Posts

Showing posts from January, 2026

शनि की साढ़ेसाती

  अज्ञात भय के अनेक कारण होते हैं और अनेक में से कुछ एक जो मुख्य कारण है उन सभी कारणों पर लिखने का प्रयास रहेगा।।सभी कारणों में मुख्य कारण शनि की साढ़े साती है क्योंकि हर समय तीन राशि पर साढ़ेसाती होती ही है।। साढ़ेसाती को सामान्यतः कष्ट, विलंब और मानसिक दबाव से जोड़कर देखा जाता है परंतु इसके प्रभावों में अज्ञात भय एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गूढ़ परिणाम है जिसे प्रायः सही रूप में समझा नहीं जाता क्योंकि यह भय किसी प्रत्यक्ष घटना या वास्तविक संकट से उत्पन्न नहीं होता बल्कि भीतर ही भीतर मनुष्य को घेरे रहता है और व्यक्ति स्वयं भी यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि वह किस बात से डर रहा है फिर भी मन लगातार अस्थिर बना रहता है और यही अज्ञात भय की वास्तविक पहचान है।। साढ़ेसाती तब आरंभ होती है जब शनि जन्म कुंडली के चन्द्रमा से बारहवें पहले और दूसरे भाव से गोचर करते है।। यह लगभग साढ़े सात वर्ष की अवधि होती है, जिसमें मन, स्वयं का अस्तित्व और सुरक्षा तथा स्थिरता प्रभावित होती है।। चन्द्रमा मन का कारक है और शनि अनुशासन, भय, सीमा और कर्मफल का ग्रह है अतः जब शनि चन्द्रमा से जुड़े भावों में प्रवेश क...

पंचम भाव के अनकहे रहस्य

पंचम भाव पर जब बात आती है तो ये कर्मों का बैंक बैलेंस है। संचित कर्म इस भाव से ही देखते है। जीवन में महत्वपूर्ण बिंदुओं पर इस भाव से विचार होता है । जैसे विद्या , संतान,बुद्धि , ईष्ट आदि । यह भाव प्रेम का भी है ,आनंद का भी है। जैसे पंचम भाव में बैठे ग्रह से आप को हल्का अंदाजा लग सकता है कि इस जातक के किस प्रकार का टेस्ट होगा फिल्म ,सीरियल , आदि देखने में । जैसे पंचम का मंगल एक्शन थिल्रर मूवी का शौक दे सकता है ,शनि मिस्ट्री थ्रिलर , राहु जासूसी आदि। पंचम का दूषित राहु माता के दांत खराब कर सकता है वहीं केतु झुरिया या कम बाल। जितने भी ईष्ट देवता के निर्णय हेतु सूत्र दिए है उसमें 90% सारे सूत्र पंचम भाव पर लिखे गए है।जैसे पंचम का सूर्य 97% शिव भक्त मिलेगा  , पंचम शनि में मंगल ,राहु आदि का प्रभाव दे तो कई बार माता काली की भक्ति में भी रुझान आता है उसे महिषासुर मर्दिनी, कालभैरव अष्टकम ऐसे स्तोत्र पसंद आयेंगे। पंचम का मंगल , या सूर्य इनका सम्मिलित प्रभाव कई बारी भगवान राम के प्रति आसक्ति देता है। खैर ईष्ट देवता चयन हेतु विस्तृत लेख पूर्व में लिखा जा चुका है इच्छुक गण उसको ढूंढ कर पढ़ सकते...

ज्योतिष शास्त्र v चंद्रमा

ज्योतिष शास्त्र अनुसार  प्रत्येक ग्रह मनुष्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार का प्रभाव डालता है, परंतु उन सभी प्रभावों को ग्रहण करने सहने और दिशा देने की शक्ति चंद्रमा में ही होती है।।राहु भ्रम उत्पन्न करता है शनि जीवन में दबाव और कठिनाइयाँ देता है मंगल क्रोध और आवेग पैदा करता है किंतु इन सबको मनुष्य किस सीमा तक स्वीकार करता है उनसे कैसे निपटता है और उनका परिणाम क्या होगा यह पूर्ण रूप से चंद्रमा पर निर्भर करता है।।चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है और मन ही वह केंद्र है जहाँ भ्रम जन्म लेता है, दबाव महसूस होता है और क्रोध प्रतिक्रिया बनकर बाहर आता है अतः यदि मन स्थिर है तो बड़ा से बड़ा भ्रम भी स्पष्टता में बदल सकता है भारी दबाव भी साधना बन सकता है और तीव्र क्रोध भी संयम में परिवर्तित हो सकता है और यह स्थिरता और ग्रहणशीलता चंद्रमा की शक्ति से ही आती है।।राहु व्यक्ति को माया, भ्रम, भय और असमंजस में डालता है अतः जब चंद्रमा कमजोर होता है, तब व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में उलझ जाता है भ्रम को ही सत्य मान लेता है और मानसिक अशांति में फँस जाता है वहीं मजबूत चंद्रमा वाला व्यक्ति राहु के भ्रम को प...

केतु: एक ज्योतिषीय विश्लेषण

ज्योतिष में केतु को मौन, वैराग्य, अंतर्मुखी और कर्मों के सूक्ष्म फल का ग्रह माना गया है।। केतु का स्वभाव भीतर की ओर ले जाने वाला होता है अतः  यह ग्रह बाहरी शोर, दिखावे और शब्दों के फैलाव से दूर रहना सिखाता है।। केतु न तो अपनी पीड़ा को बार-बार कहने में विश्वास रखता है और न ही दूसरों से सहानुभूति माँगने में अतः उसका मार्ग शांत, गूढ़ और आत्मनिरीक्षण से भरा होता है।।केतु व्यक्ति को यह सिखाता है कि जीवन की गहरी समस्याओं का समाधान बाहर बोलने से नहीं, भीतर समझने से निकलता है अतः  जब व्यक्ति अपनी समस्याओं, दुखों और पीड़ाओं का हर जगह बखान करता है, तो वह अनजाने में अपने ही घावों को बार-बार कुरेदता है और इससे समस्या हल होने के बजाय और गहरी हो जाती है क्योंकि  केतु का कष्ट शब्दों से हल्का नहीं होता, बल्कि अनुभवों को स्वीकार करने से शुद्ध होता है।। बार-बार अपनी पीड़ा को दोहराने से मन उसी दुख में अटक जाता है जिससे व्यक्ति स्वयं को पीड़ित की भूमिका में देखने लगता है और चित्त आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौट-लौटकर उसी वेदना में उलझा रहता है और यही कारण है कि ऐसे लोगों में धीरे-धीरे भय, अकेलापन...

ध्यान और ज्योतिष

ध्यान को प्रायः आध्यात्मिक अभ्यास मान लिया जाता है और ज्योतिष को भविष्य बताने की विद्या। परंतु इन दोनों के मूल में एक ही तत्व कार्य करता है— चेतना।।ज्योतिष ग्रहों की भाषा में चेतना की अवस्थाओं का अध्ययन है,और ध्यान चेतना को प्रत्यक्ष अनुभव में लाने की प्रक्रिया।।ज्योतिष यह बताता है कि चेतना किस दिशा में प्रवाहित हो रही है जबकि ध्यान यह सिखाता है कि उस प्रवाह का स्वामी कैसे बना जाए।। कुंडली में ग्रह केवल बाहरी घटनाओं के संकेत नहीं होते।। वे मन की वृत्तियों, प्रवृत्तियों और प्रतिक्रियाओं के प्रतीक होते हैं।।चंद्र मन है,बुध बुद्धि हैशनि अनुशासन और धैर्य है,राहु-केतु असंतुलन और वैराग्य के द्वार हैं।। जब मन अस्थिर होता है,तो चंद्र अशांत अनुभव होता है,जब निर्णय डगमगाते हैं,तो बुध दुर्बल प्रतीत होता है,जब जीवन बोझ लगता है,तो शनि पीड़ा देने लगता है।। ध्यान यहाँ कोई उपाय नहीं,बल्कि ग्रहों के साथ सही संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया है।।ध्यान के माध्यम से मन को देखना शुरू होता है,देखने से दूरी बनती है,दूरी से नियंत्रण आता है।।यही वह बिंदु है जहाँ ज्योतिष और ध्यान एक हो जाते हैं।।जब व्यक्ति ध्यान ...

शनि और राहु की युति: श्रापित योग/पिशाच योग

ज्योतिष शास्त्र में शनि और राहु की युति अथवा परस्पर दृष्टि को पिशाच योग कहा जाता है।। इसी  योग को श्रापित योग भी कहा जाता है।।यह योग मनुष्य के जीवन में सामान्य ग्रहयोगों से भिन्न प्रभाव देता है।। शनि कर्म, भय, अनुशासन और विलंब का ग्रह है।।राहु भ्रम, आकांक्षा, असत्य और छाया का ग्रह है।।जब ये दोनों ग्रह एक-दूसरे से संबंध बनाते हैं तो कर्म और भ्रम आपस में मिल जाते हैं।। इस योग में जातक कर्म तो करता है पर कर्म की दिशा स्पष्ट नहीं रहती।।राहु कर्म को छल से ढक देता है और शनि उसका परिणाम देर से, पर कठोर रूप में देता है।। पिशाच योग का सबसे प्रमुख लक्षण है  जातक को अपने ही निर्णय सही प्रतीत होते हैं जबकि परिणाम बार-बार विपरीत आता है।।यह योग व्यक्ति के विवेक को धुंधला करता है।।सही–गलत का भेद समझ में तो आता है पर उसका पालन नहीं हो पाता।। पिशाच योग भय उत्पन्न करता है पर वह भय दिखाई नहीं देता।।वह भीतर छिपा रहता है,निर्णयों, संबंधों और कार्यशैली में प्रकट होता है।। इस योग में मनुष्य दूसरों पर संदेह करता है पर वास्तविक संदेह स्वयं पर होता है।।आत्मविश्वास अस्थिर रहता है।।कभी जरूरत आवश्यकता से ...

बारहवें भाव में राहु और केतु की स्थिति

ज्योतिष शास्त्र में बारहवें भाव को व्यय और मोक्ष से जुड़ा भाव माना गया है।। खर्च, त्याग, एकांत, नींद, विदेश, अस्पताल, गुप्त कार्य, छिपे शत्रु और मोक्ष की दिशा  ये सभी विषय बारहवें भाव से जुड़े होते हैं इसलिए इस भाव में स्थित ग्रह व्यक्ति के जीवन में चुपचाप लेकिन लगातार प्रभाव डालते हैं।।राहु एक छाया ग्रह है इसका काम भ्रम पैदा करना, इच्छाओं को बढ़ाना और व्यक्ति को सामान्य रास्ते से हटाकर असामान्य दिशा में ले जाना है इसीलिए शास्त्रों में राहु को मायाकारक कहा गया है, क्योंकि यह व्यक्ति को ऐसा दिखाता है जो वास्तविक नहीं होता है राहु न पूरी तरह शुभ है और न पूरी तरह अशुभ यह जैसा संग पाता है, वैसा ही फल देता है।। जब राहु बारहवें भाव में स्थित होता है, तो व्यक्ति के जीवन में खर्च और इच्छाएँ नियंत्रण से बाहर जा सकती हैं ऐसा जातक बाहर से सामान्य दिखाई देता है, पर भीतर बहुत कुछ छिपा होता है।। बिना कारण खर्च होना, गुप्त योजनाएँ बनना, या ऐसी इच्छाएँ पैदा होना जिनका खुलकर प्रदर्शन नहीं किया जाता और इसी तरह की अनेकों स्थितियाँ बन सकती हैं।। मानसिक स्तर पर द्वादश भाव का राहु व्यक्ति को अकेलापन पसं...

केमद्रुम दोष का उपाय

केमद्रुम दोष का केंद्र चंद्रमा है और चंद्रमा मन, भावनाओं, स्मृति तथा आदतो का स्वामी है।।सबसे पहले बात आती है दिनचर्या की और अनियमित जीवन चंद्रमा को सबसे अधिक कमजोर करता है।।निश्चित समय पर सोना, जागना, भोजन करना और अनावश्यक स्क्रीन टाइम से दूरी बनाना मन को स्थिर आधार देता है।।आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि नियमित जीवनशैली से हार्मोनल संतुलन सुधरता है, जिससे चिंता और अवसाद स्वतः कम होने लगते हैं। केमद्रुम योग वाले व्यक्ति अक्सर एकांतप्रिय होते हैं।।किंतु समस्या एकांत नहीं, बल्कि दिशा-हीन एकांत है।। यदि वही एकांत आत्मचिंतन, लेखन, मौन या धीमी श्वास-प्रश्वास के साथ जुड़ जाए, तो वह एकांत कमजोरी नहीं, शक्ति बन जाता है।।मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि संरचित एकांत व्यक्ति को भीतर से जोड़ता है, जबकि बिखरा हुआ एकांत उसे और अकेला कर देता है।। चंद्रमा जल तत्व से जुड़ा हुआ है, इसलिए जल के साथ संवाद अत्यंत प्रभावी होता है।।तैराकी, नदी या तालाब के किनारे बैठकर कुछ समय बिताना, या स्नान करते समय जल की धारा पर ध्यान टिकाना मन को स्वाभाविक रूप से शांत करता है।। इसके साथ ही भूमि तत्व का संपर्क भी उतना ...

केमद्रुम दोष

चंद्र द्वारा निर्मित एक महत्व्पूर्ण दोष केमद्रुम दोष पर एक मित्र ने लिखने के लिए बहुत बार कह दिया तो एक छोटा सा लेख लिख रहा हूं शेष कभी पुनः लिखेंगे।। केमद्रुम योग और दोष दोनों प्रचलन में है तो मैं योग ही लिख दे रहा हूं वैसे नाम से कुछ अंतर नहीं पड़ता है।। इस तरह लिखने का प्रयास है कि आप ज्योतिष का एक % भी न जानते हो तब भी समझ जाएंगे बशर्ते आपके पास आपकी कुंडली हो।। चन्द्रमा ही मनुष्य के मन का कारक होता है यह वेद द्वारा सिद्ध है।। जन्म पत्री में चन्द्र के आगे और पीछे के भावों में कोई ग्रह स्थित न हो यानी अगला और पिछला भाव रिक्त हो खाली हो तो ही इस योग का निर्माण हो जाता है।। राहु और केतु की गणना ही नहीं की जाती है अर्थात राहु केतु स्थित हो तो भी उसे रिक्त ही मानें।। सूर्य,गुरु,शुक्र,शनि,बुध,मंगल में से कोई ग्रह आगे और पीछे के भाव में स्थित न हो तो इस योग को निर्मित माना जाता है।। आगे और पीछे के किसी एक भाव में भी कोई ग्रह हो तो यह योग निर्मित नहीं होगा।। आगे और पीछे वाले भाव में से किसी एक भाव में कोई ग्रह हो तो इसे अनफा और सुनफा योग कहते हैं।। दोनों भावों में ग्रह स्थित हो तो दुरधारा ...

केतु शनि की युति लग्न पर

केतु शनि की युति लग्न अर्थात प्रथम भाव में निर्मित हो तो क्या क्या स्थिति उत्पन्न हो सकती हैं इस पर ज्योतिषीय व्याख्या के लिए कई लोगों ने आग्रह किया है अतः लेखन का प्रयास प्रारंभ किया है। बाद में वीडियो भी बनाएंगे, जन्म कुंडली का पहला भाव यानी लग्न व्यक्ति का बाहरी चेहरा नहीं होता बल्कि उसका भीतरी सच होता है।।यहीं से यह समझ आता है कि व्यक्ति जीवन को कैसे देखता है कैसे महसूस करता है और कैसे जीता है।।जब इसी लग्न में शनि और केतु जैसे गंभीर और वैराग्य वाले ग्रह साथ बैठ जाएँ, तो जीवन सामान्य ढंग से नहीं चलता अपितु ऐसा जीवन भीतर की ओर ज्यादा मोड़ ले लेता है।।शनि कर्म सिखाता है धीरे चलना सिखाता है जिम्मेदारी उठाना सिखाता है और कठिन अनुभवों के माध्यम से व्यक्ति को परिपक्व बनाता है।।इसके विपरित केतु छोड़ना सिखाता है अकेले रहना सिखाता है भीतर की दुनिया से परिचय कराता है और संसार से मोह को धीरे-धीरे कम करता है।। जब ये दोनों लग्न में एक साथ होते हैं, तो व्यक्ति भीतर से बहुत गहरा हो जाता है अतः वह कम बोलता है पर बहुत सोचता है।।शास्त्र कहते हैं कि शनि दुख देकर सिखाता है और केतु दुख देकर छुड़ाता है।।...

राहु के नक्षत्र में बुध

जन्म पत्री में बुध राहु के नक्षत्र में स्थित हो जाएं तो जातक की वाणी में अजीब आकर्षण होता है।।राहु के तीनों नक्षत्रों ( आद्रा, स्वाति,शतभिषा)में स्थित होने पर यह परिणाम होता है।। ऐसा जातक सामान्यतः वार्ता भी करे तो भी उनको अद्भुत माना जाता है।। मोटिवेशनल स्पीकर इत्यादि की जन्म पत्री में यह योग बहुधा पाया जाता है।। वह सामान्य बातें ही बोलता है और लोग वाह वाह करते रहते हैं।। ऐसे जातक वकील,मीडिया रिपोर्टर इत्यादि क्षेत्र में काफी सफल होते हैं।। इनकी वाणी भ्रम भी पैदा करती है और ये सामने वाले को  गुमराह भी कर देते हैं।।

राहु और मंगल की युति

ज्योतिष में कुछ ग्रह युतियाँ ऐसी होती हैं जो व्यक्ति को बहुत ऊर्जा देती हैं, लेकिन उसी ऊर्जा को संभालने का संतुलन नहीं दे पातीं।। राहु और मंगल की युति को इसी श्रेणी में रखा जाता है।। इस युति में शक्ति तो बहुत ज्यादा होती है पर दिशा और ठहराव का अभाव रहता है।।मंगल ग्रह स्वभाव से तेज़ी, साहस, जोखिम उठाने और तुरंत निर्णय लेने का कारक है अतः यह व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और बिना डर काम करने की शक्ति देता है।। वहीं राहु अधीरता अतृप्त इच्छा शॉर्टकट अपनाने और पूरी प्रक्रिया समझे बिना आगे बढ़ने की प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है।। जब मंगल की गति और राहु की अतृप्ति एक साथ मिलती है, तो व्यक्ति सोचने से पहले करने लगता है।।ऐसे जातक निर्णय लेने से पहले अधिक विचार नहीं करते।। उन्हें लगता है कि सोच-विचार समय की बर्बादी है और काम पहले हो जाना चाहिए।। पहले कर लेते हैं बाद में सुधार लेंगे जैसी मानसिकता बन जाती है।। इसका परिणाम यह होता है कि योजना अधूरी रहती है, जोखिम का सही आकलन नहीं हो पाता और काम बीच में अटक जाते हैं या बिगड़ जाते हैं।। यहाँ समस्या योग्यता या क्षमता की नहीं बल्कि जल्दबाज...

अज्ञात भय

अज्ञात भय को लेकर प्रश्न पुनः पुनः समक्ष आता है और अब नित्य ही ऐसा होने लगा है तो लगता है कि अज्ञात भय धीरे धीरे महामारी का रूप धारण करने लगा है।।अतः इस विषय पर आज ज्योतिषीय दृष्टिकोण को लिखने का प्रयास कर रहे है। अज्ञात भय पर बहुत ज्यादा लिखने की आवश्यकता है, अतः कोशिश रहेगा कि नित्य या दो दिन में एक लेख इसी विषय पर लिखे, ज्योतिष में अज्ञात भय को किसी एक ग्रह से जोड़कर नहीं देखा जाता।।यह भय किसी बाहरी घटना से नहीं, बल्कि मन और अवचेतन पर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव और दबाव से जन्म लेता है।।अक्सर व्यक्ति स्वयं नहीं समझ पाता कि डर किस बात का है लेकिन भीतर लगातार आशंका बनी रहती है यही अज्ञात भय है।।इस भय की जड़ सबसे पहले चंद्रमा में होती है।।चंद्रमा मन भावनात्मक सुरक्षा और मानसिक संतुलन का ग्रह है।। अतः जब चंद्र पीड़ित होते हैं तो मन बिना कारण के  असुरक्षित महसूस करने लगता है।।ऐसे व्यक्ति को घबराहट होने लगती है नकारात्मक कल्पनाएँ स्वतः बनने लगती हैं और भविष्य को लेकर मन शांत नहीं रह पाता।। रात के समय यह भय और गहरा हो जाता है।।चंद्र के साथ शनि राहु या केतु का संबंध इस स्थिति को और बढ़ा...

चंद्र से चौथे या सप्तम भाव में बुध

जन्म कुंडली में चंद्र से चौथे या सप्तम भाव में बुध स्थित हो तो ऐसे जातक का मस्तिष्क शीशे की तरह कार्य करता है।। ऐसा जातक दूसरे के के हाव भाव से उसके विचार और उसके निर्णय का आकलन कर लेने में काफी हद तक सक्षम होता है।। ऐसे जातक वार्ता करते करते दूसरे की भावनाओं को समझ जाते हैं।। इस योग के कारण जातक को लाभ के साथ साथ कुछ हानि भी प्राप्त होती हैं।।हर योग और ग्रह स्थिति के लाभ और हानि होती ही हैं।। ऐसे जातक दूसरे के मन और मस्तिष्क को पढ़ते पढ़ते अपनी मौलिकता को खो देते हैं और दूसरे के अनुसार ही चलने लगते हैं।। दूसरे के प्रतिबिंब बनकर रह जाना ही इस योग का बुरा फल है।। ऐसे जातक यदि प्रयास करें तो अच्छे सलाहकार होते है।। ज्यादातर ये जातक मालिक बनने के स्थान पर किसी के सलाहकार बनना पसंद करते हैं।। विचित्र योग है किन्तु 75% तक स्वयं सिद्ध है।। शेष 100% सिद्ध जैसा कुछ नहीं होता है क्योंकि 100%  सिद्ध सूत्र काल की मर्यादा का उल्लंघन है और किसी को  भी काल की मर्यादा के उल्लंघन की आज्ञा नहीं है।।

गुरु-चांडाल योग

गुरु-चांडाल योग को केवल एक डरावने नाम या सतही दोष की तरह देखना ज्योतिष की अधूरी समझ है। इसका वास्तविक अर्थ संगति के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार अच्छी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति भी गलत संगति में पड़कर अपने मूल गुण खो बैठता है, उसी प्रकार शुभ फल देने वाला गुरु ग्रह भी जब राहु जैसे छायाग्रह के प्रभाव में आता है तो उसकी सकारात्मकता दबने लगती है। यहाँ समस्या गुरु की नहीं, बल्कि उस संगति की है जो उसकी प्रकृति को प्रभावित करती है। राहु स्वभाव से भ्रम, छल, अति महत्वाकांक्षा और नकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। जब यही प्रवृत्तियाँ गुरु की नैतिकता, विवेक और धर्मबोध के साथ मिलती हैं तो एक आंतरिक संघर्ष पैदा होता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के भीतर ज्ञान तो होता है, लेकिन दिशा गलत हो जाती है। वह धर्म और शास्त्रों का प्रयोग आत्मशुद्धि के लिए नहीं बल्कि अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए करने लगता है। यह समझना भी आवश्यक है कि गुरु–चांडाल योग हर स्थिति में अशुभ नहीं होता। जब गुरु स्वयं बलवान, शुभ भावों का स्वामी और अपनी स्थिति में सशक्त हो, तब राहु भी पूरी तरह उसे दूषित नहीं कर पाता। यह योग तभी अधिक...

कुंडली का सबसे भयावह योग – शनि और राहु की युति (विष दोष)

कुंडली का सबसे भयावह योग – शनि और राहु की युति (विष दोष) कुंडली में जब शनि और राहु एक साथ बैठ जाते हैं, तो जातक को ऐसा महसूस होता है जैसे जीवन की कमर ही टूट गई हो। इस युति से बनने वाले योग को ज्योतिष में विष दोष कहा जाता है। यह दोष केवल धन, नौकरी या व्यवसाय तक सीमित नहीं रहता। यह धीरे-धीरे मन की शांति, आत्मविश्वास और रिश्तों को भी प्रभावित करता है। बिना कारण डर और घबराहट लगातार नकारात्मक सोच मेहनत के बाद भी सफलता न मिलना अपमान, धोखा और अकेलापन कमर, पैर, नसों और त्वचा से जुड़ी परेशानियाँ परिवार और समाज से दूरी शनि कर्मों का हिसाब लेते हैं और राहु भ्रम पैदा करता है। जब ये दोनों मिलते हैं, तो इंसान अपने ही कर्मों और डर के चक्र में फँस जाता है। शनि–राहु दोष का सबसे प्रभावी उपाय शनि अनाथों और उपेक्षित लोगों के ग्रह माने जाते हैं। इसीलिए अनाथालय में सेवा या दान करना सबसे बड़ा और सच्चा उपाय माना गया है। शनिवार के दिन अनाथ बच्चों को भोजन, कपड़े या पढ़ाई की सामग्री देने से शनि का भारी दोष धीरे-धीरे शांत होने लगता है। घर का टॉयलेट राहु का स्थान माना गया है और नीला रंग शनि का। शनिवार को टॉयलेट को...

वीणा योग

  ज्योतिष में कुछ योग ऐसे होते हैं जो जीवन को संघर्ष की भाषा में नहीं पढ़ते बल्कि वे जीवन को संतुलन की दृष्टि से देखते हैं।।वीणा योग ऐसा ही एक नाभास योग है।।यह योग जीवन में उछाल नहीं लाता बल्कि यह जीवन को सँवारता है जैसे वीणा के अनेक तार एक साथ बजकर राग रचते हैं वैसे ही यह योग ग्रहों के संतुलित विस्तार से जीवन की तान बनाता है।।यह योग बताता है कि जीवन केवल तीव्र प्रयास से नहीं चलता जीवन सही लय में चलने से सधता है।। वीणा योग का निर्माण तब होता है जब कुंडली के सात दृश्य ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि केवल सात भावों में स्थित हों इसमें पाँच भाव रिक्त रहते हैं।।यह रिक्तता अभाव नहीं होती यह संतुलन की जगह होती है।। राहु और केतु की गणना इसमें नहीं की जाती क्योंकि वे सदैव एक-दूसरे से सप्तम स्थिति में रहते हैं और नाभास योगों के मूल सिद्धांत में सम्मिलित नहीं होते।। इस योग में ग्रह न तो एक स्थान पर अत्यधिक जमा होते हैं न ही पूरी तरह बिखर जाते हैं।।इसी कारण इस योग से युक्त व्यक्ति का जीवन अत्यधिक उग्र या अत्यधिक निष्क्रिय नहीं होता अपितु वह मध्य मार्ग पर चलता है जहाँ न तो सब ...

राहु की स्थिति,लक्षण

 राहु को केवल छाया-ग्रह कहना पूरा सत्य नहीं है।।राहु वह शक्ति है जो सामान्य जीवन को अलग दिशा दे सकती है परन्तु जब वही शक्ति संतुलन खो देती हैतो व्यक्ति धीरे-धीरे अपने ही भीतर से दूर होने लगता है।।राहु पीड़ित होने का अर्थ यह नहीं कि जीवन समाप्त हो गया।।इसका अर्थ केवल इतना है कि व्यक्ति सच्चाई छोड़कर दिखावे और आभास के पीछे चलने लगा है।।राहु की पीड़ा बाहर कम दिखाई देती है वह पहले भीतर काम करती है घटनाएँ बाद में बिगड़ती हैं पहले सोच और समझ धुंधली होती है।।शास्त्रों के अनुसार राहु तब पीड़ित माना जाता है जब वह गलत भावों में हो अशुभ ग्रहों से युति या दृष्टि संबंध हो गुरु, चंद्र या लग्न को कमजोर कर रहा हो या जब व्यक्ति के कर्मों में छल अति और असंतुलन बढ़ गया हो।।राहु की पीड़ा का पहला असर मन पर पड़ता है।।सब कुछ ठीक होते हुए भी भीतर संतोष नहीं रहता जिसके कारण कल्पनाएँ बढ़ जाती हैं और मन में भ्रम और शंका रहने लगती है।।जिससे अपने फैसलों पर भरोसा कम होने लगता है और एक साथ बहुत कुछ पाने की बेचैनी बनी रहती है।।अक्सर भीतर से यह प्रश्न उठता है सब कुछ होते हुए भी मैं ठीक क्यों नहीं हूँ???? पीड़ित रा...

केतु की महादशा का दुःख सामान्य दुःख नहीं होता

केतु की महादशा का दुःख सामान्य दुःख नहीं होता।।यह रोने–धोने वाला दुःख भी नहीं होता।।यह वह पीड़ा है जो दिखती नहीं,पर व्यक्ति को भीतर से खाली कर देती है।।केतु की दशा में व्यक्ति यह नहीं कह पाता कि मैं दुखी हूँ।। भीतर कहीं यह भाव रहता है कि मैं जीवन से जुड़ा नहीं रहा।।यह दुःख जीवन की घटनाओं से नहीं अपितु जीवन से संबंध टूटने से पैदा होता है।। केतु का दुःख तेज नहीं होता न ऐसा कि व्यक्ति टूट जाए न ऐसा कि सहा न जा सके।।वह बस लगातार रहता है।।काम करते समय लोगों के बीच रहते हुए हँसते हुए भी।। बाहर से सब सामान्य लगता है पर भीतर व्यक्ति जानता है कि वह केवल निभा रहा है क्योंकि जो पीड़ा रुकती नहीं वही सबसे अधिक थकाती है।।धीरे–धीरे केतु व्यक्ति को यह अनुभव कराने लगता है कि मेरी ज़रूरत नहीं है मेरी उपस्थिति से कुछ बदलता नहीं और मैं किसी पर बोझ हूँ।।यह स्वयं को मिटाने की अवस्था होती है।। व्यक्ति अपनी इच्छा दबा देता है अपनी पीड़ा को भी तुच्छ मान लेता है और स्वयं को छोटा करते-करते भीतर से गायब होने लगता है।।केतु की दशा में व्यक्ति बोलना छोड़ देता है।।इसलिए नहीं कि उसे कहना नहीं आता इसलिए कि उसे लगता है क...

चंद्रमा: कुंडली की जान, मन की भाषा और जीवन की दिशा

चंद्रमा: कुंडली की जान, मन की भाषा और जीवन की दिशा ज्योतिष में अगर किसी एक ग्रह को “कुंडली की आत्मा” कहा जाए, तो वह चंद्रमा है। सूर्य आत्मा है, लेकिन चंद्रमा मन है। और जहाँ मन होता है, वहीं पूरा जीवन बसता है। कहावत है — मन चंगा तो कठौती में गंगा यह वाक्य चंद्रमा को समझने की कुंजी है। जिस व्यक्ति का चंद्रमा शांत, संतुलित और शुभ होता है, उसका जीवन बाहर से चाहे जैसा हो, भीतर से स्थिर रहता है। और जिसका चंद्रमा पीड़ित होता है, वह भरी हुई दुनिया में भी अकेला, असुरक्षित और बेचैन रहता है। चंद्रमा ही सबसे ज़्यादा हमें प्रभावित क्यों करता है चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नज़दीक है और सबसे तेज़ गति से चलता है। यह लगभग ढाई दिन में एक राशि बदल देता है। इसका अर्थ है कि मन की तरंगें, भावनाएँ, मूड, डर, आशा, प्रेम और असुरक्षा — ये सब सबसे तेज़ चंद्रमा से बदलते हैं। इसी कारण किसी जातक पर किसी भी ग्रह से अधिक प्रभाव चंद्रमा का पड़ता है। सूर्य हमें पहचान देता है, मंगल ऊर्जा देता है, गुरु दिशा देता है, लेकिन चंद्रमा तय करता है कि हम उन सबका उपयोग कर भी पाएँगे या नहीं। चंद्रमा और मानसिक स्थिति का गहरा संबंध चंद्रम...

सूर्य: ज्योतिषीय विश्लेषण

यह लेख सूर्य की स्थिति को लेकर लिखने का प्रयास है।।  व्यक्ति अपने क्रियाकलापों से सूर्य की ऊष्मा को बिगाड़ कर दूषित कर देता है यह समझने का प्रयास अवश्य करें।। सूर्य आत्मा का ग्रह है।।जब सूर्य दूषित होता है, तो जीवन तुरंत नहीं बिगड़ता।।पहले व्यक्ति अपने भीतर के केंद्र से हटने लगता है।।यही कारण है कि सूर्य का दोष जल्दी समझ में नहीं आता क्योंकि उसका पहला प्रभाव अहंकार के रूप में आता है,जो बाहर से शक्ति जैसा दिखाई देता है।।सबसे पहला संकेत यह होता है किआत्मसम्मान धीरे-धीरे अहंकार में बदलने लगता है।।व्यक्ति अब यह नहीं कहता कि मैं सक्षम हूँ बल्कि भीतर-भीतर यह भाव आ जाता है कि मैं सबसे बेहतर हूं।।दूसरों की बातों में कमी दिखने लगती है अपनी गलतियों को तर्क से सही ठहराया जाने लगता है विनम्रता कमजोरी लगने लगती है।।सूर्य तब दूषित होता है जब व्यक्ति स्वयं को प्रकाश नहीं अपितु प्रकाश का मालिक समझने लगता है।। सूर्य सत्य का ग्रह है पर जब सूर्य बिगड़ता है तो सत्य करुणा से अलग हो जाता है।।मैं सच बोल रहा हूँ कहकर कठोर शब्द कह देना दूसरों की भावनाओं की परवाह न करनायह दिखाता है कि सूर्य की गर्मी बढ़ रही...

ज्योतिष का विकृत रूप

कल व्हाट्सएप में एक जिज्ञासु ने विचित्र प्रश्न किया तो लिखने से स्वयं को रोक नहीं पाया।। प्रश्न यह था कि उन्होंने एक नामी ज्योतिषी के पास कुंडली विश्लेषण के लिए भेजी थी तो ज्योतिषी महाराज ने उन्हें भगवान शिव, माता महाकाली और श्री काल भैरव की आराधना वर्जित बताई है।। अब वह मित्र मुझ से यह पूछ रहे थे कि सलाह उचित है या अनुचित है।। यह सब पढ़कर मैं अचंभित रह गया और मैनें उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि उत्तर देता तो प्रश्न कर्ता की ही भावना आहत हो जाती।। ऐसे ज्योतिषी के पास जाकर ऐसी मूर्खतापूर्ण सलाह लेना कहां कि बुद्धिमानी है और इसके पश्चात उसका सत्यापन मेरे से करा रहे हैं जिसका जीवन ही भगवान शिव की कृपा से है जिसने इष्ट ही श्री काल भैरव जी महाराज हैं।। खैर ये ज्योतिषी ऐसे उल्टे सीधे उपाय कहां से उठाकर लाते हैं नारायण ही जानते हैं।। कोई काला शूरमा शमशान में दबवा रहा है तो कोई नित्य 21 बार दीवार बनवा कर गिरवा रहा है।। ज्योतिष शास्त्र की मर्यादा को खंडित करने का पूरा कार्यभार इन्होंने स्वयं के कंधों पर उठा लिया है और नित्य इसके लिए कठिन परिश्रम कर भी रहे हैं।। बच्चे को सोना न पहनाए,कान म...

शनि: ज्योतिषीय विश्लेषण

ज्योतिष में शनि को अक्सर केवल दुख, देरी और दंड से जोड़ दिया जाता है यह धारणा अधूरी है।।शास्त्रों में शनि डर का नहीं अपितु अनुशासन का पालन करने और करवाने के कारक हैं।। शनि यह नहीं देखता कि आपने क्या कहा शनि यह देखता है कि आपने जो कहा, उसे निभाया या नहीं इसलिए शनि को कर्म और समय का ग्रह कहा गया है।।जहाँ समय का सम्मान होता है,वहाँ शनि स्वाभाविक रूप से शुभ हो जाता है।। जिस व्यक्ति में यह गुण होता है कि वह कम बोलता है पर जो बोलता है, उसे निभाता है उसकी कुंडली में शनि कभी पूरी तरह अशुभ नहीं होता।।ज्योतिष की भाषा में समझें तो शनि समय है और समय सीमा है और सीमा का अर्थ है प्रतिबद्धता।जो व्यक्ति समय पर काम करता है और समय का आदर करता है और अपनी बात पर खड़ा रहता हैवह शनि के स्वभाव के अनुसार चलता है।।यह कोई नैतिक उपदेश नहीं है यह शुभ शनि का सीधा संकेत है।। कुछ लोग बहुत बड़े वादे करते हैं योजनाएँ उनकी  शानदार होती हैं।।बातों में आत्मविश्वास दिखता है पर काम समय पर नहीं होता।।ऐसे लोगों की कुंडली में अक्सर शनि कमजोर मिलता है या तो शनि पीड़ित होता है या बुध बहुत तेज होता है और शनि दबा हुआ क्योंकि ज्...

बुध की दशा

सभी नौ ग्रहों की महादशा में क्या न करें कि श्रृंखला प्रारंभ कर दी है।।प्रथम लेख बुध ग्रह पर लिखने का प्रयास किया है।।इस श्रृंखला में आपको चमत्कारी कुछ नहीं प्राप्त होगा किन्तु उपयोगी प्राप्त हो इसका सतत प्रयास है।।मेरी सफलता और असफलता का निर्णय आपका स्वतंत्र अधिकार है।। बुध की महादशा मनुष्य के जीवन में विचार, वाणी और निर्णय को केंद्र में ले आती है।।इस काल में होने वाली भूलें कर्म से नहीं,बुद्धि के असंतुलन से जन्म लेती हैं।। इसलिए इस महादशा में क्या करना है से पहले यह समझना आवश्यक है कि क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए।। बुध की महादशा में मन अत्यंत सक्रिय हो जाता है।।विचारों की गति बढ़ जाती है और व्यक्ति अपनी हर सोच को सही मानने लगता है।।यहाँ सबसे पहली भूल जन्म लेती है हर विचार पर विश्वास करना,मन में उठे तर्क को अंतिम सत्य मान लेना और विचार आते ही निर्णय कर लेना।। बुध विचार देता है,पर निर्णय का विवेक नहीं देता।।यदि विचारों को बिना जाँच स्वीकार किया जाए,तो वही बुद्धि भ्रम बन जाती है।। इस महादशा में वाणी तीव्र और प्रभावशाली हो जाती है।। व्यक्ति शब्दों से प्रभावित करना सीख जाता है और यहीं से अ...

राहु गुरु की युति: चांडाल योग

जब जन्मकुंडली में गुरु (बृहस्पति) और राहु एक ही राशि में युति करते हैं, तब उसे शास्त्रों में चांडाल योग कहा गया है।। इस योग का मूल प्रश्न यह नहीं है कि जीवन के किस क्षेत्र में फल मिलेगा, बल्कि यह है कि ज्ञान किस दिशा में प्रवाहित होगा।। गुरु ज्योतिष में धर्म, नीति, शास्त्र, विवेक और विस्तार का कारक है।। वह दिशा देता है, सीमा निर्धारित करता है और सत्य को क्रम में रखता है।।राहु केवल भ्रम ही नहीं, बल्कि असीम आकांक्षा,इच्छा का ग्रह है।।वह सीमा नहीं मानता, परंपरा नहीं मानता और स्थापित ढाँचों को तोड़ने की प्रवृत्ति रखता है।। राहु असत्य का ग्रह नहीं है अपितु वह अपरंपरागत सत्य की खोज का ग्रह है, जो बिना अनुशासन के होने पर भ्रम में बदल जाती है।। जब गुरु और राहु एक साथ आते हैं, तब समस्या ज्ञान के अभाव की नहीं होती, बल्कि ज्ञान की दिशा के विकृत हो जाने की होती है।। गुरु सीमित करता है, राहु असीम करता है अतः  इस युति में सीमा और असीमता का संघर्ष चलता है। चांडालशब्द यहाँ किसी सामाजिक या जातिगत अर्थ में नहीं है।।शास्त्रों में इसका प्रयोग संस्कार से अलग होने के अर्थ में हुआ है अर्थात् ज्ञान होते ह...

केतु और गुरु की युति 1

ज्योतिष शास्त्र में केतु और गुरु की युति को साधारण योग नहीं माना गया है।। यह युति जीवन को बाहर से नहीं, भीतर से प्रभावित करती है।।जहाँ अधिकांश ग्रह योग सफलता, पद या संघर्ष की कहानी कहते हैं, वहीं केतु–गुरु युति मनुष्य को स्वयं से आमने–सामने खड़ा कर देती है।। गुरु ज्ञान का ग्रह है अतः वह विश्वास देता है, धर्म देता है, दिशा देता है।।वह कहता है जीवन का अर्थ है, व्यवस्था है, मार्ग है।।केतु ठीक इसके उलट काम करता है अतः वह पूछता है जो तुम्हें सिखाया गया है, क्या वही पूरा सत्य है???  वह जुड़ने के बजाय काटता है, भरोसे के बजाय शंका जगाता है, और बाहरी सहारे के बजाय भीतर झाँकने को विवश करता है।। अतः जब ये दोनों एक साथ आते हैं, तब व्यक्ति के पास ज्ञान तो होता है, पर संतोष नहीं होता।।उसे बहुत कुछ पता होता है इसके पश्चात भी भीतर एक खालीपन बना रहता है।। वह सुनता है, पढ़ता है, समझताहै किन्तु फिर भी मन में यह प्रश्न रह जाता है कि कुछ अधूरा है।। इस युति का मूल स्वभाव यही है ज्ञान से आगे जाने की तड़प अतः यह धर्म का विरोध नहीं करती, बल्कि धर्म की सतह से आगे बढ़ना चाहती है।। इसलिए ऐसे लोग परंपरागत मा...

केतु और गुरु की युति

केतु गुरु युति को अच्छा या बुरा कह देना बात को बहुत छोटा कर देना है।।यह युति फल नहीं बताती, यह मनुष्य की चेतना की अवस्था दिखाती है।।यह बताती है कि व्यक्ति जीवन को बाहर से देख रहा है या भीतर से,जहाँ गुरु जोड़ता है, वहाँ केतु काटता है।।गुरु कहता है यह सत्य है, इस पर भरोसा करो।।केतु पूछता है क्या यही पूरा सत्य है।। जब ये दोनों साथ होते हैं, तब व्यक्ति के पास ज्ञान तो होता है, पर संतोष नहीं होता।।उसे बहुत कुछ पता होता है,फिर भी भीतर एक खाली जगह बनी रहती है।।वह पढ़ता है, सुनता है, समझता है, पर कहीं न कहीं उसे लगता है कि बात पूरी नहीं हुई।। लग्न में यह युति हो तो मनुष्य बचपन से ही भीतर की ओर झुका रहता है।।उसे भीड़ में रहना भारी लगता है।।वह स्वयं से प्रश्न करता है, दुनिया से नहीं अतः यदि विवेक हो तो यह योग साधक बनाता है,और यदि संतुलन न हो तो व्यक्ति स्वयं से ही कटने लगता है।। पंचम भाव में यह युति बुद्धि देती है, पर सामान्य बुद्धि नहीं ऐसी बुद्धि जो मानने से पहले जानना चाहती है।।यहाँ पूर्वजन्म का ज्ञान सहज रूप से उभर सकता है पर यदि अहं जुड़ गया, तो यही ज्ञान बोझ बन जाता है।। नवम भाव में यह युत...

जीवन दर्शन

 आदि भी हृदय है और अंत भी हृदय, फिर मन-बुद्धि क्या हैं जिनका स्थान मस्तिष्क माना जाता है? *मन बुद्धि, आंख-कान-नाक, सभी अभिव्यक्ति की इन्द्रियां हैं और सबका मूल स्थान हृदय है।  हृदय से उठती है तरंग और हृदय में ही समा जाती है। मूल हृदय ही है सबका इसलिए हृदय को मन-बुद्धि, आंख-कान में देखने के बजाय मन-बुद्धि, आंख-कान को हमें हृदय में देखना चाहिये। इन इन्द्रियों के द्वारा दूसरे का, दूसरेपन का निर्धारण होता है। वह जो दूसरा है वस्तुत: हृदय में ही स्थित है, मन-बुद्धि से नहीं। हमारी मन-बुद्धि स्वयं हृदय में ही है। इसे जो जान लेता है वह द्रष्टा-दृश्य को जान लेता है अर्थात दूसरे को हृदय में ही देखता है। कहने का अर्थ है कि हम सब हृदय में ही हैं और हमें वहीं से देखना/अनुभव करना है। जो सभी का मूलस्रोत है, जिसमें सब रहता है और जिसमें सब मिल जाता है, वह हृदय ही है।