केतु

केतु को ज्योतिष में एक ऐसा ग्रह माना गया है जो बाहर से कम और भीतर से अधिक काम करता है।।इसका असर शरीर के दिखने वाले भाग से ज्यादा हमारे नाड़ी तंत्र और मन के सूक्ष्म स्तर पर पड़ता है।।यही कारण है कि केतु का प्रभाव समझना थोड़ा कठिन होता है क्योंकि यह सीधे दिखाई नहीं देता, बल्कि अनुभव होता है।।केतु का संबंध हमारे अवचेतन मन से होता है।।यह मन के गहरे हिस्सों को सक्रिय करता है जहाँ हमारी पुरानी स्मृतियाँ संस्कार और अनदेखे भाव छिपे होते हैं।।जब केतु सक्रिय होता है, तो नाड़ी तंत्र कभी बहुत तेज प्रतिक्रिया देता है और कभी बिल्कुल शांत हो जाता है।।इसी कारण व्यक्ति कभी अत्यधिक संवेदनशील और कभी एकदम अलग-थलग महसूस कर सकता है।।
नाड़ियों की बात करें तो इड़ा पिंगला और सुषुम्ना इन तीनों पर केतु का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।।यदि केतु चंद्रमा से जुड़ जाए तो मन में बेचैनी,अधिक सोच और भावनात्मक उतार चढ़ाव देखने को मिलते हैं।।यदि सूर्य या मंगल से संबंध हो तो चिड़चिड़ापन जल्दी प्रतिक्रिया देना और अंदर एक तरह की घबराहट बनी रह सकती है।।लेकिन केतु का सबसे गहरा असर सुषुम्ना नाड़ी पर माना गया है।।यही वह मार्ग है जो ध्यान और आध्यात्म से जुड़ा होता है।।जब यह संतुलित रूप से सक्रिय होती है तो व्यक्ति को ध्यान में शांति भीतर स्थिरता और सूक्ष्म अनुभव होने लगते हैं।।लेकिन यदि संतुलन न हो तो शरीर में झनझनाहट अजीब कंपन या बिना कारण घबराहट भी महसूस हो सकती है।।यदि कुंडली में केतु अशांत हो जैसे उस पर शनि या राहु का प्रभाव हो या वह कठिन भावों में बैठा हो तो नाड़ी तंत्र पर इसका असर स्पष्ट दिखता है।। जैसे अनिद्रा  घबराहट नसों में खिंचाव अचानक डर या बिना कारण तनाव और ये समस्याएँ अक्सर समझ में नहीं आतीं, क्योंकि इनके पीछे कोई स्पष्ट बाहरी कारण नहीं होता।।वहीं यदि केतु संतुलित और शुभ हो तो यही नाड़ी तंत्र बहुत सूक्ष्म और जागरूक हो जाता है।।व्यक्ति कम शब्दों में अधिक समझने लगता है।।उसकी अंतर्ज्ञान शक्ति बढ़ जाती है और ध्यान में आसानी से गहराई आने लगती है।।ऐसे लोग बिना कहे ही सामने वाले की भावना समझ लेते हैं।।अंत में समझने वाली बात यह है कि केतु न तो केवल कष्ट देता है और न ही केवल आध्यात्मिक उन्नति अपितु यह दोनों के बीच की एक सूक्ष्म अवस्था पर काम करता है।।यदि संतुलन हो तो यही नाड़ी तंत्र साधना का माध्यम बन जाता है और यदि असंतुलन हो जाए तो यही तंत्र बेचैनी और भ्रम का कारण बन सकता है।।

डॉ सुशील कश्यप 

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