ध्यान और ज्योतिष
ध्यान को प्रायः आध्यात्मिक अभ्यास मान लिया जाता है और ज्योतिष को भविष्य बताने की विद्या। परंतु इन दोनों के मूल में एक ही तत्व कार्य करता है— चेतना।।ज्योतिष ग्रहों की भाषा में चेतना की अवस्थाओं का अध्ययन है,और ध्यान चेतना को प्रत्यक्ष अनुभव में लाने की प्रक्रिया।।ज्योतिष यह बताता है कि चेतना किस दिशा में प्रवाहित हो रही है जबकि ध्यान यह सिखाता है कि उस प्रवाह का स्वामी कैसे बना जाए।।
कुंडली में ग्रह केवल बाहरी घटनाओं के संकेत नहीं होते।।
वे मन की वृत्तियों, प्रवृत्तियों और प्रतिक्रियाओं के प्रतीक होते हैं।।चंद्र मन है,बुध बुद्धि हैशनि अनुशासन और धैर्य है,राहु-केतु असंतुलन और वैराग्य के द्वार हैं।।
जब मन अस्थिर होता है,तो चंद्र अशांत अनुभव होता है,जब निर्णय डगमगाते हैं,तो बुध दुर्बल प्रतीत होता है,जब जीवन बोझ लगता है,तो शनि पीड़ा देने लगता है।।
ध्यान यहाँ कोई उपाय नहीं,बल्कि ग्रहों के साथ सही संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया है।।ध्यान के माध्यम से मन को देखना शुरू होता है,देखने से दूरी बनती है,दूरी से नियंत्रण आता है।।यही वह बिंदु है जहाँ ज्योतिष और ध्यान एक हो जाते हैं।।जब व्यक्ति ध्यान में बैठता है,तो वह अपने भीतर उठने वाली हर ग्रह-प्रवृत्ति को साक्षी भाव से देखता है।।
क्रोध आए तो वह मंगल नहीं बन जाता,वह मंगल को देखता है।।असंतोष उठे वह राहु नहीं बन जाता,वह राहु को पहचान लेता है।।
वैराग्य जागे वह पलायन नहीं करता,वह केतु को समझ लेता है।।
यही साक्षी भाव ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम करता है।ध्यान ग्रहों को बदलता नहीं है अपितु ध्यान ग्रहों की पकड़ को ढीला करता है।।
जब मन स्थिर होता है,तो दशाएँ आती हैं, पर व्यक्ति डूबता नहींघटनाएँ घटती हैं,पर चेतना बिखरती नहीं।।
इसलिए ध्यान किसी ग्रह की दशा को रोकता नहीं,पर उसके अनुभव की तीव्रता को बदल देता है।।
शनि की दशा में ध्यान व्यक्ति को धैर्य सिखाता है,राहु की दशा में ध्यान विवेक जगाता है,केतु की दशा में ध्यान भय नहीं, बोध देता है।।
यही कारण है कि शास्त्रों में ध्यान को सबसे उच्च उपाय कहा गया है क्योंकि यह किसी एक ग्रह के लिए नहीं,
पूरी चेतना के लिए कार्य करता है।।
ध्यान से नवम भाव सक्रिय होता हैभाग्य नहीं, दृष्टि बदलती है।।ध्यान से द्वादश भाव शुद्ध होता है,पलायन नहीं, मुक्ति आती है।।
जो व्यक्ति नियमित ध्यान करता है,उसकी कुंडली अचानक उत्तम नहीं हो जाती पर उसकी प्रतिक्रिया-शक्ति बदल जाती है।।
और यही वास्तविक ग्रह-शांति है।।ज्योतिष बिना ध्यान के
केवल जानकारी बन सकता है।।ध्यान बिना ज्योतिष के
केवल अनुभूति रह सकता है।।
पर जब दोनों साथ आते हैं,तो मनुष्य भाग्य को कोसता नहीं,उसे समझकर पार करना सीखता है।।अंततः ध्यान ज्योतिष का विरोध नहीं है,ध्यान ज्योतिष की परिपूर्णता है क्योंकि ग्रह बाहर घूमते हैं,पर उनका अनुभव भीतर होता है।।और जो व्यक्ति भीतर को साध लेता है,उसके लिए ग्रह बाधा नहीं,शिक्षक बन जाते हैं।।
डॉ सुशील कश्यप
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