चंद्रमा की पीड़ा

मन क्यों रोता है जबकि जीवन में सब कुछ है?"
ज्योतिष में जब भी किसी व्यक्ति के जीवन में एक अजीब प्रकार का खालीपन दिखाई देता है, जब सब कुछ प्राप्त होने के बाद भी भीतर संतोष नहीं आता, जब रात के सन्नाटे में बिना किसी स्पष्ट कारण के मन भारी होने लगता है, तब अनुभवी ज्योतिषी सबसे पहले चंद्रमा को देखते हैं। क्योंकि कुंडली में सूर्य आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, परंतु चंद्रमा मन का। सूर्य यह बताता है कि व्यक्ति क्या है, जबकि चंद्रमा यह बताता है कि वह स्वयं को कैसा महसूस करता है।
यही कारण है कि कई बार एक अत्यंत सफल व्यक्ति, जिसके पास धन, प्रतिष्ठा, परिवार और सामाजिक सम्मान सब कुछ हो, वह भीतर से टूटा हुआ मिल सकता है। संसार उसकी सफलता को देखता है, पर उसका चंद्रमा उसकी पीड़ा को जानता है।
चंद्रमा कोई साधारण ग्रह नहीं है। वैदिक ज्योतिष में इसे मन, भावनाओं, स्मृतियों, संवेदनाओं, मातृत्व, सुरक्षा और मानसिक शांति का कारक माना गया है। चंद्रमा ही वह ग्रह है जो तय करता है कि व्यक्ति जीवन के अनुभवों को किस प्रकार महसूस करेगा। दो व्यक्तियों के जीवन में एक जैसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं, परंतु उनका अनुभव अलग होगा, क्योंकि उनका चंद्रमा अलग है।
जब चंद्रमा बलवान होता है तो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में भी आनंद खोज लेता है। उसके भीतर संतोष की धारा बहती है। लेकिन जब चंद्रमा पीड़ित होता है, नीच का होता है, पाप ग्रहों से ग्रसित होता है अथवा अष्टम, षष्ठ या द्वादश भाव जैसी गूढ़ स्थितियों में आकर मानसिक संघर्ष उत्पन्न करता है, तब व्यक्ति को एक ऐसी बेचैनी घेर लेती है जिसका कारण वह स्वयं भी नहीं समझ पाता।
सब कुछ होते हुए भी मन रोने लगता है।
यह रोना वास्तव में किसी वस्तु के अभाव का रोना नहीं होता। यह उस भावनात्मक तृप्ति का अभाव होता है जिसे संसार की कोई उपलब्धि पूरा नहीं कर सकती। क्योंकि चंद्रमा भौतिक वस्तुओं से नहीं, भावनात्मक सुरक्षा से पोषित होता है। धन शरीर को सुविधा दे सकता है, पर मन को शांति नहीं दे सकता। प्रसिद्धि लोगों की तालियाँ दे सकती है, पर हृदय का खालीपन नहीं भर सकती।
गूढ़ ज्योतिषीय रहस्य यह है कि चंद्रमा केवल इस जन्म की भावनाओं को नहीं दर्शाता। अनेक प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को पूर्व जन्मों के संस्कारों का भंडार माना गया है। मन में जो अनजाने भय हैं, जो बिना कारण की उदासी है, जो अस्पष्ट रिक्तता है, वह केवल वर्तमान जीवन की कहानी नहीं होती। कई बार वह उन अधूरी भावनाओं की प्रतिध्वनि होती है जिन्हें आत्मा अपने साथ लेकर आई है।
यही कारण है कि जब चंद्रमा अष्टम भाव से जुड़ता है तो व्यक्ति का मन अत्यंत गहरा हो जाता है। वह सतही बातों में संतुष्ट नहीं हो पाता। उसे हर घटना के पीछे का रहस्य जानना होता है। वह जीवन के अर्थ को खोजता है। वह यह प्रश्न पूछता है कि यदि सब कुछ मिल भी जाए, तो उसके बाद क्या?
यहीं से चंद्रमा की वास्तविक पीड़ा प्रारंभ होती है।
मन संसार में उस पूर्णता को खोजता है जो वास्तव में संसार में है ही नहीं। वह प्रेम में पूर्णता खोजता है, संबंधों में पूर्णता खोजता है, सफलता में पूर्णता खोजता है, लेकिन हर बार उसके हाथ में केवल एक क्षणिक संतोष आता है। कुछ समय बाद वही खालीपन फिर लौट आता है।
इसीलिए भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा को स्थान दिया गया है। यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि अत्यंत गहरा ज्योतिषीय रहस्य है। चंद्रमा स्वयं अस्थिर है। वह घटता-बढ़ता है। कभी पूर्णिमा, कभी अमावस्या। कभी प्रसन्न, कभी उदास। कभी आशा, कभी निराशा। लेकिन जब वही चंद्रमा शिव के मस्तक पर स्थापित हो जाता है, तब उसकी चंचलता समाप्त हो जाती है।
मानो शिव कह रहे हों—
"हे मन, तू संसार में स्थिरता खोज रहा है, जबकि स्थिरता का स्रोत तेरे भीतर है।"
चंद्रमा की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं कि उसे प्रेम नहीं मिला। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वह उस प्रेम को नश्वर वस्तुओं में खोजता रहा जो वास्तव में शाश्वत चेतना का गुण है। वह बाहर दौड़ता रहा, जबकि उसका घर भीतर था।
इसलिए जब भी जीवन में ऐसा लगे कि सब कुछ होते हुए भी मन संतुष्ट नहीं है, तो उसे केवल मानसिक कमजोरी समझकर न टालें। संभव है कि आपका चंद्रमा आपको एक गहरे सत्य की ओर बुला रहा हो। संभव है कि वह आपको यह दिखाना चाहता हो कि जीवन का उद्देश्य केवल प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को जानना भी है।
और शायद यही कारण है कि ज्योतिष में कहा गया है—
"सूर्य आपको संसार में पहचान देता है, लेकिन चंद्रमा यह तय करता है कि उस पहचान के साथ आप रात को चैन से सो पाएँगे या नहीं।"
क्योंकि मन की भूख वस्तुओं से नहीं मिटती, वह केवल चेतना से तृप्त होती है।
"जब संसार की कोई उपलब्धि मन का शून्य नहीं भर पाती, तब हम शिव को पहचानते हैं... और तभी शिव हमें इस पीड़ा से पार उतारते हैं।

डॉ सुशील कश्यप 

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