शनि और राहु की युति: श्रापित योग/पिशाच योग

ज्योतिष शास्त्र में शनि और राहु की युति अथवा परस्पर दृष्टि को पिशाच योग कहा जाता है।।
इसी  योग को श्रापित योग भी कहा जाता है।।यह योग मनुष्य के जीवन में सामान्य ग्रहयोगों से भिन्न प्रभाव देता है।।

शनि कर्म, भय, अनुशासन और विलंब का ग्रह है।।राहु भ्रम, आकांक्षा, असत्य और छाया का ग्रह है।।जब ये दोनों ग्रह एक-दूसरे से संबंध बनाते हैं तो कर्म और भ्रम आपस में मिल जाते हैं।।

इस योग में जातक कर्म तो करता है पर कर्म की दिशा स्पष्ट नहीं रहती।।राहु कर्म को छल से ढक देता है और शनि उसका परिणाम देर से, पर कठोर रूप में देता है।।

पिशाच योग का सबसे प्रमुख लक्षण है  जातक को अपने ही निर्णय सही प्रतीत होते हैं जबकि परिणाम बार-बार विपरीत आता है।।यह योग व्यक्ति के विवेक को धुंधला करता है।।सही–गलत का भेद समझ में तो आता है पर उसका पालन नहीं हो पाता।।

पिशाच योग भय उत्पन्न करता है पर वह भय दिखाई नहीं देता।।वह भीतर छिपा रहता है,निर्णयों, संबंधों और कार्यशैली में प्रकट होता है।।

इस योग में मनुष्य दूसरों पर संदेह करता है पर वास्तविक संदेह स्वयं पर होता है।।आत्मविश्वास अस्थिर रहता है।।कभी जरूरत आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वास होता है कभी आत्म विश्वास बिल्कुल धरातल पर गिरा सा प्रतीत होता है।।

पिशाच योग जातक को सामाजिक रूप से अलग करता है।।भीड़ में होते हुए भी वह स्वयं को अलग अनुभव करता है।।वह नियमों से टकराता है पर व्यवस्था का हिस्सा भी बना रहता है।।यह योग सामान्य जीवन से अलग रास्ता दिखाता है,कभी गुप्त कार्यों की ओर,कभी सत्ता, राजनीति या पर्दे के पीछे के तंत्र की ओर ले जाने का कार्य करता है।।

इस योग की विशेषता यह है कि यह तुरंत फल नहीं देता।।
पहले भ्रम बनाता है,फिर उसी भ्रम का दंड देता है।।पिशाच योग को केवल अशुभ कहना त्रुटिपूर्ण होगा किसी किसी जातक को यह योग ही फर्श से अर्श तक ले जाने का कार्य भी करता है।।

जिस जातक की जन्म पत्री में यह योग निर्मित हो उस जातक की शनि की महादशा में राहु की अंतर्दशा आ जाए या राहु की महादशा में शनि की की अंतर्दशा हो तो यह योग पूर्ण फलित होने की संभावना प्रबल होती हैं।।
पिशाच योग नाम इसीलिए है कि इसका कार्य पिशाच जैसा ही है।।
श्रापित योग नाम भी इस योग के कार्य के अनुरूप ही है।।

डॉ सुशील कश्यप 

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