आपका चंद्र 12 भावों में — आत्मा इस जन्म में किस दर्द को प्रेम में बदलने आई है?
आपका चंद्र 12 भावों में — आत्मा इस जन्म में किस दर्द को प्रेम में बदलने आई है?
"चंद्र जिस भाव में बैठा है... वहीं आपकी आत्मा सबसे अधिक रोई भी है और वहीं उसके सबसे अधिक खिलने की संभावना भी छिपी है।"
जब ईश्वर किसी आत्मा को पृथ्वी पर भेजते होंगे, तब शायद सबसे पहले उससे यह नहीं पूछते होंगे कि तुम्हें कितना धन चाहिए, कितना वैभव चाहिए, कितना सम्मान चाहिए या कितनी आयु चाहिए। शायद वे केवल एक प्रश्न पूछते होंगे—"इस बार तुम प्रेम कहाँ सीखना चाहती हो?" क्योंकि हर जन्म का सबसे बड़ा पाठ प्रेम ही होता है। कोई उसे माता की गोद में सीखता है, कोई विरह में, कोई संतान के जन्म में, कोई गुरु के चरणों में, कोई सेवा में, कोई अकेलेपन में, कोई अपने ही आँसुओं के बीच। तभी चंद्र आगे बढ़ता होगा और ईश्वर से कहता होगा—"इसे मैं ले चलता हूँ। इसके मन की भाषा मैं बनूँगा। इसके आँसू मैं सँभालूँगा। इसके सपनों को मैं रंग दूँगा। जब यह टूटेगा, तब भी मैं इसके साथ रहूँगा और जब यह प्रेम करना सीख जाएगा, तब भी सबसे पहले मैं ही मुस्कुराऊँगा।" शायद इसी कारण ऋषियों ने चंद्र को केवल मन नहीं कहा। उन्होंने उसे मन का कारक कहा, क्योंकि मनुष्य का जीवन उसके विचारों से कम और उसकी अनुभूतियों से अधिक बनता है। विचार बदलते रहते हैं, पर अनुभूतियाँ वर्षों तक भीतर जीवित रहती हैं। कुछ आँसू समय सुखा देता है, कुछ आँसू चंद्र अपनी शीतलता में सहेजकर रख लेता है। इसलिए जब भी किसी कुंडली में चंद्र को देखो, केवल यह मत पूछो कि मन कैसा है। एक बार यह भी पूछो—आत्मा आज भी किस बात पर मौन होकर रो पड़ती है?
ज्योतिष कहती है कि चंद्र जिस भाव में बैठता है, वहीं मन बार-बार लौटता है। मैं कहता हूँ, शायद वहीं आत्मा अपना खोया हुआ घर खोजती है। प्रथम भाव उसे स्वयं तक ले जाता है, द्वितीय उसे परिवार की आवाज़ सुनाता है, तृतीय उसे साहस की धड़कन देता है, चतुर्थ उसे माँ की गोद याद दिलाता है, पंचम उसे निष्कलुष प्रेम की सुगंध देता है, षष्ठ उसे सेवा में अपने घाव भरना सिखाता है, सप्तम उसे दर्पण दिखाता है, अष्टम उसे तोड़कर नया जन्म देता है, नवम उसे आकाश की ओर देखने का साहस देता है, दशम उसे कर्म के बीच करुणा खोजने भेजता है, एकादश उसे लोगों के बीच अपनापन ढूँढने को प्रेरित करता है और द्वादश अंत में उसके कान में धीरे से कहता है—"अब लौट आओ... घर बाहर नहीं, भीतर है।" देखिए, बारहों भाव अलग-अलग नहीं हैं। वे एक ही घर के बारह कमरे हैं। चंद्र जहाँ बैठता है, आत्मा बार-बार उसी कमरे का दरवाज़ा खोलती है। कभी रोने के लिए, कभी प्रार्थना करने के लिए, कभी प्रेम करने के लिए, कभी क्षमा माँगने के लिए।
तभी राशियाँ भी धीरे-धीरे बोलने लगती हैं। मेष कहती है—"यदि तुम्हारा चंद्र मेरे पास है, तो तुम्हारा मन हर गिरावट के बाद फिर उठना चाहेगा।" वृषभ कहती है—"तुम्हें सुरक्षा चाहिए, क्योंकि तुम्हारा प्रेम स्थिरता चाहता है।" मिथुन कहता है—"तुम अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालोगे, पर कई बार सबसे गहरी भावना शब्दों से बाहर रह जाएगी।" कर्क कहता है—"तुम्हारा मन समुद्र है। लोग लहरें देखेंगे, गहराई नहीं।" सिंह कहता है—"तुम्हें सम्मान से अधिक स्वीकार्यता चाहिए।" कन्या कहती है—"तुम अपने ही आँसू विश्लेषण में खो दोगे।" तुला कहती है—"तुम प्रेम और संतुलन के बीच पुल बनाना सीखोगे।" वृश्चिक कहता है—"तुम्हारे भीतर जो मौन है, वही तुम्हारा पुनर्जन्म बनेगा।" धनु कहता है—"तुम्हारी आत्मा अर्थ खोजे बिना नहीं मानेगी।" मकर कहता है—"दर्द तुम्हें कठोर नहीं, परिपक्व बनाए।" कुंभ कहता है—"तुम सबके बीच रहकर भी भीतर से अलग महसूस कर सकते हो।" मीन कहता है—"तुम्हारा हृदय सीमाएँ नहीं जानता; इसलिए तुम्हें करुणा का अनुशासन सीखना होगा।" तब समझ आता है कि राशि चंद्र को रंग देती है, भाव उसे दिशा देता है और नक्षत्र उसे आवाज़ देता है।
और फिर एक अद्भुत दृश्य बनता है। आकाश में सत्ताईस नक्षत्र एक-एक करके दीपक जलाते हैं। अश्विनी कहता है—"जब तुम्हारा मन टूटे, तो सबसे पहले स्वयं को ही उपचार देना।" भरणी कहती है—"कुछ पीड़ाएँ जन्म देती हैं, समाप्त नहीं करतीं।" कृत्तिका अग्नि बनकर कहती है—"मैं तुम्हें जलाऊँगी नहीं, तुम्हारे भीतर का असत्य जलाऊँगी।" रोहिणी माँ की तरह सिर सहलाकर कहती है—"प्रेम केवल पाया नहीं जाता, उगाया भी जाता है।" मृगशीर्ष मुस्कुराता है—"तुम खोजते रहोगे, क्योंकि तुम्हारी आत्मा अभी भी सत्य की सुगंध पहचानती है।" आर्द्रा वर्षा बनकर कहती है—"जो रो नहीं सकता, वह नया नहीं जन्म ले सकता।" पुनर्वसु कहती है—"हर अँधेरे के बाद घर लौटने का मार्ग बचा रहता है।" पुष्य कहता है—"पालन करना भी तप है।" आश्लेषा फुसफुसाती है—"जिसे पकड़ते हो, वही कभी-कभी तुम्हें बाँध लेता है।" मघा कहती है—"पूर्वजों का सम्मान केवल नाम से नहीं, चरित्र से होता है।" पूर्वाफाल्गुनी कहती है—"आराम भी साधना है।" उत्तराफाल्गुनी कहती है—"प्रेम तब पूर्ण होता है जब वह उत्तरदायित्व बन जाए।" हस्त कहता है—"तुम्हारे हाथ केवल कमाने के लिए नहीं, सहलाने के लिए भी हैं।" चित्रा कहती है—"अपने टूटे हुए मन से भी सौंदर्य रचो।" स्वाती कहती है—"स्वतंत्रता का अर्थ अकेलापन नहीं।" विशाखा कहती है—"हर लक्ष्य के पीछे एक हृदय भी बचाकर रखना।" अनुराधा कहती है—"भक्ति वहीं जन्म लेती है जहाँ अहंकार झुकता है।" ज्येष्ठा कहती है—"शक्ति का सबसे सुंदर रूप संरक्षण है।" मूल कहता है—"जड़ों तक उतरोगे, तभी दर्द का कारण समझोगे।" पूर्वाषाढ़ा कहती है—"विश्वास टूट सकता है, आत्मा नहीं।" उत्तराषाढ़ा कहती है—"सत्य देर से जीतता है, पर स्थायी जीतता है।" श्रवण कहता है—"पहले अपने मन को सुनो, फिर संसार को समझो।" धनिष्ठा कहती है—"हृदय की सबसे सुंदर धुन वह है जो दूसरों के लिए धड़के।" शतभिषा कहती है—"कुछ घाव औषधि से नहीं, स्वीकार से भरते हैं।" पूर्वाभाद्रपद कहती है—"दर्द को दीपक बनाओ, बोझ नहीं।" उत्तराभाद्रपद कहती है—"मौन भी प्रेम की भाषा है।" और रेवती अंत में मुस्कुराकर कहती है—"तुम कभी अकेले नहीं थे... तुम केवल अपने घर का रास्ता भूल गए थे।"
तभी चंद्र आत्मा से कहता है—"तुम सोचते रहे कि मैं तुम्हें रुलाता हूँ। नहीं। मैं केवल उन स्थानों पर ले जाता हूँ जहाँ तुम्हारा हृदय अभी भी अधूरा है। क्योंकि जहाँ सबसे अधिक पीड़ा है, वहीं सबसे अधिक प्रेम जन्म लेने की संभावना भी है।" और शायद इसी कारण कुछ लोग जीवन भर एक व्यक्ति को नहीं भूलते, कुछ एक पुराने घर की गंध नहीं भूलते, कुछ एक लोरी नहीं भूलते, कुछ एक अधूरा स्पर्श नहीं भूलते। मन भूलना चाहता है, चंद्र याद रखना चाहता है; क्योंकि कभी-कभी वही स्मृति करुणा बनकर किसी और के जीवन को बचा लेती है।
और यदि एक दिन स्वयं चंद्र तुम्हारे सामने आकर अपनी सबसे गहरी बात कहे, तो शायद वह इतना ही कहे—**"लोग मुझे मन कहते हैं, पर मैं केवल मन नहीं हूँ। मैं तुम्हारी उन प्रार्थनाओं का पात्र हूँ जिन्हें तुम कभी शब्द नहीं दे पाए। मैं तुम्हारी उन विदाइयों का साक्षी हूँ जिन्हें तुम स्वीकार नहीं कर पाए। मैं तुम्हारी उन मुस्कानों का भी रक्षक हूँ जो आँसुओं के बाद लौटी थीं। इसलिए मुझे दोष मत देना यदि मैं तुम्हें कभी रुला दूँ। मैं तुम्हें तोड़ने नहीं आता। मैं तुम्हें वहाँ तक ले जाता हूँ जहाँ तुम्हारा दर्द प्रेम बन सके। क्योंकि जिस दिन तुम्हारे आँसू किसी और के घाव पर मरहम बन जाएँगे, उसी दिन समझना—तुम्हारी आत्मा ने अपना घर खोज लिया।
डॉ सुशील कश्यप
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