शनि की साढ़ेसाती

 अज्ञात भय के अनेक कारण होते हैं और अनेक में से कुछ एक जो मुख्य कारण है उन सभी कारणों पर लिखने का प्रयास रहेगा।।सभी कारणों में मुख्य कारण शनि की साढ़े साती है क्योंकि हर समय तीन राशि पर साढ़ेसाती होती ही है।।

साढ़ेसाती को सामान्यतः कष्ट, विलंब और मानसिक दबाव से जोड़कर देखा जाता है परंतु इसके प्रभावों में अज्ञात भय एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गूढ़ परिणाम है जिसे प्रायः सही रूप में समझा नहीं जाता क्योंकि यह भय किसी प्रत्यक्ष घटना या वास्तविक संकट से उत्पन्न नहीं होता बल्कि भीतर ही भीतर मनुष्य को घेरे रहता है और व्यक्ति स्वयं भी यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि वह किस बात से डर रहा है फिर भी मन लगातार अस्थिर बना रहता है और यही अज्ञात भय की वास्तविक पहचान है।।
साढ़ेसाती तब आरंभ होती है जब शनि जन्म कुंडली के चन्द्रमा से बारहवें पहले और दूसरे भाव से गोचर करते है।। यह लगभग साढ़े सात वर्ष की अवधि होती है, जिसमें मन, स्वयं का अस्तित्व और सुरक्षा तथा स्थिरता प्रभावित होती है।। चन्द्रमा मन का कारक है और शनि अनुशासन, भय, सीमा और कर्मफल का ग्रह है अतः जब शनि चन्द्रमा से जुड़े भावों में प्रवेश करता है, तो मन पर भार बढ़ने लगता है, भावनाएँ संकुचित हो जाती हैं और आशंकाएँ गहराने लगती हैं और यहीं से अज्ञात भय का जन्म होता है।।
साढ़ेसाती के प्रथम चरण में जब शनि चन्द्रमा से बारहवें भाव में होता है तब भय सक्रिय होता है और व्यक्ति भविष्य को लेकर अनजानी आशंका अनुभव करता है बिना कारण घबराहट होती है नींद में डरावने स्वप्न आते हैं और अकेलेपन का भाव बढ़ने लगता है।। द्वादश भाव अवचेतन मन, स्वप्न और छिपी चिंताओं से जुड़ा होता है और शनि यहाँ भय को भीतर दबाकर रखता है इसलिए जातक स्वयं नहीं समझ पाता कि वह डर क्यों रहा है पर मन लगातार भारी रहता है।।
दूसरे चरण में जब शनि चन्द्र राशि पर गोचर करता है, तब अज्ञात भय सबसे अधिक तीव्र हो जाता है।।इस समय व्यक्ति स्वयं पर अविश्वास करने लगता है मानसिक दबाव बढ़ जाता है और मन में यह भावना बार-बार आती है कि सब कुछ गलत हो जाएगा जिसके कारण निरंतर चिंता शंका और नकारात्मक विचार मन को घेर लेते हैं।। ज्योतिषीय दृष्टि से शनि यहाँ सीधे चन्द्रमा को प्रभावित करता है जिससे भावनात्मक सुरक्षा समाप्त होने लगती है और मन कठोर तथा आशंकाग्रस्त हो जाता है और यही चरण अज्ञात भय को सबसे स्पष्ट रूप में अनुभव कराता है।।तीसरे चरण में, जब शनि चन्द्रमा से दूसरे भाव में प्रवेश करता है, तब भय का स्वरूप बदल जाता है।। इस समय व्यक्ति को पारिवारिक सुरक्षा खोने का डर आर्थिक अस्थिरता की आशंका और भविष्य की अनिश्चितता अधिक सताने लगती है जिसके कारण वाणी में नकारात्मकता आ सकती है और मन संभावित हानि की कल्पनाओं में उलझा रहता है द्वितीय भाव सुरक्षा, संग्रह और स्थिरता का भाव है और शनि यहाँ कमी का डर उत्पन्न करता है जिससे मन हमेशा असुरक्षित महसूस करता है।।
यह अज्ञात भय साढ़ेसाती में विशेष रूप से तब अधिक बढ़ जाता है जब जन्म कुंडली में चन्द्रमा पहले से निर्बल होचन्द्रमा अष्टम या द्वादश भाव से जुड़ा हो चन्द्र पर राहु या केतु की दृष्टि या युति हो या शनि पहले से ही चन्द्र से संबंध बना रहा हो ऐसी कुंडलियों में साढ़ेसाती मानसिक स्तर पर अधिक कठोर सिद्ध होती है और भय का अनुभव गहरा हो जाता है।।
यहां यह समझना अति आवश्यक है कि साढ़ेसाती में उत्पन्न भय वास्तविक खतरे का संकेत नहीं होता।। शनि वास्तविक संकट नहीं दिखाता अपितु संभावनाओं का भय भविष्य की अनिश्चितता और कर्मफल की चेतावनी मन के सामने रखता है और इसी कारण इसे अज्ञात भय कहा जाता है क्योंकि डर तो होता है, पर उसका स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता।।
ज्योतिषीय सत्य यह है कि शनि भय देकर दंड नहीं देता अपितु शनि का उद्देश्य मन को परिपक्व करना अनावश्यक आशाओं को तोड़ना और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना होता है।।साढ़ेसाती के दौरान उत्पन्न अज्ञात भय वास्तव में यह संकेत देता है कि जातक को भीतर से मजबूत होना है और अपने मानसिक आधार को सुदृढ़ करना है।।अतः शनि की साढ़ेसाती में आने वाला अज्ञात भय कोई अशुभ दंड नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर जमी असुरक्षा आशंका और कर्म का प्रतिफल है।।जो भी व्यक्ति इस भय से भागता नहीं बल्कि उसे समझकर अनुशासन धैर्य और आत्मचिंतन को अपनाता है और ईश्वर भक्ति का मार्ग अपनाता है उसके लिए साढ़ेसाती अंततः मानसिक शक्ति और स्थिरता का मार्ग बन जाती है।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है शेष सब भगवान शिव के अधीन है।।

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