वैवाहिक जीवन में दुःख क्यों? आपका पिछला कर्म... या कुछ और?
वैवाहिक जीवन में दुःख क्यों? आपका पिछला कर्म... या कुछ और?
विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है। यदि ऐसा होता तो संसार में सबसे अधिक दुःख विवाह में नहीं होता। विवाह दो शरीरों का नहीं, दो कर्मों का मिलन है। दो कुलों का मिलन है। दो स्मृतियों का मिलन है। दो अधूरी आत्माओं का मिलन है। इसलिए ज्योतिष कहती है—जिस दिन आपकी कुंडली का सप्तम भाव सक्रिय होता है, उसी दिन से केवल जीवनसाथी नहीं आता, आपके पिछले जन्मों का सबसे बड़ा हिसाब भी आपके दरवाज़े पर दस्तक देता है। बहुत लोग पूछते हैं—"मेरे वैवाहिक जीवन में इतना संघर्ष क्यों है?" मैं उनसे केवल एक प्रश्न पूछता हूँ—क्या आपने कभी अपनी कुंडली के सप्तम भाव को आत्मा की आँखों से देखा है? क्योंकि वहाँ केवल पति या पत्नी नहीं बैठे होते, वहाँ आपकी आत्मा का अधूरा वचन बैठा होता है।
याद रखिए, हर विवाह प्रेम से नहीं होता। कुछ विवाह कर्म से होते हैं। कुछ विवाह ऋण से होते हैं। कुछ विवाह आत्मा को झुकाना सिखाने आते हैं। कुछ विवाह अहंकार तोड़ने आते हैं। कुछ विवाह आपको माता-पिता का महत्व समझाने आते हैं। कुछ विवाह आपको यह सिखाने आते हैं कि प्रेम अधिकार नहीं, स्वीकार है। इसलिए जो व्यक्ति केवल सप्तम भाव देखकर कह देता है कि "विवाह अच्छा होगा या बुरा", उसने अभी विवाह का रहस्य समझा ही नहीं।
सप्तम भाव कहता है—"जिसे तुम जीवनसाथी कहते हो, वह ईश्वर द्वारा भेजा गया तुम्हारा सबसे बड़ा दर्पण है।" यदि तुम्हारे भीतर क्रोध है, वही तुम्हें दिखाई देगा। यदि तुम्हारे भीतर असुरक्षा है, वही सामने खड़ी होगी। यदि तुम्हारे भीतर प्रेम है, वही लौटकर आएगा। विवाह किसी को बदलने का माध्यम नहीं है। विवाह स्वयं को देखने का सबसे कठिन माध्यम है।
अब गुरु और शुक्र की कथा सुनिए। पूरी कुंडली में यदि किसी ने विवाह को सबसे अधिक संभाला है तो वे यही दो ग्रह हैं। शुक्र केवल प्रेम नहीं है। शुक्र सम्मान है। स्पर्श की मर्यादा है। त्याग में छिपी सुंदरता है। संबंध को जीवित रखने की कला है। जब शुक्र कमजोर होता है तो व्यक्ति प्रेम को अधिकार समझने लगता है। वह जीवनसाथी को आत्मा नहीं, अपनी संपत्ति समझने लगता है। वहीं से विवाह टूटना प्रारम्भ होता है। क्योंकि जहाँ अधिकार बढ़ता है, वहाँ प्रेम घटता है।
गुरु विवाह का दूसरा स्तंभ है। गुरु केवल पति का कारक या ज्ञान का ग्रह नहीं है। गुरु क्षमा है। धैर्य है। संबंध को समय देने की बुद्धि है। जिस घर में गुरु की ऊर्जा जीवित रहती है, वहाँ बहस हो सकती है पर टूटन नहीं होती। क्योंकि वहाँ कोई एक व्यक्ति ऐसा होता है जो अपने अहंकार से बड़ा संबंध को मानता है। जहाँ गुरु मर जाता है, वहाँ सही होने की लड़ाई शुरू हो जाती है। और जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को सही सिद्ध करने लगे, वहाँ विवाह जीवित नहीं रह सकता।
अब चंद्रमा की ओर आइए। लोग समझते हैं कि विवाह शुक्र से चलता है। मैं कहता हूँ—विवाह चंद्रमा से जीवित रहता है। क्योंकि चंद्रमा मन है। संवेदना है। सुनने की क्षमता है। यदि चंद्रमा घायल है तो व्यक्ति अपने जीवनसाथी की बात नहीं सुनता, केवल अपने मन की आवाज़ सुनता है। यदि चंद्रमा राहु से पीड़ित है तो संदेह बढ़ता है। यदि केतु से जुड़ा है तो भावनात्मक दूरी आ सकती है। यदि शनि की कठोर दृष्टि हो तो व्यक्ति प्रेम करते हुए भी भाव व्यक्त नहीं कर पाता। यदि मंगल मन पर हावी हो जाए तो शब्द तलवार बन जाते हैं। इसलिए कई विवाह प्रेम की कमी से नहीं, भावनात्मक संवाद की कमी से टूटते हैं।
अब भाव अपनी कथा कहते हैं। द्वितीय भाव कहता है—परिवार विवाह को बनाएगा या तोड़ेगा। चतुर्थ भाव कहता है—घर केवल दीवारों से नहीं, मन की शांति से बनता है। पंचम भाव कहता है—क्या प्रेम अभी भी जीवित है या केवल जिम्मेदारियाँ बची हैं? सप्तम भाव कहता है—तुम्हारा साथी तुम्हारा कर्म है। अष्टम भाव कहता है—क्या तुम दोनों संकट में साथ खड़े रहोगे या पहला तूफ़ान आते ही बिखर जाओगे? नवम भाव कहता है—धर्म, संस्कार और विश्वास विवाह की जड़ें हैं। दशम भाव कहता है—क्या काम ने परिवार से बड़ा स्थान ले लिया है? एकादश भाव पूछता है—क्या तुम दोनों के सपने अभी भी एक हैं? द्वादश भाव फुसफुसाता है—क्या तुमने क्षमा करना सीखा या हर रात पुराने घाव लेकर सोते हो?
अब राशियाँ अपना रहस्य खोलती हैं। अग्नि राशियों में विवाह अहंकार की परीक्षा बनता है। पृथ्वी राशियों में जिम्मेदारियों की। वायु राशियों में संवाद की। जल राशियों में भावनाओं की। इसलिए एक ही सप्तम भाव अलग-अलग राशियों में अलग कथा लिखता है। मेष कहता है—क्रोध पर विजय पाओ। वृषभ कहता है—स्वामित्व छोड़ो। मिथुन कहता है—बोलो, पर सुनो भी। कर्क कहता है—मन को सुरक्षित बनाओ। सिंह कहता है—सम्मान दो। कन्या कहती है—पूर्णता की जिद मत करो। तुला कहती है—संतुलन सीखो। वृश्चिक कहता है—संदेह छोड़ो। धनु कहता है—विश्वास रखो। मकर कहता है—कर्तव्य निभाओ। कुंभ कहता है—स्वतंत्रता और संबंध का संतुलन सीखो। मीन कहता है—करुणा के बिना विवाह केवल समझौता रह जाएगा।
अब नक्षत्रों की ओर देखिए। राशि मंच है, पर नक्षत्र अभिनेता हैं। रोहिणी प्रेम को पोषण देना चाहती है। मघा सम्मान माँगती है। स्वाती स्वतंत्रता चाहती है। अनुराधा मित्रता में प्रेम खोजती है। ज्येष्ठा अधिकार की परीक्षा लेती है। मूल जड़ों तक ले जाकर पूछता है—तुम विवाह क्यों कर रहे हो? रेवती अंत में कहती है—यदि करुणा नहीं बची तो कोई भी संबंध अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा।
और फिर सबसे बड़ा रहस्य आता है। क्या वैवाहिक दुःख केवल पिछले जन्म का कर्म है? नहीं। पिछले जन्म का कर्म केवल परिस्थिति बनाता है। इस जन्म का व्यवहार परिणाम तय करता है। यदि आत्मा पुराने ऋण लेकर आई है तो इस जन्म में उसे प्रेम, धैर्य, संवाद, सम्मान और क्षमा से चुकाया जा सकता है। यदि यही पाँच गुण छोड़ दिए जाएँ तो सबसे सुंदर योग भी संघर्ष में बदल सकता है। और यदि यही पाँच गुण अपनाए जाएँ तो कठिन योग भी जीवन का सबसे बड़ा वरदान बन सकता है।
इसलिए विवाह को केवल सप्तम भाव से मत देखिए। गुरु से पूछिए—क्या घर में ज्ञान जीवित है? शुक्र से पूछिए—क्या सम्मान अभी भी जीवित है? चंद्रमा से पूछिए—क्या मन अभी भी एक-दूसरे तक पहुँचता है? और स्वयं से पूछिए—क्या मैं जीवनसाथी को बदलना चाहता हूँ या समझना चाहता हूँ?
याद रखिए—विवाह में सबसे बड़ा शत्रु ग्रह नहीं होता, अहंकार होता है। सबसे बड़ी दरार दोष नहीं बनाते, मौन बनाता है। सबसे बड़ा उपाय रत्न नहीं, सम्मान है। सबसे बड़ा मंत्र केवल जप नहीं, क्षमा है। और सबसे बड़ा योग वह है जहाँ दो लोग हर दिन एक-दूसरे को चुनते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
शायद इसी कारण ऋषियों ने विवाह को केवल सामाजिक बंधन नहीं कहा। उन्होंने इसे यज्ञ कहा। क्योंकि यज्ञ में आहुति देनी पड़ती है। और वैवाहिक जीवन में सबसे पहली आहुति अहंकार की देनी पड़ती है। जिस दिन यह आहुति सच्चे मन से दे दी जाती है, उसी दिन से विवाह केवल साथ रहना नहीं रहता... वह दो आत्माओं की संयुक्त साधना बन जाता है।
डॉ सुशील कश्यप
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