सप्तम भाव में स्थित केतु।

सप्तम भाव में स्थित केतु।
जन्मकुंडली का सप्तम भाव विवाह जीवनसाथी साझेदारी और सभी प्रकार के संबंधों का भाव माना जाता है।।यह भाव केवल विवाह ही नहीं अपितु दूसरों के साथ हमारा व्यवहार और जुड़ाव भी दिखाता है।।जब सप्तम भाव में केतु स्थित होता है तो व्यक्ति का संबंधों को देखने का तरीका सामान्य से कुछ अलग हो सकता है।।केतु वैराग्य,भीतर की खोज और विरक्ति का कारक होता है इसलिए यह व्यक्ति को संबंधों का बाहरी रूप नहीं अपितु उनका वास्तविक अर्थ समझने की प्रेरणा दे सकता है।।ऐसे जातक कई बार अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते।।वे सामने वाले की परवाह तो करते हैं लेकिन उसे शब्दों में बताना उनके लिए आसान नहीं होता।।इसी कारण कभी कभी जीवनसाथी या साथी को लग सकता है कि व्यक्ति भावनात्मक रूप से दूर है।।
सप्तम भाव में केतु होने पर व्यक्ति को अपने लिए कुछ समय और स्वतंत्रता की आवश्यकता भी महसूस हो सकती है।।यह स्वभाव गलत नहीं है लेकिन यदि संतुलन न रहे तो संबंधों में दूरी आ सकती है।।कई बार यह स्थिति व्यक्ति से अपेक्षा करती है कि वह संबंधों में अधिक संवाद करे क्योंकि मौन हर समस्या का समाधान नहीं होता है अपितु समय पर अपनी बात कहना और सामने वाले की बात सुनना संबंधों को मजबूत बनाता है।।केतु की यह स्थिति कभी कभी व्यक्ति को संबंधों में आदर्श की खोज भी करा सकती है लेकिन कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता।।इसलिए संबंधों को वास्तविकता के साथ स्वीकार करना अधिक उचित रहता है।।यदि सप्तम भाव का केतु शुभ प्रभाव में हो और अन्य ग्रहों का सहयोग मिले तो व्यक्ति दिखावे से दूर रहकर सच्चे और विश्वासपूर्ण संबंध बना सकता है।।ऐसे लोग अक्सर कम संबंध रखते हैं लेकिन उन्हें निभाने का प्रयास करते हैं।।ज्योतिषीय दृष्टि से केवल सप्तम भाव में केतु देखकर विवाह या दांपत्य जीवन का अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।।सप्तम भाव के स्वामी शुक्र गुरु नवांश कुंडली और ग्रहों की दृष्टियों का भी विचार आवश्यक होता है तभी सही निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है।।
सप्तम भाव में स्थित केतु के जातकों को अपनी भावनाओं को मन में ही दबाकर नहीं रखना चाहिए अपितु संबंधों में संवाद बनाए रखने का सतत प्रयास करना चाहिए।।सामने वाले की भावनाओं को भी समझने का प्रयास करें।।स्वतंत्रता और संबंध दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना नितांत आवश्यक होता है।।

डॉ सुशील कश्यप 

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