केमद्रुम दोष

चंद्र द्वारा निर्मित एक महत्व्पूर्ण दोष केमद्रुम दोष पर एक मित्र ने लिखने के लिए बहुत बार कह दिया तो एक छोटा सा लेख लिख रहा हूं शेष कभी पुनः लिखेंगे।। केमद्रुम योग और दोष दोनों प्रचलन में है तो मैं योग ही लिख दे रहा हूं वैसे नाम से कुछ अंतर नहीं पड़ता है।।

इस तरह लिखने का प्रयास है कि आप ज्योतिष का एक % भी न जानते हो तब भी समझ जाएंगे बशर्ते आपके पास आपकी कुंडली हो।।

चन्द्रमा ही मनुष्य के मन का कारक होता है यह वेद द्वारा सिद्ध है।।
जन्म पत्री में चन्द्र के आगे और पीछे के भावों में कोई ग्रह स्थित न हो यानी अगला और पिछला भाव रिक्त हो खाली हो तो ही इस योग का निर्माण हो जाता है।।
राहु और केतु की गणना ही नहीं की जाती है अर्थात राहु केतु स्थित हो तो भी उसे रिक्त ही मानें।।
सूर्य,गुरु,शुक्र,शनि,बुध,मंगल में से कोई ग्रह आगे और पीछे के भाव में स्थित न हो तो इस योग को निर्मित माना जाता है।।
आगे और पीछे के किसी एक भाव में भी कोई ग्रह हो तो यह योग निर्मित नहीं होगा।।
आगे और पीछे वाले भाव में से किसी एक भाव में कोई ग्रह हो तो इसे अनफा और सुनफा योग कहते हैं।।
दोनों भावों में ग्रह स्थित हो तो दुरधारा योग कहलाता है।।
दोनों भाव रिक्त हो तो केमद्रुम योग कहलाता है।।
यदि चंद्र के साथ ही कोई ग्रह स्थित है तो भी यह योग निर्मित नहीं होता है।।
अब विषय को समझिए।।
चंद्र अर्थात मन और मन के आगे पीछे कोई नहीं,साथ के भाव में भी कोई नहीं  अर्थात मन अकेला है।।
ऐसा जातक सब कुछ होते हुए भी अकेलेपन का शिकार होता है।।
प्रसन्नता और खुशी की घटनाएं उसको कोई विशेष प्रसन्नता नहीं देती हैं।। जातक का मन एक अजीब उदासी से ग्रस्त होता है।।
अब इसके भंग या तीव्र होने की स्थिति को भी समझ लें।।
गुरु बृहस्पति की दृष्टि इस योग के दोष को काफी हद तक कम कर देती है।।
आमने सामने अर्थात चंद्र और गुरु परस्पर सातवें हो तो इस योग का प्रभाव न के बराबर होता है।।
राहु केतु से चन्द्र की युति हो तो स्थिति गंभीर हो जाती है।।
चन्द्रमा यदि राहु,केतु और शनि के नक्षत्र में स्थित हो तो भी स्थिति विकट होती है।।
6,8,12 भाव में यह योग निर्मित हो जाए और दशा विपरीत हो तो जातक अवसाद अर्थात् डिप्रेशन का रोगी भी हो जाता है।।
शुक्र,बुध,मंगल की दृष्टि भी इस योग के दुष्प्रभाव में कमी कर देती है।।
सूर्य की दृष्टि का अर्थ है कि जातक  का जन्म पूर्णिमा का है इससे भी योग का बहुत हद तक परिहार हो जाता है।।

चंद्र पक्षबली हो तो भी दुष्प्रभाव कम होता है।।

इस योग का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि यदि अन्य ग्रह स्थिति भी विपरीत है तो जातक का सब कुछ छिन भी जाता है अर्थात जातक की स्थिति दयनीय हो जाती है।।
इसके उपाय पर कल लिखने का कोशिश करेंगे 

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