बुध की दशा
सभी नौ ग्रहों की महादशा में क्या न करें कि श्रृंखला प्रारंभ कर दी है।।प्रथम लेख बुध ग्रह पर लिखने का प्रयास किया है।।इस श्रृंखला में आपको चमत्कारी कुछ नहीं प्राप्त होगा किन्तु उपयोगी प्राप्त हो इसका सतत प्रयास है।।मेरी सफलता और असफलता का निर्णय आपका स्वतंत्र अधिकार है।।
बुध की महादशा मनुष्य के जीवन में विचार, वाणी और निर्णय को केंद्र में ले आती है।।इस काल में होने वाली भूलें कर्म से नहीं,बुद्धि के असंतुलन से जन्म लेती हैं।।
इसलिए इस महादशा में क्या करना है से पहले यह समझना आवश्यक है कि क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए।।
बुध की महादशा में मन अत्यंत सक्रिय हो जाता है।।विचारों की गति बढ़ जाती है और व्यक्ति अपनी हर सोच को सही मानने लगता है।।यहाँ सबसे पहली भूल जन्म लेती है हर विचार पर विश्वास करना,मन में उठे तर्क को अंतिम सत्य मान लेना और विचार आते ही निर्णय कर लेना।।
बुध विचार देता है,पर निर्णय का विवेक नहीं देता।।यदि विचारों को बिना जाँच स्वीकार किया जाए,तो वही बुद्धि भ्रम बन जाती है।।
इस महादशा में वाणी तीव्र और प्रभावशाली हो जाती है।।
व्यक्ति शब्दों से प्रभावित करना सीख जाता है और यहीं से अहंकार का प्रवेश होता है।।जो नहीं करना चाहिए वह है शब्दों से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना,कटाक्ष, व्यंग्य या दोहरे अर्थ का प्रयोग,हर चर्चा को बहस में बदल देना।।
बुध की महादशा में वाणी ही परीक्षा का माध्यम बनती है।।जो वाणी को नियंत्रित नहीं करता,वही इस दशा में स्वयं को हानि पहुँचाता है।।बुध की महादशा में चतुरता बढ़ती है।।त्वरित समाधान और शॉर्टकट आकर्षक लगते हैं।।यहाँ एक गहरी भूल होती है चालाकी को बुद्धिमत्ता समझ लेना जो कि नहीं करना चाहिए।।
छल का सहारा लेना,नियमों की उपेक्षा करना और बुद्धि से रास्ता काटने का प्रयास सर्वथा अनुचित होता है।।
यदि बुध नैतिक न रहे,तो वही बुद्धि बंधन और विवाद का कारण बन जाती है।।
बुध सूचना का ग्रह है और इस दशा में व्यक्ति सब कुछ जान लेना चाहता है जो नहीं करना चाहिए।।
अनावश्यक पढ़ना और सुनना लगातार मोबाइल,समाचार और सूचनाओं में डूबे रहना ज्ञान को बिना प्रयोग केवल जमा करते जाना सर्वदा हानिकारक होता है क्योंकि अधिक जानकारी स्पष्टता नहीं देती अपितु यह केवल भ्रम बढ़ाती है।।बुध शीघ्रता का ग्रह है अतः इस दशा में निर्णय जल्दी लिए जाते हैं जो बिल्कुल नहीं करना चाहिए।।
तुरंत हाँ या ना कहना या बिना पूरी जाँच निर्णय लेना या दबाव में प्रतिक्रिया देना सर्वथा वर्जित होता है बुध की दशा न हो तो भी वर्जित होता है।।इस महादशा में एक गलत निर्णय लंबे समय तक परिणाम देता है।।संबंधों के क्षेत्र में बुध तर्क को प्रधान बना देता है।।
भावनाओं को तर्क से काटना,हर बात में सही होने की ज़िद अथवा हर स्थिति को समझाने की मजबूरी सर्वथा वर्जित होती है।।संबंध तर्क से नहीं चलते अपितु कई बार मौन सबसे सही उत्तर होता है।।
बुध की महादशा में व्यक्ति अपनी ही बातों में उलझ जाता है।।
अतः जो नहीं करना चाहिए वह है अत्यधिक
आत्मसंवाद,बार-बार अतीत दोहराना कल्पनाओं में जीते रहना क्योंकि यह मानसिक ऊर्जा का सीधा क्षय है।।
इस दशा में लोग बाहरी उपायों की ओर अधिक भागते हैंअतः केवल रत्न पर निर्भर रहना,बिना समझ उपाय करना और उपाय को चेतना का विकल्प मान लेना सर्वथा वर्जित है क्योंकि बुध की महादशा में यदि दृष्टि नहीं बदली,तो कोई उपाय स्थायी फल नहीं देता।।
बुध की महादशा में कर्म की नहीं अपितुबुद्धि की शुद्धता की परीक्षा है।।
जो व्यक्ति अपने विचारों, शब्दों और निर्णयों में सजग नहीं रहता,उसके लिए यही दशा उलझन और विवाद बन जाती है और जो व्यक्ति अपने ही मन को देखना सीख लेता है,
उसके लिए बुध सबसे बड़ा शिक्षक बन जाता है।।
अतः बुध की महादशा में सबसे बड़ा निषेध है
अचेत बुद्धि।।
अल्पज्ञ ने पूर्ण सामर्थ्य से बताने का प्रयास किया है।
शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि कर्ता भी वही हैं और कारण भी वही हैं।।
सबके अंदर विराजमान भगवान शिव को सादर प्रणाम करता हूं।।
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