लग्न में केतु और नवम भाव में बृहस्पति की स्थिति
लग्न अर्थात प्रथम भाव में केतु और नवम भाव में बृहस्पति की स्थिति एक बहुत विशेष और गहरी आध्यात्मिक प्रवृत्ति देने वाला योग माना जाता है।।यह योग व्यक्ति को केवल धार्मिक नहीं बनाता अपितु भीतर से जीवन के वास्तविक अर्थ को खोजने की प्रेरणा भी दे सकता है।।प्रथम भाव स्वयं का भाव होता है।।यहीं से व्यक्ति का स्वभाव सोच व्यक्तित्व और जीवन को देखने का तरीका बनता है।।जब यहाँ केतु आता है तो व्यक्ति के भीतर एकाकीपन और विरक्ति की भावना जन्म लेने लगती है।।उसे कई बार ऐसा महसूस होता है कि केवल धन प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियाँ ही जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं।।भीतर कहीं न कहीं एक खालीपन या किसी गहरे सत्य को जानने की इच्छा बनी रहती है।।लग्नस्थ केतु व्यक्ति को सामान्य भीड़ से थोड़ा अलग सोचने वाला बनाता है।।ऐसे लोग कई बार एकांत को पसंद करते हैं अधिक आत्मचिंतन करते हैं और जीवन को बहुत गहराई से महसूस करते हैं।।यदि केतु अशुभ प्रभावों से मुक्त हो तो व्यक्ति धीरे धीरे बाहरी दिखावे से अधिक भीतर की शांति को महत्व देने लगता है।।अब नवम भाव में स्थित देवगुरु बृहस्पति इस स्थिति को बहुत सुंदर दिशा देते हैं।।
नवम भाव धर्म गुरु भाग्य शास्त्र सदाचार और पूर्व जन्म के पुण्यों का भाव माना गया है।।यहाँ स्थित बृहस्पति व्यक्ति को धर्म के वास्तविक अर्थ को समझने की प्रेरणा देते हैं।।ऐसे जातकों के जीवन में किसी न किसी रूप में गुरु कृपा आध्यात्मिक मार्गदर्शन या ज्ञान का प्रकाश अवश्य आता है।।इस योग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि नवम भाव में स्थित बृहस्पति की पंचम दृष्टि लग्न में स्थित केतु पर पड़ती है।।यहीं से यह स्थिति साधारण और सामान्य धार्मिक प्रवृत्ति से ऊपर उठकर कहीं गहरी आध्यात्मिक दिशा देने लगता है।।केतु स्वयं अहंकार को कम करने वाला ग्रह माना गया है लेकिन अकेला केतु कई बार व्यक्ति को भ्रमित या संसार से अलग थलग भी कर देता है।।जब उस पर देवगुरु बृहस्पति की शुभ दृष्टि पड़ती है तब वही केतु व्यक्ति को सही दिशा देने लगता है।।तब वैराग्य केवल भागने का कारण नहीं बनता अपितु इससे आत्मिक समझ का मार्ग बनने लगता है।।
ऐसा जातक धीरे धीरे ही सही यह समझने लगता है कि जीवन केवल सफलता प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि भीतर शांति पाने के लिए भी है।।कई बार बिना अधिक बाहरी शिक्षा के भी ऐसे लोग आध्यात्मिक विषयों को सहज रूप से समझने लगते हैं।।बृहस्पति की सप्तम दृष्टि तृतीय भाव पर पड़ती है।।इससे व्यक्ति के भीतर साधना जप स्वाध्याय लेखन और आत्मविकास के लिए निरंतर प्रयास करने की क्षमता आती है।।ऐसे लोग आध्यात्मिक विषयों पर लिखने सीखने या दूसरों को ज्ञान देने में रुचि रख सकते हैं।।बृहस्पति की नवम दृष्टि पंचम भाव पर पड़ती है जो मंत्र ज्ञान बुद्धि और पूर्व जन्म के संस्कारों का भाव है।।इससे व्यक्ति के भीतर धर्म मंत्र ध्यान और ईश्वर चिंतन के प्रति सहज आकर्षण उत्पन्न हो सकता है।।यदि पंचम भाव और उसका स्वामी भी मजबूत हों तो आध्यात्मिक संस्कार बहुत जल्दी जागृत होने लगते हैं।।
सरल और सहज रूप में देखें तो यह योग व्यक्ति को बाहरी अहंकार से भीतर की आत्मिक समझ की ओर ले जाने वाला योग माना जा सकता है।।केतु भीतर से खाली करता है और बृहस्पति उसी भीतर को ज्ञान और समझ से भरने का कार्य करते हैं।।इसी कारण ऐसे जातकों के जीवन में आने वाले संघर्ष केवल कष्ट नहीं होते हैं अपितु कई बार जागरण का माध्यम भी बन जाते हैं।।यदि जीवन में सही गुरु सही दिशा और सात्विकता जुड़ जाए तो यही योग व्यक्ति को गहरी आध्यात्मिक समझ और आंतरिक शांति की ओर ले जा सकता है।।
डॉ सुशील कश्यप
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