मधुमेह (Diabetes):- यह रोग अचानक नहीं आता—कुंडली पहले ही संकेत दे देती है,
मधुमेह का संबंध सीधे तौर पर शुक्र, बृहस्पति और चंद्रमा से जुड़ा होता है। शुक्र शरीर में शर्करा और सुख का कारक है, बृहस्पति वृद्धि और metabolism का प्रतिनिधि है, जबकि चंद्रमा शरीर और मन की स्थिति को दर्शाता है। जब ये ग्रह असंतुलित होते हैं, तब शरीर भी संतुलन खो देता है।
कुंडली में कुछ विशेष योग और स्थितियाँ मधुमेह की ओर संकेत करती हैं:
जब शुक्र कमजोर, नीच का, या पाप ग्रहों (शनि, राहु, केतु, मंगल) से पीड़ित हो जाए, तब शरीर में शुगर का असंतुलन बढ़ने लगता है। विशेष रूप से यदि शुक्र 6वें, 8वें या 12वें भाव में हो और उस पर पाप दृष्टि हो, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।
बृहस्पति का दोष भी यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है। यदि बृहस्पति छठे भाव में हो, या राहु/शनि के प्रभाव में हो, तो शरीर की इंसुलिन प्रणाली प्रभावित होती है। कई बार यह व्यक्ति को धीरे-धीरे मधुमेह की ओर ले जाता है, खासकर 35 के बाद।
चंद्रमा यदि कमजोर हो, अमावस्या के आसपास जन्म हो, या राहु से ग्रसित हो, तो व्यक्ति की मानसिक स्थिति और हार्मोनल बैलेंस दोनों प्रभावित होते हैं। यही असंतुलन आगे चलकर मधुमेह का रूप ले सकता है।
एक और महत्वपूर्ण संकेत है छठा भाव (रोग स्थान)। यदि छठे भाव में शुक्र, बृहस्पति या चंद्रमा पीड़ित अवस्था में हों, या छठे भाव का स्वामी कमजोर हो, तो यह शरीर में chronic diseases का संकेत देता है—जिसमें मधुमेह प्रमुख है।
राहु का प्रभाव आधुनिक बीमारियों से जुड़ा हुआ है। जब राहु शुक्र या बृहस्पति के साथ युति करता है, या उन पर दृष्टि डालता है, तो यह “मीठा ज़हर” जैसा प्रभाव देता है—यानी धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी, जो तुरंत पकड़ में नहीं आती।
नक्षत्र स्तर पर देखें तो ज्येष्ठा, अश्लेषा, और शतभिषा नक्षत्र में स्थित ग्रह, विशेषकर यदि पीड़ित हों, तभी मधुमेह प्रकट होता है।
दशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अक्सर देखा गया है कि जब व्यक्ति शुक्र, राहु या बृहस्पति की दशा/अंतरदशा में प्रवेश करता है,
डॉ सुशील कश्यप
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