केतु: एक ज्योतिषीय विश्लेषण
ज्योतिष में केतु को मौन, वैराग्य, अंतर्मुखी और कर्मों के सूक्ष्म फल का ग्रह माना गया है।। केतु का स्वभाव भीतर की ओर ले जाने वाला होता है अतः यह ग्रह बाहरी शोर, दिखावे और शब्दों के फैलाव से दूर रहना सिखाता है।। केतु न तो अपनी पीड़ा को बार-बार कहने में विश्वास रखता है और न ही दूसरों से सहानुभूति माँगने में अतः उसका मार्ग शांत, गूढ़ और आत्मनिरीक्षण से भरा होता है।।केतु व्यक्ति को यह सिखाता है कि जीवन की गहरी समस्याओं का समाधान बाहर बोलने से नहीं, भीतर समझने से निकलता है अतः जब व्यक्ति अपनी समस्याओं, दुखों और पीड़ाओं का हर जगह बखान करता है, तो वह अनजाने में अपने ही घावों को बार-बार कुरेदता है और इससे समस्या हल होने के बजाय और गहरी हो जाती है क्योंकि केतु का कष्ट शब्दों से हल्का नहीं होता, बल्कि अनुभवों को स्वीकार करने से शुद्ध होता है।।
बार-बार अपनी पीड़ा को दोहराने से मन उसी दुख में अटक जाता है जिससे व्यक्ति स्वयं को पीड़ित की भूमिका में देखने लगता है और चित्त आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौट-लौटकर उसी वेदना में उलझा रहता है और यही कारण है कि ऐसे लोगों में धीरे-धीरे भय, अकेलापन, भ्रम, अनिद्रा और आंतरिक बेचैनी बढ़ने लगती है।। यह सब केतु की वह शिक्षा है, जो व्यक्ति को बाहरी सहारों से हटाकर भीतर की यात्रा के लिए बाध्य करती है।।
केतु का मार्ग मौन का मार्ग है।। जब व्यक्ति अपनी पीड़ा को सहन कर, शांत होकर उसे समझने का प्रयास करता है, तब केतु उसे अंतर्दृष्टि देता है जिससे उस स्थिति में दुख अनुभव बन जाता है और अनुभव से ज्ञान जन्म लेता है लेकिन जब वही पीड़ा बार-बार लोगों को सुनाने, सहानुभूति पाने या स्वयं को सही साबित करने के लिए कही जाती है, तो केतु उस पीड़ा को और गहरा कर देता है, ताकि व्यक्ति शब्दों से नहीं, मौन से सीख सके।।
ज्योतिषी शास्त्र की दृष्टि से केतु का कुछ शमन वाणी के संयम से भी होता है क्योंकि हर बात कहना आवश्यक नहीं होतीकुछ अनुभव केवल भीतर रखने के लिए होते हैं अतः कम बोलना, अधिक देखना और जो घट रहा है उसे बिना विरोध स्वीकार करना यही केतु की साधना है।। जहाँ व्यक्ति मौन में टिकना सीख लेता है, वहीं केतु का कष्ट धीरे-धीरे शांत होने लगता है।।
जितना जान पाया उतना बताने का प्रयास किया है शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब शिव हैं।।
डॉ सुशील कश्यप
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