राहु और केतु के फलित में मौलिक अंतर
अक्सर यह प्रश्न किया जाता है कि राहु और केतु में से कौन अधिक कष्ट देता है। राहु ज्यादा खतरनाक है या केतु आदि आदि, ऊपरी दृष्टि से देखने पर लगता है कि राहु अधिक खतरनाक है पर अनुभव बताता है कि केतु का कष्ट अधिक गहरा और मौन होता है।।
राहु इच्छा पैदा करता है वह मनुष्य को कुछ पाने की आग में झोंक देता है,नाम, धन, पद, संबंध सब की लालसा राहु से जुड़ी होती है।।
राहु भ्रम देता है, छल देता है, भटकाता है।।पर वह जीवन के प्रति आसक्ति बनाए रखता है।।
इसलिए राहु के कष्ट में भी मनुष्य जीने की चाह नहीं छोड़ता।।
केतु ठीक उलटा कार्य करता है।।वह इच्छा नहीं बढ़ाता, वह इच्छा को काट देता है।।केतु जिस भाव से जुड़ता है, वहाँ से रस छीन लेता है।।
जो पहले प्रिय था, वही व्यर्थ लगने लगता है।।जो पास है, उसमें अर्थ नहीं दिखता।।
और जो दूर है, उससे जुड़ने की इच्छा भी नहीं रहती।।
यही केतु का कष्ट है,वह बाहर से नहीं, भीतर से तोड़ता है।।मनुष्य भीड़ में होकर भी अकेला हो जाता है।।
राहु परेशान करता है तो मनुष्य लड़ता है।।केतु परेशान करता है तो मनुष्य चुप हो जाता है,और यही चुप्पी सबसे भारी पड़ती है।।
राहु का दुख दिखाई देता है केतु का दुख दिखाई नहीं देता।।पर केतु का दुख भीतर लगातार काम करता रहता है।।
ज्योतिष में केतु को मोक्षकारक कहा गया है।।पर मोक्ष की राह पहले खाली करती है, फिर भरती है।।पहले पहचान छीनती है, फिर बोध देती है।।
इसलिए केतु की दशा में मनुष्य प्रश्नों से भर जाता है।।पर उत्तर हाथ नहीं आते,यही सबसे बड़ा कष्ट होता है।।
राहु जीवन को बहुत अधिक बनाता है।।केतु जीवन को बहुत कम कर देता है,और “कम हो जाना” मनुष्य के लिए सबसे कठिन अनुभव है।।
इसलिए कहा जाता है ,राहु उलझाकर परेशान करता है।।केतु काटकर पीड़ा देता है,और जो ग्रह भीतर से काट दे।।
वही सबसे अधिक कष्ट देने वाला सिद्ध होता है।।
शेष राहु और केतु ऐसा विषय है कि इस पर जितना भी बताया जाय वो भी बहुत कम सिद्ध होंगे।।
सरल भाषा में तथा संक्षिप्त रूप से समझाने का प्रयास किया है उम्मीद है राहु केतु के असर का अंतर समझ में आ गया होगा,
डॉ सुशील कश्यप
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