बुध अकेला काफ़ी होता है

जब पूरी कुंडली विरोध में हो, तब भी बुध अकेला काफ़ी होता है

कई जन्मपत्रिकाओं में ऐसा समय आता है जब लगभग हर ग्रह किसी न किसी रूप में अड़चन बनता नज़र आता है।
शनि देरी और संघर्ष देता है,
मंगल क्रोध और जल्दबाज़ी बढ़ा देता है,
राहु भ्रम और गलत निर्णय करवाता है,
केतु अस्थिरता और एकाकीपन लाता है,
चंद्र मन को असंतुलित करता है,
सूर्य अहं के संघर्ष खड़े कर देता है,
शुक्र संबंधों और सुखों में कमी लाता है।

दिखने में ऐसा लगता है कि किस्मत हर मोड़ पर दरवाज़ा बंद कर रही है।
कुंडली जैसे पूरी ताकत से रोक रही हो।

लेकिन यदि बुध अच्छी स्थिति में हो —
तो जातक पूरी दुनिया के विरोध के बीच भी अपनी दिशा पहचान लेता है।

जिस व्यक्ति पर बुध की कृपा होती है, वह कठिनाइयों से टूटता नहीं, बल्कि समझदार बनता है।
जहाँ दूसरा व्यक्ति निराश हो जाए, वहीं बुधवान जातक मौके की दरार देख लेता है।
उसके पास धन न हो, संपर्क न हों, साधन न हों  फिर भी दिमाग उसकी पूंजी बन जाता है।
वह जिद नहीं करता, रणनीति बनाता है।
वह शोर में नहीं पड़ता, समाधान ढूंढता है।

यही कारण है कि जिनकी कुंडली में बुध सशक्त होता है, वे असफलताओं के बीच भी बार-बार संभल जाते हैं।
दूसरे लोग गिर कर हार मान लेते हैं, पर बुधवान व्यक्ति गिरकर अनुभव लेकर उठता है।
और फिर वही अनुभव एक दिन उसे आगे ले जाता है।

ज्योतिष में यह बात यूं ही नहीं कही गई —
कुंडली में बाकी सभी ग्रह प्रतिकूल हों, फिर भी यदि बुध शुभ हो तो जातक जीवन में कुछ न कुछ कर गुजरता है।
क्योंकि संघर्षों के बीच जीतने के लिए किस्मत से पहले समझ की ज़रूरत होती है।

कुंडली योगों से नहीं, निर्णयों से चलती है।
और अच्छे निर्णय वहीं ले पाता है, जिसके भीतर बुध जीवित और जागरूक होता है।

डॉ सुशील कश्यप 

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