केतु भाग 2
ज्योतिष शास्त्र में केतु को प्रायः केवल विच्छेद औरवैराग्य का ग्रह मान लिया जाता है परंतु केतु का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है।।यह केवल दूर करने वाला नहीं बल्कि भीतर की ओर मोड़ने वाला ग्रह है।।यह व्यक्ति की चेतना को बाहरी जगत से हटाकर अंदर की गहराइयों में ले जाता है।।केतु का स्वभाव ही पृथकता का है।।जहाँ अन्य ग्रह व्यक्ति को समाज संबंध, उपलब्धि की ओर प्रेरित करते हैं वहीं केतु इन सबके बीच एक अदृश्य दूरी बना देता है।।
जब केतु कुंडली के प्रमुख भावों प्रथम चतुर्थ पंचम अष्टम या द्वादश में स्थित होता है तो व्यक्ति का स्वभाव भीतर की ओर झुकने लगता है।।यह अंतर्मुखता केवल किसी भय या कमजोरी का परिणाम नहीं होती बल्कि एक गहन आंतरिक जागरूकता का संकेत भी देती है।।ऐसा व्यक्ति बाहर से शांत संयमित दिखाई देता है।।उसे भीड़ दिखावा और बाहरी आकर्षणों में सहजता नहीं मिलती।।वह अपने अनुभवों को भीतर ही जीता है और अपने विचारों को गहराई में समझने का प्रयास करता है।।यही कारण है कि वह कम बोलता है परंतु जो समझता है वह अत्यंत गहरा होता है।।केतु की यह प्रवृत्ति व्यक्ति को आत्म आकलन की अद्भुत क्षमता प्रदान करती है।।वह केवल बाहरी घटनाओं को नहीं देखता अपितु उनके पीछे छिपे कारणों और सूक्ष्म संकेतों को समझने का प्रयास करता है और जीवन उसके लिए केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं बल्कि एक आंतरिक क्रिया बन जाता है।।किन्तु केतु की यह अंतर्मुखता हमेशा सरल नहीं होती यदि कुंडली में संतुलन न हो तो यही प्रवृत्ति व्यक्ति को अकेलेपन असमंजस और सामाजिक दूरी की ओर भी ले जा सकती है।।वह अपने ही विचारों में उलझ सकता है और बाहरी संसार से तालमेल बैठाने में कठिनाई अनुभव कर सकता है।।केतु का एक अत्यंत गूढ़ प्रभाव अहंकार के क्षय में दिखाई देता है।। जहाँ सूर्य मै की पहचान को स्थापित करता है वहीं केतु उस मैं को प्रश्नों के सामने खड़ा कर देता है।। जिसके कारण व्यक्ति के भीतर एक स्वाभाविक विनम्रता वैराग्य और आत्म चिंतन विकसित होता है।।आध्यात्मिक दृष्टि से केतु का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।।यह व्यक्ति को बाहरी उपलब्धियों की सीमितता का अनुभव कराता है और उसे उस सत्य की ओर ले जाता है जो उसके भीतर ही स्थित है।।केतु व्यक्ति को खोजने नहीं बल्कि समझने की दिशा देता है और यह समझ ही अंतर्मुखता का वास्तविक सार है।।अंततः केतु हमें यह सिखाता है कि जीवन का सबसे गहरा उत्तर बाहर नहीं अपितु उसके भीतर ही छिपा है।। जो व्यक्ति इस अंतर्मुखी प्रवृत्ति को स्वीकार कर लेता है वह अकेला होकर भी रिक्त नहीं रहता अपितु वह अपने भीतर एक पूर्ण शांत और जागरूक संसार का अनुभव करता है।।
डॉ सुशील कश्यप
Comments
Post a Comment