विच्छेदात्मक ग्रह का मन पर प्रभाव
क्यूं कोई भागकर शादी करता है ? क्यों कोई वैरागी हो जाता है ? क्यूं कोई लड़कर घर से भाग खड़ा होता है?
सूर्य शनि राहु इन तीनों को अलगाव वादी ग्रह बोला है। सूर्य तेज है ,अग्नि है ,राजा है,उससे मिलना कठिन है ,उसके पास रहना कठिन है ,आपको तेज सहन करना होगा , अन्यथा अस्त से सभी परिचित है। शनि सूर्यनंदन ही है परन्तु ठंडा ,सबसे दूर ,एकांत , अलग थलग ,मायूस ,उदासीन ग्रह है ,(melancholic) . राहु से मानसिक भय होता है, कोई भी ग्रह उससे युति में नहीं मिलना चाहते अन्यथा वह समझते है राहु जब उनके साथ मिल जाता है तो उनके कारक के साथ कैसे खेल खेलता है। 12 राशियां, 12 लग्न, ओर नवग्रह ,थोड़ा बहुत नक्षत्र भी ये सब मिलकर व्यक्ति को एक विशेष व्यक्तित्व देते है। जो उसे एक ग्रह की प्रधानता देते है जिसके कारण उस विशेष ग्रह की आदतें ,स्वभाव , व्यक्तित्व ,वेशभूषा हर चीज जातक के ऊपर दिखती है। लग्न ,चंद्र ,सूर्य से सुदर्शन चक्र बनता है । परन्तु कुछ ग्रंथों में विशेषकर लग्न ओर चंद्र से फलित करने को बोला है। कई जगह तो दशा साधन भी लग्न ओर चंद्र से जो बलवान हो उससे ही करते हैं । नाड़ी कहती है लग्न ओर चंद्र से जो बलवान हो उस से ही फलादेश करें , कई कुंडलियां में ये ठीक भी बैठता है। परन्तु दोनों को देखना चाहिए,लग्न ज्यादा सूक्ष्म है ।
उदाहरण के लिए लग्न से तलाक नहीं दिख रहा परन्तु चंद्र से दिख रहा है तो क्या होगा ? यानि एक घर के नीचे दो किराएदार वाली स्थिति। जब दोनों लग्न से तलाक हो तो तलाक तय है यानि मानसिक + शारीरिक। दोनों में से एक में भी संभावना हो तो विवाह बच जाता है परन्तु रस नहीं रहता।
कुंडली में व्यक्ति को दूरी, तलाक़, अलगाव देने वाले ग्रह है शनि, सूर्य, राहु, साथ ही द्वादश का स्वामी भी । बहुत बार प्रश्न ज्योतिष में ऐसे प्रश्न आते है कि अमुक सदस्य घर से गायब है, कहां होगा ,कब आएगा । लेकिन जातक शास्त्र में जब इसपर विचार किया तो जितने भी लोग घर से भागते है , चाहे वापस लौट आएं उनके चंद्र या लग्न से दूसरा स्थान जो घर परिवार का है वहां पर जब विच्छेदात्मक प्रभाव हो तो स्थितियां ऐसी बनती है कि वह घर से भाग जाता है । शनि के प्रभाव में हो तो कर्म के कारण ,मंगल हो तो झगडे से , दशमेश का प्रभाव हो तो किस्मत की रोटी खाना बाहर ही लिखी है। परन्तु कुछ ऐसे होते है जिन्हें मानसिक रूप से हमेशा द्वंद्व चल रहा होता है ,भाग जाने का, दूर बसने का यह भी चौथे ओर दूसरे में शनि ,सूर्य राहु , द्वादशेष के कारण होता है। कुछ कुछ लोगों का तो झगड़ा या असफलता आदि के समय में ऐसा मन होता है ये बड़ा स्वाभाविक है इसमें कोई खास बात नहीं
परन्तु जो घटनाएं घट जाती है वहां शनि सूर्य राहु द्वादशेष के होती है । ये दशम पर प्रभाव डालेंगे तो नौकरी से अलगाव , सप्तम में डाले तो पत्नी से ,पंचम में डाले तो बच्चों से । दूसरे ,चौथे ,सप्तम में डाले तो वह साधु बन जाता है।
लग्न, दूसरे या चतुर्थ भाव में अगर शनि, राहु, सूर्य का प्रभाव हो जैसे बैठे या दृष्टि दें तो जब जब घटनाएं उसके विपरीत चलेंगी,जैसे वह चलना चाहता है उसे विपरीत होगा वैसे वह मन को उच्चाट करेगा, भागने की सोचेंगे, बहुत से लोग तो प्लानिंग भी करते है जो होता नहीं । बहुत सी शादियां भाग के होती है जिसपर घर परिवार वह त्याग देते है इसमें प्रेम विवाह के योग तो होते ही+ शनि सूर्य राहु का भी ऊपर बताया गया प्रभाव परिवार के साथ में होता है। भागकर शादी या छुपे गहरे अनैतिक सम्बन्ध इसमें चतुर्थ भाव पीड़ित होना सबसे जरूरी है। साथ ही लग्न ओर नवांश में शुक्र पर शनि ,मंगल ,राहु जितना अधिक प्रभाव होगा ऐसी संभावनाएं हो जाती है। दोनों कंडीशन लगनी चाहिए । अकेले शुक्र मंगल या शुक्र राहु ,चंद्र राहु ,शुक्र शनि साथ हो तो आप चरित्रहीन है ऐसा कहने से बचें। कौमार्य और चरित्र दोनों चतुर्थ से पता चलते है।
डॉ सुशील कश्यप
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