सूर्य: ज्योतिषीय विश्लेषण
यह लेख सूर्य की स्थिति को लेकर लिखने का प्रयास है।।
व्यक्ति अपने क्रियाकलापों से सूर्य की ऊष्मा को बिगाड़ कर दूषित कर देता है यह समझने का प्रयास अवश्य करें।।
सूर्य आत्मा का ग्रह है।।जब सूर्य दूषित होता है, तो जीवन तुरंत नहीं बिगड़ता।।पहले व्यक्ति अपने भीतर के केंद्र से हटने लगता है।।यही कारण है कि सूर्य का दोष जल्दी समझ में नहीं आता क्योंकि उसका पहला प्रभाव अहंकार के रूप में आता है,जो बाहर से शक्ति जैसा दिखाई देता है।।सबसे पहला संकेत यह होता है किआत्मसम्मान धीरे-धीरे अहंकार में बदलने लगता है।।व्यक्ति अब यह नहीं कहता कि मैं सक्षम हूँ बल्कि भीतर-भीतर यह भाव आ जाता है कि मैं सबसे बेहतर हूं।।दूसरों की बातों में कमी दिखने लगती है अपनी गलतियों को तर्क से सही ठहराया जाने लगता है विनम्रता कमजोरी लगने लगती है।।सूर्य तब दूषित होता है जब व्यक्ति स्वयं को प्रकाश नहीं अपितु प्रकाश का मालिक समझने लगता है।।
सूर्य सत्य का ग्रह है पर जब सूर्य बिगड़ता है तो सत्य करुणा से अलग हो जाता है।।मैं सच बोल रहा हूँ कहकर
कठोर शब्द कह देना दूसरों की भावनाओं की परवाह न करनायह दिखाता है कि सूर्य की गर्मी बढ़ रही है और प्रकाश कम हो रहा है।।शुद्ध सूर्य सत्य को उजागर करता है दूषित सूर्य सत्य से जलाता है।।
बिना किसी बड़े कारण के पिता से मन खिन्न रहने लगता है और गुरु की बात गलत लगने लगती है और वरिष्ठों से टकराव बढ़ जाता है।।जब सूर्य की जड़ें कमजोर होती हैं तो व्यक्ति बाहर से मजबूत दिखता है पर भीतर से अस्थिर हो जाता है।।
दूषित सूर्य में व्यक्ति चाहता है सम्मान मिले पद मिलेलोग मानें पर जब जिम्मेदारी उठाने की बात आती है तो वह भारी लगती है।।यह बताता है कि जातक सेवा से कट रहा है और केवल अधिकार चाहता है।।
व्यक्ति को बार-बार सराहना चाहिए होती है औरथोड़ी सी आलोचना भी अपमान लगने लगती है।।वह अपनी उपलब्धियाँ गिनाने लगता है और सलाह को व्यक्तिगत हमला समझने लगता है।।जहाँ प्रशंसा की भूख होती है
वहाँ सूर्य शुभ नहीं रहता है।।व्यक्ति संवाद कम करता हैऔरअपनी बात ही अंतिम मानता है अतः समझौते को कमजोरी समझता है।।यह नेतृत्व नहीं होता यह नियंत्रण होता है।।
दूषित सूर्य में धर्म आचरण नहीं रहता पहचान बन जाता है।।व्यक्ति स्वयं को अधिक सही मानता है और दूसरों को कमतर समझने लगता है।।जब धर्म भीतर का मार्ग न रहकर दिखावे का साधन बन जाए तो सूर्य दूषित हो जाता है।।दूषित सूर्य की अवस्था में व्यक्ति यह मानने लगता है कि मुझे कुछ नहीं होगा।।अतः थकान, तनाव, चेतावनियों कोनज़रअंदाज़ किया जाता है।।यह आत्मबल नहीं है अपितु कोरा अहंकार है।।
इन सभी वृत्तियों और प्रवृत्तियों के कारण लोग दूर होने लगते हैं पर भीतर शांति नहीं आती जिससे अकेलापन कठोर हो जाता है और मन कटु रहने लगता है।।
सूर्य का दूषण अचानक नहीं होता यह धीरे-धीरे व्यवहार में उतरता है और सबसे पहले विवेक को ढकता है अतःयदि समय रहते व्यक्ति विनम्रता अपनाए और करुणा से जुड़े और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे तो सूर्य फिर से भी शुद्ध हो सकता है।।सूर्य का दोष चेतना की कठोरता से पैदा होता है और जब चेतना फिर से नरम होती हैतो सूर्य का शुभत्व पुनः भी प्राप्त होने लगता है।।
मैनें लिखने का प्रयास किया है आप समझने का प्रयास करें ताकि लेखन और अध्ययन दोनों सार्थक हो सकें।।
सबके अंदर सत्य स्वरूप में विराजमान भगवान सूर्य नारायण को सादर प्रणाम करता हूं।।
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