चतुर्थ भाव में स्थित शनि

चतुर्थ भाव में स्थित शनि व्यक्ति को भीतर से बहुत गंभीर बना सकता है।।ऐसे लोग बाहर से शांत और संयमित दिखाई देते हैं
लेकिन भीतर ही भीतर बहुत कुछ दबाकर चलते रहते हैं।।चतुर्थ भाव मन, मानसिक शांति, माता, घर और सुख का भाव माना जाता है अतः जब यहाँ शनि स्थित होता है तो व्यक्ति छोटी उम्र से ही परिपक्व होने लगता है।।जीवन उसे कम उम्र में ही जिम्मेदारियाँ और मानसिक दबाव महसूस करवाता है।।
कई बार बचपन में भावनात्मक दूरी घर का भारी वातावरण या मन की बात न कह पाने जैसी स्थितियाँ भी देखने को मिलती हैं।।इसी कारण ऐसे जातक धीरे धीरे अपने दुख और चिंताओं को भीतर दबाने लगते हैं।।इस शनि की सबसे बड़ी बात यह होती है कि व्यक्ति अकेले रहना सीख जाता है और वह अपने मन की बातें आसानी से किसी से साझा नहीं करता।।बाहर से मजबूत दिखने वाला यह व्यक्ति भीतर से कई बार बहुत थका हुआ महसूस करता है।।इसलिए चतुर्थ भाव के शनि वाले जातकों को सबसे अधिक अपने भीतर जमा मानसिक बोझ को नियंत्रित करना चाहिए क्योंकि हर बात मन में दबाकर रखना धीरे धीरे तनाव और नकारात्मक सोच बढ़ा सकता है।।कई बार यही शनि व्यक्ति को पुराने दुख भय और नकारात्मक अनुभवों में उलझाए रखता है और जिसके कारण मन छोटी से छोटी बातों को भी अधिक गंभीरता से लेने लगता है।।अकेले पन में अधिक रहने से चिंता और मानसिक भारीपन बढ़ सकता है।।अपनी भावनाएँ किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करना
सकारात्मक वातावरण में रहना ध्यान करना और मन को हल्का रखना ये सब इस शनि को संतुलित करने में बहुत सहायक होते हैं।।यदि यह शनि शुभ और मजबूत हो जाए
तो यही व्यक्ति अत्यंत धैर्यवान जिम्मेदार और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रहने वाला बनता है।।ऐसे लोग परिवार की जिम्मेदारियों को बहुत गंभीरता से निभाते हैं और भीतर से मजबूत बन जाते हैं।।सरल रूप में समझें तो चतुर्थ भाव का शनि व्यक्ति को जीवन की गहराई और परिपक्वता देता है लेकिन इसके लिए नितांत आवश्यक है कि व्यक्ति अकेलेपन को आदत न बनाए और अपने मन को अनावश्यक बोझ से बचाना सीखे।।

डॉ सुशील कश्यप 

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