शुक्र राहु की युति
राहु शुक्र की युति पर लिखना प्रारंभ किया है कुछ समय पश्चात केतु शुक्र की युति पर भी लिखने का प्रयास रहेगा।।
शुक्र और राहु की युति को इच्छा-प्रधान युति माना जाता है क्योंकि यहाँ प्राकृतिक सुखकारक ग्रह शुक्र पर छाया ग्रह राहु का प्रभाव जुड़ जाता है।।यह युति व्यक्ति की कामना आकर्षण संबंधों की समझ भोग की वृत्ति और संतोष की क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।। इसे समझने के लिए शुक्र और राहु दोनों की ग्रह प्रकृति, उनकी स्थिति, भाव संबंध और दशा प्रभाव को देखना आवश्यक होता है।।
शुक्र स्वभावतः सौम्य ग्रह है और भोग सुख स्त्री प्रेम विवाह कला सौंदर्य विलास और सामाजिक सामंजस्य का कारक है।। राहु स्वयं कोई भोग नहीं देता बल्कि जिस ग्रह के साथ जुड़ता है उसकी इच्छाओं को असामान्य, अतृप्त और सीमा रहित बना देता है इसलिए शुक्र राहु युति में सुख की इच्छा सामान्य नहीं रहती बल्कि तीव्र बार-बार बदलने वाली और संतोष से रहित हो जाती है।।
इस युति में राहु शुक्र की स्वाभाविक मर्यादा को ढक देता है जिसके कारण व्यक्ति आकर्षण और वास्तविक संबंध के बीच अंतर नहीं कर पाता ज्योतिषीय दृष्टि से यह युति भ्रम से युक्त आकर्षण उत्पन्न करती है जिसमें व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति को नहीं बल्कि अपनी कामना को देखता है और यही कारण है कि इस युति वाले जातकों के संबंध प्रायः अचानक बनते हैं और उतनी ही अचानक टूटते भी हैं।।
यदि शुक्र और राहु की युति पंचम भाव में हो तो प्रेम संबंधों में अस्थिरता गुप्त आकर्षण एक से अधिक संबंधों की प्रवृत्ति और भावनात्मक भ्रम देखा जाता है।।सप्तम भाव में यह युति विवाह, साझेदारी और सार्वजनिक संबंधों में असंतोष, अविश्वास और अपेक्षा जन्य तनाव उत्पन्न करती है।।द्वितीय भाव में होने पर यह युति पारिवारिक मूल्यों, वाणी और धन के विषय में भ्रम और असंतुलन देती है।।
यह युति विशेष रूप से तब अधिक प्रभावी हो जाती है जब शुक्र नीच राशि में हो अस्त हो या पाप ग्रहों से दृष्ट हो।।ऐसी स्थिति में राहु शुक्र की सुख प्रवृत्ति को विकृत रूप में प्रकट करता है जिसके कारण जातक को बार बार ऐसा अनुभव होता है कि जिसे वह चाहता था वह प्राप्त होने के बाद भी संतोष नहीं दे रहा और यहीअसंतोष संबंधों की अस्थिरता का मुख्य कारण बनता है।।
शुक्र राहु युति का एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि जातक आकर्षण के आधार पर निर्णय लेता है विवेक के आधार पर नहीं यदि चंद्र या बुध भी इस युति से पीड़ित हों तो निर्णय-दोष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।।ऐसे जातक प्रेम विवाह या साझेदारी में वास्तविकता को देर से समझ पाते हैं जिससे धोखे या पछतावे की स्थितियाँ बनती हैं।।
हालाँकि यह युति केवल नकारात्मक फल ही नहीं देती है यदि शुक्र स्वगृही उच्च या मित्र राशि में हो और गुरु की दृष्टि प्राप्त हो तो यही युति कला फैशन फिल्म मीडिया डिज़ाइन सौंदर्य उद्योग और विलासिता से जुड़े क्षेत्रों में असाधारण सफलता दे सकती है।।राहु यहाँ नवीनता और असामान्यता देता है जबकि शुक्र सौंदर्य और आकर्षण प्रदान करता है।।
शुक्र राहु की दशा या अंतर्दशा में व्यक्ति के जीवन में संबंध आकर्षण, सुख साधन भोग और सामाजिक छवि से जुड़े विषय अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं यदि कुंडली में विवेक ग्रह मजबूत हों तो यह काल भौतिक उन्नति दे सकता है और यदि विवेक कमजोर हो तो यही दशा संबंध विच्छेद अपयश और मानसिक असंतुलन भी दे सकती है।।
ज्योतिषीय रूप से यह स्पष्ट है कि शुक्र राहु युति व्यक्ति को न तो स्वभावतः अनैतिक बनाती है और न ही स्वतः पतन देती है अपितु यह युति केवल इच्छाओं की तीव्रता बढ़ाती है और फल इस बात पर निर्भर करता है कि कुंडली में विवेक देने वाले ग्रह कितने समर्थ हैं और जातक अपनी इच्छाओं पर कितना नियंत्रण रख पाता है।।अतः शुक्र और राहु की युति को केवल भोग या विकृति से जोड़कर देखना अधूरा होगा।।यह युति कुंडली में इच्छा शक्ति आकर्षण और संतोष की परीक्षा का संकेत देती है जिसका फल ग्रहों की स्थिति, भाव दृष्टि और दशा के अनुसार परिवर्तित होता है।।
शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब शिव हैं।।
यदि उनकी कृपा हो तो जातक
पग बिनु चलहीं सुनहीं बिनु काना।।
कर बिनु कर्म करहीं विधि नाना।।
डॉ सुशील कश्यप
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