ज्योतिष का विकृत रूप
कल व्हाट्सएप में एक जिज्ञासु ने विचित्र प्रश्न किया तो लिखने से स्वयं को रोक नहीं पाया।।
प्रश्न यह था कि उन्होंने एक नामी ज्योतिषी के पास कुंडली विश्लेषण के लिए भेजी थी तो ज्योतिषी महाराज ने उन्हें भगवान शिव, माता महाकाली और श्री काल भैरव की आराधना वर्जित बताई है।।
अब वह मित्र मुझ से यह पूछ रहे थे कि सलाह उचित है या अनुचित है।।
यह सब पढ़कर मैं अचंभित रह गया और मैनें उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि उत्तर देता तो प्रश्न कर्ता की ही भावना आहत हो जाती।।
ऐसे ज्योतिषी के पास जाकर ऐसी मूर्खतापूर्ण सलाह लेना कहां कि बुद्धिमानी है और इसके पश्चात उसका सत्यापन मेरे से करा रहे हैं जिसका जीवन ही भगवान शिव की कृपा से है जिसने इष्ट ही श्री काल भैरव जी महाराज हैं।।
खैर ये ज्योतिषी ऐसे उल्टे सीधे उपाय कहां से उठाकर लाते हैं नारायण ही जानते हैं।।
कोई काला शूरमा शमशान में दबवा रहा है तो कोई नित्य 21 बार दीवार बनवा कर गिरवा रहा है।।
ज्योतिष शास्त्र की मर्यादा को खंडित करने का पूरा कार्यभार इन्होंने स्वयं के कंधों पर उठा लिया है और नित्य इसके लिए कठिन परिश्रम कर भी रहे हैं।।
बच्चे को सोना न पहनाए,कान में घोड़े की नाल लटका लें,हनुमान जी के मंदिर न जाएं यह सब हास्यास्पद नहीं है तो और क्या है।।
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कह रहे हैं कि
जो तप करही कुमारी तुम्हारी भावी मेट सकहीं त्रिपुरारी और ज्योतिषी कह रहे हैं कि भगवान शिव की आराधना न करें अन्यथा व्यापार चौपट हो जाएगा।।
यह सब इन्होंने किस शास्त्र में पढ़ा है।। पिता में भृगु और महर्षि पराशर ने ऐसा क्यों नहीं लिखा।। महर्षि अगस्त्य इन सब उल्टे सीधे उपाय से क्यों अनभिज्ञ रह गए।।
जिन्हें हर स्थान पर केवल भगवान शिव ही दिखाई देते थे वह जगतगुरु भगवान शंकराचार्य स्वर्ण की वर्षा करवा देते थे।। महान शिव भक्त दशानन रावण सोने से बनी लंका नगरी में निवास करता था तो रावण के जीवित रहते कभी लंका नगरी दरिद्र क्यों नहीं हुई।।
ऐसा कभी अध्ययन या श्रवण नहीं हुआ कि लंका में भूखमरी आई थी या कभी रावण को कर्ज हो गया हो।।
भगवान शिव के ऐसे अद्भुत और चमत्कारी अनुष्ठान तंत्र में है जिनके द्वारा अनंत जन्मों की दरिद्रता समाप्त की जा सकती है।।
भगवान शिव के त्रिलोक विजय अनुष्ठान को करने वाला कभी चुनाव नहीं हारता है युद्ध भी नहीं हार सकता है।।
खैर युद्ध का तो अब कालखंड ही समाप्त हो चुका है निजी युद्ध इत्यादि सब मात्र बातों में ही रह गए हैं।।
दारिद्र दहन स्तोत्र के निरंतर पाठ करने से ही धन की स्तिथि अनुकुल होने लगती है।।
खैर ज्योतिष शास्त्र की मर्यादा को खंडित करने वाले इन ज्योतिषियों से सावधान रहना जातक का निजी कर्तव्य है।।
प्राप्त हो रहे कष्टों में कमी करने के लिए सतत और गहन साधना करनी पड़ती है।।
अतः सब चमत्कारी और विचित्र उपाय ढूंढ़ने लगते हैं क्योंकि साधना गहन पुरुषार्थ का विषय है और आज के युग में पुरुषार्थ के नाम पर बस खेल तमाशा ही शेष रह गया है।।
खैर पोस्ट ज्यादा लंबी होने लगी है पोस्ट लिखने का मात्र उद्देश्य यही है ज्योतिष शास्त्र अंधेरे में मार्ग दिखाने का शास्त्र है मार्ग से भटकने का शास्त्र नहीं है।।
ज्योतिषी वही है जो सही मार्ग दिखाने का प्रयास करें।। गलत और अनुचित मार्ग दिखाने वाला कुछ भी हो ज्योतिषी नहीं हो सकता है।।
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