बारहवें भाव में स्थित केतु
बारहवें भाव में स्थित केतु को अनुकूल या प्रतिकूल कह देना सही नहीं होता क्योंकि इसका फल पूरी तरह भाव स्वामी दृष्टि और दशा पर निर्भर करता है।। बारहवाँ भाव व्यय हानि एकांत निद्रा विदेश अस्पताल कारावास गुप्त जीवन और मोक्ष से संबंधित है।।केतु स्वभाव से ही त्याग विच्छेद और पूर्वजन्मी संस्कारों का ग्रह है इसलिए बारहवें भाव में यह अपने मूल स्वभाव के अनुरूप कार्य करता है।।इस स्थिति में जातक के जीवन में अनियंत्रित या अनपेक्षित व्यय स्पष्ट रूप से देखा जाता है।।यह व्यय विलास पर नहीं बल्कि ऐसी परिस्थितियों पर होता है जिन्हें टाला नहीं जा सकता जैसे उपचार, स्थान परिवर्तन, विदेश संबंधी खर्च, एकांत जीवन या सेवा कार्य और यदि द्वितीय और एकादश भाव कमजोर हों तो धन संचय कठिन हो जाता है पर यह स्थिति अपने आप में दरिद्र योग नहीं बनाती।।
बारहवें भाव का केतु जातक को अकेले रहने की प्रवृत्ति देता है।।यह सामाजिक असफलता नहीं अपितु समाज से अरुचि होती है।।व्यक्ति भीड़ से बचता है निजी जीवन को गोपनीय रखना चाहता है और सीमित संपर्क पसंद करता है।।कार्यक्षेत्र में ऐसे जातक पर्दे के पीछे काम करने वाले, शोध, लेखन, सेवा, चिकित्सा, विदेश या संस्थागत कार्यों से जुड़े हो सकते हैं।।मानसिक स्तर पर यह स्थिति नींद के विकार देती है जिसके कारण खंडित नींद अनिद्रा अधिक स्वप्न या नींद में बेचैनी इसके सामान्य संकेत हैं और यदि चंद्रमा कमजोर या पीड़ित हो तो यह मानसिक थकान भ्रम या अस्थिरता बढ़ा सकता है।।
अब दशा महादशा की दृष्टि से भी समझने का प्रयास करते हैं जब केतु की महादशा चलती है और केतु बारहवें भाव में स्थित हो तब बारहवें भाव के सभी विषय प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय हो जाते हैं।।इस काल में व्यय बढ़ता है जीवन में एकांत बढ़ता है और व्यक्ति अपने ही जीवन से दूरी महसूस करता है।।सामाजिक संबंध सीमित हो जाते हैं और कई बार जातक स्वयं ही संबंधों से पीछे हटता है।।
केतु महादशा में यदि द्वादशेश कमजोर हो, तो स्थान से परिवर्तन, नौकरी में अस्थिरता या कार्य से विरक्ति देखी जा सकती है परन्तु यदि द्वादशेश और लग्न मजबूत हों तो यही दशा विदेश, साधना, सेवा या शांत जीवन की ओर ले जाती है।।
केतु की महादशा और विशेषकर केतु, चंद्र या सूर्य की अंतर्दशा में मानसिक कटाव, निर्णयों में भ्रम और जीवन के प्रति अरुचि बढ़ सकती है।।व्यक्ति कार्य करता है, पर उसमें मन नहीं लगता।।यह अवस्था अस्थायी होती है जब तक अन्य प्रमुख भाव अति कमजोर और दुर्बल न हों।।गुरु या शुक्र की अंतर्दशा में यही केतु संतुलित फल देने लगता है तब व्यय उपयोगी होता है, जीवन सरल बनता है और व्यक्ति अनावश्यक बोझ से मुक्त होता जाता है।।केतु की महादशा में सबसे कठिन कालखंड राहु और शनि की अंतर्दशा का होता है और यदि अन्य ग्रहों की स्थिति विपरीत हुई तो भीषण कष्टकारी भी होता है।।
बारहवें भाव का केतु न तो जीवन नष्ट करता है और न ही स्वतः मोक्ष देता है यह केवल उन क्षेत्रों में विरक्ति और क्षय लाता है जहाँ जातक अनावश्यक रूप से उलझा हुआ होता है।।यह केतु संसार छोड़ने का योग नहीं बल्कि संसार की पकड़ ढीली करने का संकेत देता है और यही इसका वास्तविक, शुद्ध और व्यवहारिक ज्योतिषीय फल है।।
ज्योतिष शास्त्र भाग्य जानने से कहीं अधिक जीवन को समझने और सरल बनाने की विधा है।।अतः कष्ट के समय ज्योतिषी के पास जाने से कहीं ज्यादा उचित है कि स्वयं ज्योतिष शास्त्र का सामान्य अध्ययन किया जाए ताकि स्वयं के जीवन को समझ पाएं।।
डॉ सुशील कश्यप
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