नित्य सुनाई दिखाई देने वाले भ्रामक ज्योतिषीय सूत्र: राहु दस में दुनिया बस में

राहु दस में दुनिया बस में यह वाक्य सुनने में बहुत अच्छा  लगता है, पर जीवन की वास्तविकता इससे मेल नहीं खाती है क्योंकि व्यवहार में बार-बार देखा जाता है कि दशम भाव में राहु होने पर भी बहुत से लोग जीवन में कोई ठोस काम नहीं कर पाते।।वे सोचते बहुत हैं करना बहुत चाहते हैं पर उनका जीवन आगे नहीं बढ़ता और यही तथ्य इस कथन की सच्चाई पर सबसे बड़ा प्रश्न लगा देता है।।
दशम भाव कर्म का भाव है और  यह बताता है कि व्यक्ति अपने जीवन में क्या करेगा और कैसे करेगा  राहु इस भाव में आकर कर्म को साफ नहीं करता, बल्कि उसे उलझा देता है व्यक्ति के मन में कई इच्छाएँ होती हैं, पर यह तय नहीं हो पाता कि सही दिशा कौन-सी है।।उसका आज कुछ करने का मन होता है कल कुछ और और इसी कारण प्रयास बिखर जाते हैं और कोई परिणाम नहीं मिलता है।।ऐसे अनेक जातक होते हैं जिनकी कुंडली में राहु दशम में है पर वे नौकरी में टिक नहीं पाते या बार-बार काम बदलते हैं।।व्यवसाय शुरू करते हैं पर उसे चला नहीं पाते।।समाज में पहचान बनाने की इच्छा रहती है, पर उसके लिए आवश्यक धैर्य और निरंतरता नहीं बन पाती अतः धीरे-धीरे हताशा बढ़ती है और व्यक्ति स्वयं को असफल मानने लगता है।।
राहु दशम में व्यक्ति को जल्दी परिणाम चाहिए जिसके कारण वह मेहनत की लंबी प्रक्रिया से बचना चाहता है।। जब तुरंत सफलता नहीं मिलती है तो मन टूट जाता है।। फिर नया रास्ता खोजा जाता है, पर वहाँ भी वही स्थिति दोहराई जाती है और इस चक्र में जीवन का कीमती समय निकल जाता है और अंत में हाथ खाली रह जाता है।।
इस स्थिति में तुलना भी बहुत बढ़ जाती है जिसके कारण व्यक्ति दूसरों की प्रगति देखकर स्वयं को छोटा समझने लगता है।।वह यह भूल जाता है कि हर किसी का रास्ता अलग होता है।।तुलना मन को कमजोर करती है और कर्म से दूर ले जाती है अतः धीरे-धीरे व्यक्ति प्रयास करना ही छोड़ देता है।।राहु जहाँ भी होता है वहाँ असंतोष देता है।।दशम भाव में यह असंतोष काम से जुड़ जाता है।। व्यक्ति जो भी करता है, उससे संतुष्ट नहीं होता है थोड़ी परेशानी आते ही वह काम छोड़ देता है।।इसी कारण कोई भी काम पूरा नहीं हो पाता और जीवन में स्थिरता प्राप्त नहीं होती है।।यदि कुंडली में दशम भाव दशमेश और शनि कमजोर हों तो राहु दशम व्यक्ति को ऊपर नहीं उठाता बल्कि भ्रम में डाल देता है।।बाहर से वह बहुत योजनाएँ बनाता दिखता है पर भीतर से वह असमंजस में रहता है।।ऐसी अवस्था में व्यक्ति दुनिया को बस में करना तो दूर अपने जीवन को भी संभाल नहीं पाता है।।इसलिए यह मान लेना कि राहु का दशम भाव में होना ही सफलता की गारंटी है एक भ्रम है।।ज्योतिष में ग्रह रास्ता दिखाते हैं, मंज़िल तय नहीं करते अतः राहु दशम में इच्छा तो देता है, पर दिशा नहीं देता यदि व्यक्ति धैर्य,अनुशासन और निरंतर कर्म नहीं अपनाता तो यही राहु उसे जीवन में कुछ भी न कर पाने की स्थिति तक भी पहुंचाते देखा गया है।।
शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब शिव हैं।।

डॉ सुशील कश्यप 

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