केतु और गुरु की युति 1
ज्योतिष शास्त्र में केतु और गुरु की युति को साधारण योग नहीं माना गया है।। यह युति जीवन को बाहर से नहीं, भीतर से प्रभावित करती है।।जहाँ अधिकांश ग्रह योग सफलता, पद या संघर्ष की कहानी कहते हैं, वहीं केतु–गुरु युति मनुष्य को स्वयं से आमने–सामने खड़ा कर देती है।।
गुरु ज्ञान का ग्रह है अतः वह विश्वास देता है, धर्म देता है, दिशा देता है।।वह कहता है जीवन का अर्थ है, व्यवस्था है, मार्ग है।।केतु ठीक इसके उलट काम करता है अतः वह पूछता है जो तुम्हें सिखाया गया है, क्या वही पूरा सत्य है???
वह जुड़ने के बजाय काटता है, भरोसे के बजाय शंका जगाता है, और बाहरी सहारे के बजाय भीतर झाँकने को विवश करता है।।
अतः जब ये दोनों एक साथ आते हैं, तब व्यक्ति के पास ज्ञान तो होता है, पर संतोष नहीं होता।।उसे बहुत कुछ पता होता है इसके पश्चात भी भीतर एक खालीपन बना रहता है।। वह सुनता है, पढ़ता है, समझताहै किन्तु फिर भी मन में यह प्रश्न रह जाता है कि कुछ अधूरा है।।
इस युति का मूल स्वभाव यही है ज्ञान से आगे जाने की तड़प अतः यह धर्म का विरोध नहीं करती, बल्कि धर्म की सतह से आगे बढ़ना चाहती है।। इसलिए ऐसे लोग परंपरागत मान्यताओं से सहज नहीं होते।। उन्हें गुरु मिलते हैं, पर जब तक सही गुरु नहीं मिलता, तब तक मन टिकता नहीं। वे शास्त्र पढ़ते हैं, पर केवल शब्दों से तृप्त नहीं होते।।
यदि यह युति संतुलित हो, गुरु बलवान हो और शुभ दृष्टियों से युक्त हो, तो व्यक्ति गहरे स्तर का साधक बन सकता है।। ऐसा व्यक्ति कर्मकांड में नहीं उलझता, वह तत्व को पकड़ना चाहता है।।ध्यान, आत्मचिंतन, दर्शन और शोध की ओर उसका स्वाभाविक झुकाव होता है।। कई बार पूर्वजन्म के ज्ञान की झलक भी सहज रूप से मिलने लगती है।।
लेकिन यदि यही युति असंतुलित हो जाए विशेषकर जब गुरु दुर्बल हो या केतु अत्यधिक प्रभावी हो तो भ्रम पैदा करती है।। व्यक्ति हर गुरु पर संदेह करने लगता है जिसके कारण वह स्वयं को बहुत जानने वाला समझने लगता है।। यहीं से आध्यात्मिक अहंकार जन्म लेता है, जो सबसे सूक्ष्म और सबसे खतरनाक होता है।।
भावों के अनुसार इस युति का रूप बदलता है।। कहीं यह वैराग्य बनती है, कहीं बेचैनी और कहीं यह गूढ़ साधना का द्वार खोलती है, तो कहीं संबंधों में वैचारिक दूरी पैदा करती है।।
इस युति वाले व्यक्ति को सच्चा गुरु प्रायः देर से मिलता है।। कारण यह नहीं कि गुरु नहीं होते, बल्कि इसलिए कि यह युति उपदेश नहीं, अनुभव चाहती है।। जब सही मार्गदर्शन मिलता है, तब यही योग जीवन को भीतर से रूपांतरित कर देता है।।
इस युति का उपाय बाहरी प्रदर्शन नहीं है न अधिक बोलना, न अधिक दिखाना अपितु केवल विवेक, मौन, सेवा और आत्मनिरीक्षण अंततः केतु गुरु युति जीवन से एक ही बात कहती है जो तुम जानते हो, वह पर्याप्त नहीं है अतः अब स्वयं को जानने का साहस करो।।
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