ओवर थिंकिंग अर्थात विचारों का लगातार अनियंत्रित रूप या मानसिक समस्या पर ज्योतिषीय दृष्टिकोण

ओवर थिंकिंग अर्थात विचारों का लगातार और अनियंत्रित रूप से चलते रहना आज के समय में एक मानसिक समस्या मानी जाती है लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह कोई नई बात नहीं है।।शास्त्रीय ज्योतिष इसे मन,चित्त और बुद्धि के असंतुलन के रूप में देखता है अतः जब मन बार-बार भविष्य, आशंका, भय और कल्पनाओं में उलझ जाता है और वर्तमान क्षण से कट जाता है, तब व्यक्ति भीतर ही भीतर थकने लगता है जिसके कारण निर्णय लेने में कठिनाई होती है मन बेचैन रहता है और मानसिक शांति धीरे-धीरे कम होने लगती है।। मन का प्रतिनिधित्व चंद्रमा करता है जब चंद्रमा कमजोर होता है या राहु, शनि अथवा बुध के प्रभाव में आ जाता है, तब मन स्थिर नहीं रह पाता।।ऐसा व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को भी बार-बार सोचता है, एक ही विषय को कई बार मन में घुमाता है और किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता है चंद्रमा की यही अस्थिरता मानसिक तनाव की सबसे बड़ी जड़ बन जाती है।।
बुध ग्रह विचार, तर्क और सोचने की क्षमता से जुड़ा हुआ है अतः जब बुध बहुत अधिक सक्रिय हो जाता है  राहु के साथ या शनि की दृष्टि में, तब सोच आवश्यकता से अधिक तेज हो जाती है।।व्यक्ति हर बात का जरूरत से ज्यादा विश्लेषण करने लगता है भविष्य के नकारात्मक परिणामों को पहले ही जीने लगता है और इसी प्रक्रिया में मानसिक रूप से थक जाता है और  यह बुद्धि की शक्ति नहीं बल्कि बुद्धि का असंतुलन है।।राहु ओवर थिंकिंग को और बढ़ाने का काम करता है क्योंकि राहु कल्पना, भ्रम और भविष्य की चिंता को गहरा करता है।।इसके प्रभाव में व्यक्ति वास्तविक समस्याओं से अधिक उन बातों पर सोचता है जो अभी घटित ही नहीं हुई हैं और जो शायद कभी होंगी भी नहीं, वही मन पर छा जाती हैं इसी कारण राहु-चंद्र या राहु-बुध के प्रभाव में विचारों का अंतहीन प्रवाह देखा जाता है।।शनि इस सोच को गंभीर और भारी बना देता है जब शनि चंद्र या बुध से जुड़ता है तब विचारों में भय, जिम्मेदारी और अतीत की स्मृतियाँ अधिक आने लगती हैं।।व्यक्ति बार-बार अपनी पुरानी गलतियों, अधूरी जिम्मेदारियों और संभावित असफलताओं के बारे में सोचता है।।शनि मन को भीतर की ओर मोड़ देता है, जहाँ विचार रुकते नहीं, बल्कि और गहरे होते चले जाते हैं।।
ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से ओवर थिंकिंग केवल ग्रह स्थिति का ही परिणाम नहीं होती बल्कि दशा और अंतर्दशा से भी जुड़ी होती है।।कई बार कुंडली सामान्य होती है, लेकिन चंद्र, राहु या बुध की दशा आने पर यह समस्या उभरने लगती है।।इससे यह स्पष्ट होता है कि ओवर थिंकिंग कोई स्थायी दोष नहीं,बल्कि समय के साथ बदलने वाली मानसिक अवस्था है, जिसे समझदारी और संतुलन से नियंत्रित किया जा सकता है।।शास्त्र यह नहीं कहते कि अधिक सोचना गलत है अपितु समस्या तब बनती है जब सोच कर्म से अलग हो जाती है।।ज्योतिष का मूल सिद्धांत यही है कि विचार कर्म को दिशा दें, न कि कर्म को रोक दें अतः जब मन केवल सोच में उलझा रहता है और कर्म रुक जाता है, तब जीवन में ठहराव, असंतोष और निराशा जन्म लेने लगती है।।इसलिए ज्योतिष की दृष्टि से ओवर थिंकिंग कोई अभिशाप नहीं है अपितु यह इस बात का संकेत है कि मन और बुद्धि के बीच संतुलन बिगड़ रहा है इसका समाधान भय में नहीं, बल्कि आत्मबोध में है क्योंकि ग्रह संकेत देते हैं, मजबूर नहीं करते और जब व्यक्ति अपने मन की प्रकृति को समझ लेता है तब वही अधिक सोचने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे विवेक  और आत्मज्ञान का साधन भी बन सकती है।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है शेष सब भगवान शिव के अधीन है।।

डॉ सुशील कश्यप 

Comments

Popular posts from this blog

अज्ञात भय

वैदिक ज्योतिष और नवम भाव

वीणा योग