अष्टम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति का प्रभाव
अष्टम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति पर लिखने का प्रयास प्रारंभ किया है।। अष्टम भाव की स्थिति अत्यंत गूढ़ और जटिल होने के कारण इस लेख को लिखना सरल नहीं है फिर भी लिखने का प्रयास कर रहे है,
अष्टम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति को सामान्यतः सहज फल देने वाला ग्रह नहीं माना गया है परन्तु इसे केवल निर्बल या निष्फल मानना भी उचित नहीं है।।अष्टम भाव आयु आकस्मिक घटनाएँ गुप्त धन रहस्य, रोग भय परिवर्तन और गहन मानसिक प्रक्रियाओं से संबंधित होता है।। जब गुरु जैसे धर्म, ज्ञान, विस्तार और संरक्षण देने वाले ग्रह भाव में स्थित होते है तब इसके परिणाम अति जटिल हो जाते हैं।।अष्टम भाव का गुरु व्यक्ति के जीवन में स्थिरता की अपेक्षा उतार-चढ़ाव अधिक देता है।। ऐसे जातक को जीवन में अचानक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, विशेषकर शिक्षा विश्वास आर्थिक सुरक्षा और संबंधों के क्षेत्र में विशेष सावधानी रखनी जरूरी हो जाती है।।गुरु यहाँ अपने स्वभाव के अनुसार रक्षा करता है पर वह रक्षा संकट को रोककर नहीं बल्कि संकट की सीमा तय करके करता है।।अष्टम में स्थित गुरु दीर्घायु की रक्षा करता है पर पूर्ण स्वास्थ्य का आश्वासन नहीं देता।।यह व्यक्ति को रोगों के प्रति सजग बनाता है और चिकित्सा अनुसंधान या गूढ़ विषयों में रुचि उत्पन्न कर सकता है।।यदि गुरु शुभ राशि स्वगृही या उच्च प्रभाव में हो, तो जातक को आकस्मिक लाभ, बीमा पैतृक संपत्ति या दूसरों के संसाधनों से सहायता मिल सकती है परन्तु वह सहायता भी अनियमित और परिस्थितिजन्य होती है।।
अष्टम भाव में गुरु विवाह और दांपत्य जीवन पर भी प्रभाव डालता है।।जीवनसाथी या ससुराल पक्ष से जुड़ी जिम्मेदारियाँ स्वास्थ्य या आर्थिक उतार-चढ़ाव संभव हैं।। गुरु यहाँ संबंधों में नैतिकता बनाए रखने का प्रयास करता है, पर अष्टम भाव की मूल प्रकृति के कारण स्थिर सुख में विलंब होता है।। ऐसे जातक का ज्ञान पुस्तकीय कम और परिस्थिति से अधिक होता है।।ज्योतिष, तंत्र मंत्र शोध मनोविज्ञान चिकित्सा या गुप्त विषयों में यह गुरु विशेष रुचि दे सकता है विशेषकर जब चंद्र, केतु या शनि से संबंध बने हों।।यदि अष्टम भाव का गुरु पापग्रहों से पीड़ित हो या नीच राशि में हो तो व्यक्ति को भय अविश्वास गुप्त शत्रु ऋण या नैतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।। ऐसे में गुरु का संरक्षण कमजोर पड़ता है और जातक मार्गदर्शन के अभाव में गलत निर्णय ले सकता है परन्तु यदि गुरु शुभ दृष्टियों से युक्त हो, त्रिकोण या केंद्र से संबंध बनाए, अथवा नवांश में बलवान हो तो यही गुरु अष्टम भाव के नकारात्मक प्रभावों को काफी हद तक संतुलित कर देता है।।जातक कठिन परिस्थितियों से निकलने की क्षमता प्राप्त करता है और जीवन के उत्तरार्ध में अधिक स्थिरता देखी जाती है।।अष्टम भाव में स्थित देवगुरु यह संकेत देता है कि जीवन में प्राप्त होने वाला ज्ञान सरल मार्ग से नहीं बल्कि अनुभव संकट और परिवर्तन के माध्यम से आता है।।यह गुरु तत्काल फल नहीं देता, पर लंबे अंतराल में व्यक्ति को मानसिक स्थिरता और निर्णय क्षमता प्रदान करता है।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है।।
डॉ सुशील कश्यप
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