहु स्वयं कोई भोग नहीं देता बल्कि जिस ग्रह के साथ जुड़ता है उसकी इच्छाओं को असामान्य, अतृप्त और सीमा रहित बना देता है इसलिए शुक्र राहु युति में सुख की इच्छा सामान्य नहीं रहती बल्कि तीव्र बार-बार बदलने वाली और संतोष से रहित हो जाती है।। इस युति में राहु शुक्र की स्वाभाविक मर्यादा को ढक देता है जिसके कारण व्यक्ति आकर्षण और वास्तविक संबंध के बीच अंतर नहीं कर पाता ज्योतिषीय दृष्टि से यह युति भ्र...

विच्छेदात्मक ग्रह का मन पर प्रभाव

क्यूं कोई भागकर शादी करता है ? क्यों कोई वैरागी हो जाता है ? क्यूं कोई लड़कर घर से भाग खड़ा होता है?  सूर्य शनि राहु इन तीनों को अलगाव वादी ग्रह बोला है। सूर्य तेज है ,अग्नि है ,राजा है,उससे मिलना कठिन है ,उसके पास रहना कठिन है ,आपको तेज सहन करना होगा , अन्यथा अस्त से सभी परिचित है। शनि सूर्यनंदन ही है परन्तु ठंडा ,सबसे दूर ,एकांत , अलग थलग ,मायूस ,उदासीन ग्रह है ,(melancholic) . राहु से मानसिक भय होता है, कोई भी ग्रह उससे युति में नहीं मिलना चाहते अन्यथा वह समझते है राहु जब उनके साथ मिल जाता है तो उनके कारक के साथ कैसे खेल खेलता है। 12 राशियां, 12 लग्न, ओर नवग्रह ,थोड़ा बहुत नक्षत्र भी ये सब मिलकर व्यक्ति को एक विशेष व्यक्तित्व देते है। जो उसे एक ग्रह की प्रधानता देते है जिसके कारण उस विशेष ग्रह की आदतें ,स्वभाव , व्यक्तित्व ,वेशभूषा हर चीज जातक के ऊपर दिखती है। लग्न ,चंद्र ,सूर्य से सुदर्शन चक्र बनता है । परन्तु कुछ ग्रंथों में विशेषकर लग्न ओर चंद्र से फलित करने को बोला है। कई जगह तो दशा साधन भी लग्न ओर चंद्र से जो बलवान हो उससे ही करते हैं । नाड़ी कहती है लग्न ओर चंद्र से जो बलव...

राहु और केतु के फलित में मौलिक अंतर

अक्सर यह प्रश्न किया जाता है कि राहु और केतु में से कौन अधिक कष्ट देता है। राहु ज्यादा खतरनाक है या केतु आदि आदि, ऊपरी दृष्टि से देखने पर लगता है कि राहु अधिक खतरनाक है पर अनुभव बताता है कि केतु का कष्ट अधिक गहरा और मौन होता है।। राहु इच्छा पैदा करता है वह मनुष्य को कुछ पाने की आग में झोंक देता है,नाम, धन, पद, संबंध  सब की लालसा राहु से जुड़ी होती है।। राहु भ्रम देता है, छल देता है, भटकाता है।।पर वह जीवन के प्रति आसक्ति बनाए रखता है।। इसलिए राहु के कष्ट में भी मनुष्य जीने की चाह नहीं छोड़ता।। केतु ठीक उलटा कार्य करता है।।वह इच्छा नहीं बढ़ाता, वह इच्छा को काट देता है।।केतु जिस भाव से जुड़ता है, वहाँ से रस छीन लेता है।। जो पहले प्रिय था, वही व्यर्थ लगने लगता है।।जो पास है, उसमें अर्थ नहीं दिखता।। और जो दूर है, उससे जुड़ने की इच्छा भी नहीं रहती।। यही केतु का कष्ट है,वह बाहर से नहीं, भीतर से तोड़ता है।।मनुष्य भीड़ में होकर भी अकेला हो जाता है।। राहु परेशान करता है तो मनुष्य लड़ता है।।केतु परेशान करता है तो मनुष्य चुप हो जाता है,और यही चुप्पी सबसे भारी पड़ती है।। राहु का दुख दिखाई देता ...

केतु

केतु को ज्योतिष में एक ऐसा ग्रह माना गया है जो बाहर से कम और भीतर से अधिक काम करता है।।इसका असर शरीर के दिखने वाले भाग से ज्यादा हमारे नाड़ी तंत्र और मन के सूक्ष्म स्तर पर पड़ता है।।यही कारण है कि केतु का प्रभाव समझना थोड़ा कठिन होता है क्योंकि यह सीधे दिखाई नहीं देता, बल्कि अनुभव होता है।।केतु का संबंध हमारे अवचेतन मन से होता है।।यह मन के गहरे हिस्सों को सक्रिय करता है जहाँ हमारी पुरानी स्मृतियाँ संस्कार और अनदेखे भाव छिपे होते हैं।।जब केतु सक्रिय होता है, तो नाड़ी तंत्र कभी बहुत तेज प्रतिक्रिया देता है और कभी बिल्कुल शांत हो जाता है।।इसी कारण व्यक्ति कभी अत्यधिक संवेदनशील और कभी एकदम अलग-थलग महसूस कर सकता है।। नाड़ियों की बात करें तो इड़ा पिंगला और सुषुम्ना इन तीनों पर केतु का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।।यदि केतु चंद्रमा से जुड़ जाए तो मन में बेचैनी,अधिक सोच और भावनात्मक उतार चढ़ाव देखने को मिलते हैं।।यदि सूर्य या मंगल से संबंध हो तो चिड़चिड़ापन जल्दी प्रतिक्रिया देना और अंदर एक तरह की घबराहट बनी रह सकती है।।लेकिन केतु का सबसे गहरा असर सुषुम्ना नाड़ी पर माना गया है।।यही वह मार्ग है जो ध...

दशम भावस्थ चंद्रमा

कई लोगों का प्रश्न है कि चंद्रमा दशम भाव में हो तो ऐसा जातक अवसर गंवा देता है या बनते काम बिगाड़ लेता है यह बात पूरी तरह सही नहीं है लेकिन इसमें थोड़ा सा सच जरूर छिपा है।।दशम भाव हमारे काम, करियर, प्रतिष्ठा और समाज में हमारी पहचान से जुड़ा होता है।।वहीं चंद्रमा हमारे मन और भावनाओं का कारक है।।जब चंद्रमा इस भाव में आता है तो एक सीधी सी बात बनती है कि ऐसा व्यक्ति अपने काम को मन से करता है।।अब यहीं से कहानी शुरू होती है।।चंद्रमा बहुत जल्दी बदलने वाला ग्रह है अतः जैसे चंद्रमा रोज अपना रूप बदलता है, वैसे ही इस व्यक्ति का मन भी जल्दी-जल्दी बदल सकता है।। कभी बहुत उत्साह आता है तो कभी अचानक मन हट जाता है।।इसी वजह से कई बार वह अच्छा मौका होते हुए भी उसे पकड़ नहीं पाता।।बाहर से देखने वाले को लगता है कि यह व्यक्ति मौका गंवा रहा है  या अपने ही काम को बिगाड़ रहा है।। लेकिन अंदर की सच्चाई कुछ और होती है असल में उस समय उसका मन तैयार नहीं होता।।मान लीजिए किसी को अच्छा काम मिला लेकिन अंदर से डर है या मन में शक है या संतोष नहीं है तो वह व्यक्ति खुद ही पीछे हट जाएगा जिसके कारण बाद में लगेगा कि मौका च...

वैदिक ज्योतिष और नवम भाव

विषय अत्यंत सरल है किन्तु बहुत बार इस विषय पर लिखने का आग्रह प्राप्त होने पर लिखने का प्रयास किया है।।  वैदिक ज्योतिष में नवम भाव को भाग्य, धर्म, गुरु, तीर्थ यात्रा, पुण्य, शास्त्र ज्ञान और ईश्वरीय कृपा का भाव माना गया है।।यह भाव केवल भौतिक सौभाग्य का ही संकेत नहीं देता बल्कि जीवन में मिलने वाले अदृश्य संरक्षण मार्गदर्शन और पूर्व जन्म के संचित पुण्यों का भी प्रतिनिधित्व करता है।।द्वादश भाव को व्यय, त्याग, विदेश, एकांत, आश्रम, अस्पताल, कारागार, शय्या सुख, आध्यात्मिक साधना और मोक्ष का भाव माना गया हैइसलिए जब भाग्येश इस भाव में स्थित होता है तो भाग्य की अभिव्यक्ति सामान्य रूप से प्रत्यक्ष नहीं होती।।कई बार ऐसा लगता है कि व्यक्ति बहुत प्रयास कर रहा है पर उसे तुरंत वैसा परिणाम नहीं मिल रहा जैसा वह चाहता है।।परंतु समय आने पर परिस्थितियाँ अचानक उसके पक्ष में बदलती दिखाई देती हैं।।यह इस स्थिति का एक सूक्ष्म पक्ष है कि भाग्य कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करता है।।द्वादश भाव दूरस्थ स्थानों और विदेश से भी संबंधित माना गया है।।इसलिए भाग्येश का यहाँ स्थित होना यह संकेत दे सकता है कि व्यक्ति को...

लग्न में उपस्थित केतु

केतु पर जितना भी लिख दिया जाए कुछ न कुछ अधूरा रह ही जाता है।।बहुत से मित्रों ने प्रथम भाव में केतु चंद्र की युति पर लिखने का आग्रह किया है।। जब जन्मकुंडली के प्रथम भाव अर्थात लग्न में केतु और चंद्रमा की युति बनती है तब यह योग व्यक्ति के स्वभाव व्यक्तित्व और मन पर गहरा प्रभाव डालता है।।वैदिक ज्योतिष में लग्न को संपूर्ण कुंडली का आधार माना गया है।।यह शरीर प्रकृति जीवन दृष्टि और व्यक्ति के बाहरी व्यक्तित्व को दर्शाता है।।चंद्रमा मन भावनाओं स्मृति और मानसिक स्थिरता का कारक है जबकि केतु एक छाया ग्रह होकर विरक्ति सूक्ष्म अनुभव अंतर्मुखता और पूर्वजन्म के संस्कारों का संकेत देता है।।जब चंद्रमा के साथ केतु लग्न में स्थित होता है तब जातक का मानसिक ढाँचा सामान्य लोगों से कुछ अलग दिखाई देता है।।कई प्राचीन ज्योतिषीय मतों में चंद्र-केतु की युति को ग्रस्त चंद्र अर्थात ग्रहण योग की स्थिति के रूप में भी देखा गया है।।इसका अर्थ यह नहीं कि यह योग केवल अशुभ ही होगा अपितु यह मन को अत्यंत संवेदनशील और गहराई से अनुभव करने वाला बना देता है।।ऐसे जातकों का मन बहुत सूक्ष्म स्तर पर कार्य करता है।।वे छोटी छोटी घटना...