केमद्रुम दोष का उपाय

केमद्रुम दोष का केंद्र चंद्रमा है और चंद्रमा मन, भावनाओं, स्मृति तथा आदतो का स्वामी है।।सबसे पहले बात आती है दिनचर्या की और अनियमित जीवन चंद्रमा को सबसे अधिक कमजोर करता है।।निश्चित समय पर सोना, जागना, भोजन करना और अनावश्यक स्क्रीन टाइम से दूरी बनाना मन को स्थिर आधार देता है।।आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि नियमित जीवनशैली से हार्मोनल संतुलन सुधरता है, जिससे चिंता और अवसाद स्वतः कम होने लगते हैं।

केमद्रुम योग वाले व्यक्ति अक्सर एकांतप्रिय होते हैं।।किंतु समस्या एकांत नहीं, बल्कि दिशा-हीन एकांत है।। यदि वही एकांत आत्मचिंतन, लेखन, मौन या धीमी श्वास-प्रश्वास के साथ जुड़ जाए, तो वह एकांत कमजोरी नहीं, शक्ति बन जाता है।।मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि संरचित एकांत व्यक्ति को भीतर से जोड़ता है, जबकि बिखरा हुआ एकांत उसे और अकेला कर देता है।।

चंद्रमा जल तत्व से जुड़ा हुआ है, इसलिए जल के साथ संवाद अत्यंत प्रभावी होता है।।तैराकी, नदी या तालाब के किनारे बैठकर कुछ समय बिताना, या स्नान करते समय जल की धारा पर ध्यान टिकाना मन को स्वाभाविक रूप से शांत करता है।। इसके साथ ही भूमि तत्व का संपर्क भी उतना ही आवश्यक है। नंगे पाँव जमीन पर चलना, सुबह की ओस से भीगी घास पर कुछ देर घूमना, मिट्टी को हाथों से स्पर्श करना ये सब आज की भाषा में “ग्राउंडिंग” कहलाते हैं। ।वैज्ञानिक रूप से यह तंत्रिका तंत्र को स्थिर करता है और भीतर जमी हुई बेचैनी को बाहर निकालता है।। प्रकृति के निकट रहना, पेड़ों के बीच टहलना और खुले आकाश के नीचे बैठना चंद्रमा के लिए किसी औषधि से कम नहीं है।।

एक अत्यंत प्रभावी उपाय है जिसका प्रयोग सैकड़ों बार सिद्ध हुआ है वह है रात को चंद्रमा से संवाद और यह कोई कल्पनात्मक क्रिया नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक अभ्यास है।। पूर्णिमा या सामान्य रात्रि में कुछ क्षण चंद्रमा को शांत भाव से देखते हुए अपने मन की बात मन ही मन कहना, भीतर के बोझ को हल्का करता है।। मन जब सुना जाता है, तो वह विद्रोह नहीं करता।।यह अभ्यास कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक रूप से शांति देने वाला सिद्ध हुआ है।

एक और रोचक उपाय है धीमी गति से चलना। केमद्रुम दोष वाले व्यक्ति का मन प्रायः भविष्य या अतीत में भटकता रहता है अतः प्रतिदिन कुछ समय जानबूझकर बहुत धीमे चलना,अपने कदमों का एहसास करना, श्वास को सुनना यह मन को वर्तमान में लौटाता है।।आधुनिक माइंडफुलनेस तकनीकें इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।।

केमद्रुम दोष में भावनाएँ अक्सर दब जाती हैं।।व्यक्ति भीतर बहुत कुछ महसूस करता है, पर व्यक्त नहीं कर पाता।।ऐसे में संगीत, भजन, हल्की तान, कविता या मुक्त लेखन अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।। बिना किसी साहित्यिक उद्देश्य के लिखा गया लेखन मन का बोझ उतार देता है।। इस लेखन के उपाय पर एक विस्तृत लेख जल्दी ही अलग से लिखने का प्रयास रहेगा क्योंकि चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि दबी हुई भावनाएँ मानसिक रोगों की जड़ होती हैं, जबकि अभिव्यक्ति स्वयं उपचार है।।

एक अनोखा और कम प्रचलित उपाय है,किसी एक पौधे की जिम्मेदारी लेना और रोज़ उसे पानी देना, उसके बढ़ने को देखना, उसके साथ समय बिताना उससे संवाद स्थापित करने का प्रयास करना, यह प्रक्रिया अवचेतन मन में स्थायित्व, पोषण और संबंध की भावना विकसित करती है, जो केमद्रुम दोष की मूल कमी है।।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि केमद्रुम दोष  मन की एक विशेष बनावट का संकेत है।। जिस दिन व्यक्ति अपने मन से डरना छोड़कर उसे समझना शुरू करता है, उसी दिन केमद्रुम दोष अपना भयावह रूप खो देता है।। वास्तव में, सही दिशा मिलने पर यही दोष व्यक्ति को गहरी संवेदनशीलता, आत्मबोध और मौन शक्ति की ओर भी ले जा सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी और सबसे अनोखी सच्चाई है।।

डॉ सुशील कश्यप 

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