जीवन दर्शन
आदि भी हृदय है और अंत भी हृदय, फिर मन-बुद्धि क्या हैं जिनका स्थान मस्तिष्क माना जाता है? *मन बुद्धि, आंख-कान-नाक, सभी अभिव्यक्ति की इन्द्रियां हैं और सबका मूल स्थान हृदय है। हृदय से उठती है तरंग और हृदय में ही समा जाती है। मूल हृदय ही है सबका इसलिए हृदय को मन-बुद्धि, आंख-कान में देखने के बजाय मन-बुद्धि, आंख-कान को हमें हृदय में देखना चाहिये। इन इन्द्रियों के द्वारा दूसरे का, दूसरेपन का निर्धारण होता है। वह जो दूसरा है वस्तुत: हृदय में ही स्थित है, मन-बुद्धि से नहीं। हमारी मन-बुद्धि स्वयं हृदय में ही है। इसे जो जान लेता है वह द्रष्टा-दृश्य को जान लेता है अर्थात दूसरे को हृदय में ही देखता है। कहने का अर्थ है कि हम सब हृदय में ही हैं और हमें वहीं से देखना/अनुभव करना है। जो सभी का मूलस्रोत है, जिसमें सब रहता है और जिसमें सब मिल जाता है, वह हृदय ही है।
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