केतु और गुरु की युति

केतु गुरु युति को अच्छा या बुरा कह देना बात को बहुत छोटा कर देना है।।यह युति फल नहीं बताती, यह मनुष्य की चेतना की अवस्था दिखाती है।।यह बताती है कि व्यक्ति जीवन को बाहर से देख रहा है या भीतर से,जहाँ गुरु जोड़ता है, वहाँ केतु काटता है।।गुरु कहता है यह सत्य है, इस पर भरोसा करो।।केतु पूछता है क्या यही पूरा सत्य है।।
जब ये दोनों साथ होते हैं, तब व्यक्ति के पास ज्ञान तो होता है, पर संतोष नहीं होता।।उसे बहुत कुछ पता होता है,फिर भी भीतर एक खाली जगह बनी रहती है।।वह पढ़ता है, सुनता है, समझता है, पर कहीं न कहीं उसे लगता है कि बात पूरी नहीं हुई।।
लग्न में यह युति हो तो मनुष्य बचपन से ही भीतर की ओर झुका रहता है।।उसे भीड़ में रहना भारी लगता है।।वह स्वयं से प्रश्न करता है, दुनिया से नहीं अतः यदि विवेक हो तो यह योग साधक बनाता है,और यदि संतुलन न हो तो व्यक्ति स्वयं से ही कटने लगता है।।
पंचम भाव में यह युति बुद्धि देती है, पर सामान्य बुद्धि नहीं ऐसी बुद्धि जो मानने से पहले जानना चाहती है।।यहाँ पूर्वजन्म का ज्ञान सहज रूप से उभर सकता है पर यदि अहं जुड़ गया, तो यही ज्ञान बोझ बन जाता है।।
नवम भाव में यह युति धर्म को तोड़ती नहीं,पर उससे संतुष्ट भी नहीं होती।।गुरु मिलते हैं, पर मन टिकता नहीं।।तीर्थ आकर्षित करते हैं, पर वहाँ भी मन का ठहराव नहीं आता।।यह योग मुक्ति की दिशा दिखाता है,पर सांसारिक उत्तरदायित्व से पलायन का जोखिम भी रखता है।।
अष्टम भाव में यह युति जीवन के रहस्यों की ओर ले जाती है।।मृत्यु, परिवर्तन, भय और साधना सब साथ चलते हैं।।यह योग बहुत शक्ति देता है, पर वही शक्ति संभालनी न आए तो डर बन जाती है।।
द्वादश भाव में यह युति धीरे-धीरे संसार से मन हटा देती है।।दान, सेवा, त्याग स्वाभाविक हो जाते हैं पर यदि विवेक न हो, तो व्यक्ति जीवन से भागने लगता है।।
इस युति का सार बहुत सरल है।।गुरु रास्ता दिखाता है और केतु उस रास्ते से भी आगे जाने को कहता है।।
इसलिए केतु गुरु युति का प्रश्न यह नहीं है कि जीवन में क्या मिलेगा अपितु प्रश्न यह है कि तुम जो जानते हो, क्या वही काफी है या अब स्वयं को जानने का साहस बचा है और यदि यह बात समझ में आ जाए,तो यह युति बंधन नहीं रहती अपितु मुक्ति का द्वार बन जाती है।।
शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि कर्ता भी वही हैं और कारण भी वही हैं।।

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