लग्न में उपस्थित केतु
केतु पर जितना भी लिख दिया जाए कुछ न कुछ अधूरा रह ही जाता है।।बहुत से मित्रों ने प्रथम भाव में केतु चंद्र की युति पर लिखने का आग्रह किया है।।
जब जन्मकुंडली के प्रथम भाव अर्थात लग्न में केतु और चंद्रमा की युति बनती है तब यह योग व्यक्ति के स्वभाव व्यक्तित्व और मन पर गहरा प्रभाव डालता है।।वैदिक ज्योतिष में लग्न को संपूर्ण कुंडली का आधार माना गया है।।यह शरीर प्रकृति जीवन दृष्टि और व्यक्ति के बाहरी व्यक्तित्व को दर्शाता है।।चंद्रमा मन भावनाओं स्मृति और मानसिक स्थिरता का कारक है जबकि केतु एक छाया ग्रह होकर विरक्ति सूक्ष्म अनुभव अंतर्मुखता और पूर्वजन्म के संस्कारों का संकेत देता है।।जब चंद्रमा के साथ केतु लग्न में स्थित होता है तब जातक का मानसिक ढाँचा सामान्य लोगों से कुछ अलग दिखाई देता है।।कई प्राचीन ज्योतिषीय मतों में चंद्र-केतु की युति को ग्रस्त चंद्र अर्थात ग्रहण योग की स्थिति के रूप में भी देखा गया है।।इसका अर्थ यह नहीं कि यह योग केवल अशुभ ही होगा अपितु यह मन को अत्यंत संवेदनशील और गहराई से अनुभव करने वाला बना देता है।।ऐसे जातकों का मन बहुत सूक्ष्म स्तर पर कार्य करता है।।वे छोटी छोटी घटनाओं को भी भीतर तक महसूस कर लेते हैं।।कई बार उनके भीतर विचारों और भावनाओं का प्रवाह इतना गहरा होता है कि वे उसे सहज रूप से व्यक्त ही नहीं कर पाते हैं और यही कारण है कि ऐसे लोग कई बार रहस्यमय अंतर्मुखी या सामान्य सामाजिक व्यवहार से कुछ अलग प्रतीत होते हैं।।यदि चंद्रमा निर्बल हो क्षीण हो या उस पर शनि अथवा मंगल जैसे पापग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो मन में अनिश्चितता संशय अज्ञात प्रकार की चिंता या मानसिक अस्थिरता देखी जा सकती है।।कई बार जातक स्वयं ही अपने मन को ठीक से समझ नहीं पाता और मन के उतार चढ़ाव से प्रभावित रहता है।।किन्तु यदि चंद्रमा शुभ स्थिति में हो शुक्ल पक्ष का हो या उस पर गुरु अथवा शुक्र जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यही योग अत्यंत गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।।ऐसे व्यक्ति सामान्य से अधिक सूक्ष्म और निरीक्षण की शक्ति रखते हैं।।वे लोगों के मनोभावों को जल्दी समझ लेते हैं और जीवन के गूढ़ पक्षों की ओर सरल स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं।।अक्सर देखा गया है कि प्रथम भाव में चंद्र केतु की युति वाले जातक ज्योतिष दर्शन, मनोविज्ञान, अध्यात्म या अन्य गूढ़ विषयों की ओर सहज रूप से झुकाव रखते हैं।।उनके भीतर में संसार को केवल बाहरी रूप से नहीं बल्कि उसके गहरे अर्थों में समझने की प्रवृत्ति होती है।।
युति का पूर्ण फल चंद्र अथवा केतु की महादशा में ही प्राप्त होता है किन्तु ऐसे जातक सामान्यतः मानसिक तनाव और दबाव आजीवन महसूस करते हैं।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है शेष सब भगवान शिव के अधीन है।।
हर हर महादेव
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