केतु की महादशा का दुःख सामान्य दुःख नहीं होता

केतु की महादशा का दुःख सामान्य दुःख नहीं होता।।यह रोने–धोने वाला दुःख भी नहीं होता।।यह वह पीड़ा है जो दिखती नहीं,पर व्यक्ति को भीतर से खाली कर देती है।।केतु की दशा में व्यक्ति यह नहीं कह पाता कि मैं दुखी हूँ।।
भीतर कहीं यह भाव रहता है कि मैं जीवन से जुड़ा नहीं रहा।।यह दुःख जीवन की घटनाओं से नहीं अपितु जीवन से संबंध टूटने से पैदा होता है।।
केतु का दुःख तेज नहीं होता न ऐसा कि व्यक्ति टूट जाए न ऐसा कि सहा न जा सके।।वह बस लगातार रहता है।।काम करते समय लोगों के बीच रहते हुए हँसते हुए भी।।

बाहर से सब सामान्य लगता है पर भीतर व्यक्ति जानता है कि वह केवल निभा रहा है क्योंकि जो पीड़ा रुकती नहीं
वही सबसे अधिक थकाती है।।धीरे–धीरे केतु व्यक्ति को यह अनुभव कराने लगता है कि मेरी ज़रूरत नहीं है मेरी उपस्थिति से कुछ बदलता नहीं और मैं किसी पर बोझ हूँ।।यह स्वयं को मिटाने की अवस्था होती है।।
व्यक्ति अपनी इच्छा दबा देता है अपनी पीड़ा को भी तुच्छ मान लेता है और स्वयं को छोटा करते-करते भीतर से गायब होने लगता है।।केतु की दशा में व्यक्ति बोलना छोड़ देता है।।इसलिए नहीं कि उसे कहना नहीं आता इसलिए कि उसे लगता है कहने का कोई अर्थ नहीं है।।
शिकायत बंद हो जाती है अपेक्षा समाप्त हो जाती है।।यह मौन शांति नहीं होता अपितु यह हार का मौन होता है अतः आशा भी केतु की दशा में भारी लगने लगती है।।सामान्य दुःख में मन कहता है सब ठीक हो जाएगा।।
पर केतु की दशा में भविष्य की कल्पना भी थका देती है।।
अच्छा होने का विचार भी खोखला लगने लगता हैक्योंकि केतु व्यक्ति को भविष्य से नहीं अपितु वर्तमान से काट देता है।।एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति अपने ही जीवन को बाहर से देखने लगता है।।जीवन चल रहा होता है पर वह उसमें शामिल नहीं होता।।यह न अवसाद है न ही भ्रम है यह अलगाव की स्थिति है।।जैसे कोई और जी रहा हो और व्यक्ति केवल देख रहा हो।।केतु की दशा में
सुख भी अपराध जैसा लगने लगता है।।यदि कभी हँसी आ जाए या हल्कापन महसूस हो जाए तो भीतर से आवाज आती है कि मैं खुश कैसे हो सकता हूँ।।यह विकृति नहीं है अपितु यह अंतर आत्मा की थकान है क्योंकि जब भीतर बहुत खालीपन हो तो सुख भी भारी लगने लगता है।।केतु का दुःख इसलिए और कठिन होता है क्योंकि उसमें कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखता।।
शनि में कर्म दिखाई देता हैराहु में इच्छा बची रहती है और मंगल में संघर्ष की शक्ति होती है।।केतु में न ही कर्म दिखता है और न ही इच्छा शेष बचती है और न लड़ने की ताकत रहती है।।जहाँ संघर्ष भी अर्थहीन लगने लगे
वह केतु द्वारा प्रदत्त कष्ट ही हो सकता है।।
केतु की महादशा का दुःख इसलिए सबसे कठिन होता हैक्योंकि उससे लड़ा नहीं जा सकता।।इसलिए सबसे गहरा होता है क्योंकि वह दिखाई नहीं देता और इसलिए सबसे एकाकी होता है क्योंकि उसे शब्द नहीं दिए जा सकते।।केतु जीवन को तोड़ता नहींवह जीवन से जुड़ाव तोड़ देता है और जब जुड़ाव टूटता है तो व्यक्ति या तो
भीतर से सूख जाता है या फिर उसी शून्य सेएक बिल्कुल नई गहराई लेकर लौटता है।।केतु की पीड़ा मरने जैसा अनुभव नहीं देती यह पहले जैसा न रहने का अनुभव देती है।।
शेष सब भगवान शिव के अधीन है उनकी कृपा हो तो जातक 
पग बिनु चलहीं सुनहीं बिनु काना।।
कर बिनु कर्म करहीं विधि नाना।।

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