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भ्रमित और आकस्मिक दो राहु के प्रमुख अस्त्र हैं।।

भ्रमित और त्वरित दो शब्दों में राहु का सारा बल और चरित्र छिपा हुआ है।। राहु जिस भाव में स्थित होता है जिस भाव से संबंध बनाता है वहां पर अकस्मात परिणाम देता है।। अतः भ्रमित और आकस्मिक दो राहु के प्रमुख अस्त्र हैं।। जब भी राहु की दशा,महादशा,अंतर्दशा प्रारंभ हो तो भ्रम से सर्वथा बचने का प्रयास करें और आवेग को अपने जीवन से निकाल दें।। तीव्रता,अभी,आज ही,बिल्कुल आदि शब्दों का प्रयोग और चिंतन बंद कर दें।। राहु पर विभिन्न ग्रहों का प्रभाव विभिन्न फल उत्पन्न करता है।। जिस भाव में राहु स्थित है उस भाव से संबंधित रिश्ते असहज होने लगते हैं।। प्राप्ति में बाधा और भ्रम का समावेश होने लगता है।। इसके निदान के लिए शास्त्र ने ही बताया है कि राहु को मंगल कंट्रोल कर लेता है गुरू के समक्ष सरल हो जाता है  और बुद्धि के द्वारा इसका परिवर्तन संभव है।। अतः नित्य व्यायाम करें।। कच्ची जमीन या घास पर पैदल चलें।। रात्रि में देर से भोजन न करें।। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करने का नियम बनाए।। लेखन का नियम अवश्य अपना लें।। यदि भाग्यवश अच्छे गुरू या आचार्य का सानिध्य प्राप्त हो जाए तो स्वयं का सौभाग्य समझें।। अच्छे स...

मानसिक तनाव,अवसाद आदि के मूल में चंद्र व बुध

आजकल ज्योतिषीय समाधान के लिए मिलने वाले अधिकतर लोगों का प्रश्न मानसिक तनाव,अवसाद, एंजाइटी इत्यादि को लेकर होता हैं। प्रत्यक्ष रूप से कई लोगों का प्रश्न शिक्षा, कैरियर, पारिवारिक क्लेश आदि आदि प्रश्नों के रूप में सामने आता है, अधिकतर लोगों इन प्रश्नों के मूल में भी मानसिक तनाव,अवसाद, एंजाइटी आदि ही निहित होता है, तो आज इन्हीं प्रश्नों का ज्योतिषीय आंकलन करते है..... मानसिक तनाव हमेशा बाहर की परिस्थितियों से नहीं आता अपितु इसका सीधा संबंध हमारे भीतर के मन और विचारों से होता है।।ज्योतिष में मन का संबंध चंद्र से और सोच विचार का संबंध बुध से माना जाता है।।जब ये दोनों संतुलित रहते हैं तो व्यक्ति शांत और स्पष्ट रहता है लेकिन जब इनमें असंतुलन होता है तो तनाव बढ़ने लगता है।। चंद्र मन का प्रतिनिधित्व करता है।।यह हमारी भावनाओं संवेदनशीलता और यादों से जुड़ा होता है।।यदि चंद्र कमजोर हो जाए तो व्यक्ति छोटी छोटी बातों को भी दिल से लगाने लगता है।।वह जल्दी दुखी होता है पुरानी बातों को पुनः पुनः याद करता है और भीतर एक हल्की बेचैनी बनी रहती है जिसके कारण यही धीरे धीरे मानसिक तनाव बन जाती है।। बुध विचारों...

केतु भाग 2

ज्योतिष शास्त्र में केतु को प्रायः केवल विच्छेद औरवैराग्य का ग्रह मान लिया जाता है परंतु केतु का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है।।यह केवल दूर करने वाला नहीं बल्कि भीतर की ओर मोड़ने वाला ग्रह है।।यह व्यक्ति की चेतना को बाहरी जगत से हटाकर अंदर की गहराइयों में ले जाता है।।केतु का स्वभाव ही पृथकता का है।।जहाँ अन्य ग्रह व्यक्ति को समाज संबंध, उपलब्धि की ओर प्रेरित करते हैं वहीं केतु इन सबके बीच एक अदृश्य दूरी बना देता है।। जब केतु कुंडली के प्रमुख भावों प्रथम चतुर्थ पंचम अष्टम या द्वादश में स्थित होता है तो व्यक्ति का स्वभाव भीतर की ओर झुकने लगता है।।यह अंतर्मुखता केवल किसी भय या कमजोरी का परिणाम नहीं होती बल्कि एक गहन आंतरिक जागरूकता का संकेत भी देती है।।ऐसा व्यक्ति बाहर से शांत संयमित दिखाई देता है।।उसे भीड़ दिखावा और बाहरी आकर्षणों में सहजता नहीं मिलती।।वह अपने अनुभवों को भीतर ही जीता है और अपने विचारों को गहराई में समझने का प्रयास करता है।।यही कारण है कि वह कम बोलता है परंतु जो समझता है वह अत्यंत गहरा होता है।।केतु की यह प्रवृत्ति व्यक्ति को आत्म आकलन की अद्भुत क्षमता प्रदान करती...

क्या बुध की दशा में भी मानसिक तनाव हो सकता है???

क्या बुध की दशा में भी मानसिक तनाव हो सकता है??? जब भी मन की चंचलता की बात होती है, तो लोग सीधे चंद्रमा को जिम्मेदार मान लेते है लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है।।चंद्रमा मन को अनुभव कराता है जबकि बुध उस अनुभव को सोच में बदलता है।।इसलिए मन की असली हलचल बुध से भी जुड़ी होती है।।आपने कभी ध्यान दिया होगा मन कभी कभी बिना रुके चलता रहता है।।एक विचार आया फिर दूसरा फिर तीसरा और कुछ ही समय में मन थकने लगता है।।यही मानसिक चंचलता है और यह तभी अधिक होती है जब बुध असंतुलित हो।।बुध का स्वभाव ही चलायमान है।।वह स्थिर नहीं रह सकता इसलिए जिन लोगों का बुध सक्रिय होता है उनका दिमाग हमेशा कुछ न कुछ सोचता रहता है।।वे जल्दी समझते हैं जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं और हर चीज़ को जल्दी पकड़ लेते हैं।।यह एक गुण है लेकिन तभी तक जब तक उसमें संतुलन है।।समस्या तब शुरू होती है जब सोच की गति तो तेज हो जाती है लेकिन उसमें दिशा नहीं रहती।।फिर वही मन हर छोटी बात को बार-बार सोचता है।।एक निर्णय लिया फिर उस पर संदेह हुआ फिर दूसरा विचार आया।।यह प्रक्रिया चलती रहती है और धीरे धीरे व्यक्ति खुद ही अपने विचारों में उलझ जाता है।।यदि बु...

शुक्र राहु की युति

राहु शुक्र की युति पर लिखना प्रारंभ किया है कुछ समय पश्चात केतु शुक्र की युति पर भी लिखने का प्रयास रहेगा।। शुक्र और राहु की युति को इच्छा-प्रधान युति माना जाता है क्योंकि यहाँ प्राकृतिक सुखकारक ग्रह शुक्र पर छाया ग्रह राहु का प्रभाव जुड़ जाता है।।यह युति व्यक्ति की कामना आकर्षण संबंधों की समझ भोग की वृत्ति और संतोष की क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।। इसे समझने के लिए शुक्र और राहु दोनों की ग्रह प्रकृति, उनकी स्थिति, भाव संबंध और दशा प्रभाव को  देखना आवश्यक होता है।। शुक्र स्वभावतः सौम्य ग्रह है और भोग सुख स्त्री प्रेम विवाह  कला सौंदर्य विलास और सामाजिक सामंजस्य का कारक है।। राहु स्वयं कोई भोग नहीं देता बल्कि जिस ग्रह के साथ जुड़ता है उसकी इच्छाओं को असामान्य, अतृप्त और सीमा रहित बना देता है इसलिए शुक्र राहु युति में सुख की इच्छा सामान्य नहीं रहती बल्कि तीव्र बार-बार बदलने वाली और संतोष से रहित हो जाती है।। इस युति में राहु शुक्र की स्वाभाविक मर्यादा को ढक देता है जिसके कारण व्यक्ति आकर्षण और वास्तविक संबंध के बीच अंतर नहीं कर पाता ज्योतिषीय दृष्टि से यह युति भ्र...

विच्छेदात्मक ग्रह का मन पर प्रभाव

क्यूं कोई भागकर शादी करता है ? क्यों कोई वैरागी हो जाता है ? क्यूं कोई लड़कर घर से भाग खड़ा होता है?  सूर्य शनि राहु इन तीनों को अलगाव वादी ग्रह बोला है। सूर्य तेज है ,अग्नि है ,राजा है,उससे मिलना कठिन है ,उसके पास रहना कठिन है ,आपको तेज सहन करना होगा , अन्यथा अस्त से सभी परिचित है। शनि सूर्यनंदन ही है परन्तु ठंडा ,सबसे दूर ,एकांत , अलग थलग ,मायूस ,उदासीन ग्रह है ,(melancholic) . राहु से मानसिक भय होता है, कोई भी ग्रह उससे युति में नहीं मिलना चाहते अन्यथा वह समझते है राहु जब उनके साथ मिल जाता है तो उनके कारक के साथ कैसे खेल खेलता है। 12 राशियां, 12 लग्न, ओर नवग्रह ,थोड़ा बहुत नक्षत्र भी ये सब मिलकर व्यक्ति को एक विशेष व्यक्तित्व देते है। जो उसे एक ग्रह की प्रधानता देते है जिसके कारण उस विशेष ग्रह की आदतें ,स्वभाव , व्यक्तित्व ,वेशभूषा हर चीज जातक के ऊपर दिखती है। लग्न ,चंद्र ,सूर्य से सुदर्शन चक्र बनता है । परन्तु कुछ ग्रंथों में विशेषकर लग्न ओर चंद्र से फलित करने को बोला है। कई जगह तो दशा साधन भी लग्न ओर चंद्र से जो बलवान हो उससे ही करते हैं । नाड़ी कहती है लग्न ओर चंद्र से जो बलव...

राहु और केतु के फलित में मौलिक अंतर

अक्सर यह प्रश्न किया जाता है कि राहु और केतु में से कौन अधिक कष्ट देता है। राहु ज्यादा खतरनाक है या केतु आदि आदि, ऊपरी दृष्टि से देखने पर लगता है कि राहु अधिक खतरनाक है पर अनुभव बताता है कि केतु का कष्ट अधिक गहरा और मौन होता है।। राहु इच्छा पैदा करता है वह मनुष्य को कुछ पाने की आग में झोंक देता है,नाम, धन, पद, संबंध  सब की लालसा राहु से जुड़ी होती है।। राहु भ्रम देता है, छल देता है, भटकाता है।।पर वह जीवन के प्रति आसक्ति बनाए रखता है।। इसलिए राहु के कष्ट में भी मनुष्य जीने की चाह नहीं छोड़ता।। केतु ठीक उलटा कार्य करता है।।वह इच्छा नहीं बढ़ाता, वह इच्छा को काट देता है।।केतु जिस भाव से जुड़ता है, वहाँ से रस छीन लेता है।। जो पहले प्रिय था, वही व्यर्थ लगने लगता है।।जो पास है, उसमें अर्थ नहीं दिखता।। और जो दूर है, उससे जुड़ने की इच्छा भी नहीं रहती।। यही केतु का कष्ट है,वह बाहर से नहीं, भीतर से तोड़ता है।।मनुष्य भीड़ में होकर भी अकेला हो जाता है।। राहु परेशान करता है तो मनुष्य लड़ता है।।केतु परेशान करता है तो मनुष्य चुप हो जाता है,और यही चुप्पी सबसे भारी पड़ती है।। राहु का दुख दिखाई देता ...