केतु: एक ज्योतिषीय विश्लेषण
ज्योतिष में केतु को मौन, वैराग्य, अंतर्मुखी और कर्मों के सूक्ष्म फल का ग्रह माना गया है।। केतु का स्वभाव भीतर की ओर ले जाने वाला होता है अतः यह ग्रह बाहरी शोर, दिखावे और शब्दों के फैलाव से दूर रहना सिखाता है।। केतु न तो अपनी पीड़ा को बार-बार कहने में विश्वास रखता है और न ही दूसरों से सहानुभूति माँगने में अतः उसका मार्ग शांत, गूढ़ और आत्मनिरीक्षण से भरा होता है।।केतु व्यक्ति को यह सिखाता है कि जीवन की गहरी समस्याओं का समाधान बाहर बोलने से नहीं, भीतर समझने से निकलता है अतः जब व्यक्ति अपनी समस्याओं, दुखों और पीड़ाओं का हर जगह बखान करता है, तो वह अनजाने में अपने ही घावों को बार-बार कुरेदता है और इससे समस्या हल होने के बजाय और गहरी हो जाती है क्योंकि केतु का कष्ट शब्दों से हल्का नहीं होता, बल्कि अनुभवों को स्वीकार करने से शुद्ध होता है।। बार-बार अपनी पीड़ा को दोहराने से मन उसी दुख में अटक जाता है जिससे व्यक्ति स्वयं को पीड़ित की भूमिका में देखने लगता है और चित्त आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौट-लौटकर उसी वेदना में उलझा रहता है और यही कारण है कि ऐसे लोगों में धीरे-धीरे भय, अकेलापन...