भारतीय ज्योतिष में आयु विचार
भारतीय ज्योतिष में आयु का विचार करते समय जीवनकाल को मुख्य रूप से कई श्रेणियों में बांटा गया है—जैसे अल्पायु, मध्यायु, दीर्घायु, दिव्यायु और अमित आयु।
अमित आयु योग ज्योतिष का एक बेहद दुर्लभ और विशेष योग है। 'अमित' का अर्थ होता है जिसकी कोई सीमा न हो या जिसे मापा न जा सके। पारंपरिक वैदिक ज्योतिष के ग्रंथों (जैसे 'जातक पारिजात' या 'बृहत्पाराशर होराशास्त्र' के सिद्धांतों पर आधारित व्याख्याओं) में इस योग का वर्णन असीमित या असाधारण रूप से लंबी आयु के संदर्भ में किया गया है। ऐसे जातक का जीवन सामान्य इंसानी सीमाओं से परे माना जाता है।
आइए जानते हैं कि यह योग कुंडली में कैसे बनता है और इसके क्या मायने हैं:
अमित आयु योग की शास्त्रीय परिभाषा और नियम
ज्योतिषीय ग्रंथों के अनुसार, यह योग तब घटित होता है जब कुंडली में देवगुरु बृहस्पति और दैत्यगुरु शुक्र (जो कि सबसे बड़े शुभ ग्रह हैं) बेहद मजबूत और विशिष्ट अवस्था में हों। इसके प्रमुख नियम इस प्रकार हैं:
1. गुरु की स्थिति (गोपुरांश):- कुंडली में बृहस्पति 'गोपुरांश' में होना चाहिए। गोपुरांश का मतलब है कि जब कोई ग्रह अपने वर्ग (चतुर्वर्ग या षडवर्ग आदि गणनाओं में) 4 बार अपने ही घर, मित्र राशि या उच्च राशि में आए। साथ ही, गुरु कुंडली के केंद्र भाव (1, 4, 7, या 10वें भाव) में स्थित होना चाहिए।
2. शुक्र की स्थिति (पारावतांश):- दैत्यगुरु शुक्र 'पारावतांश' में होना चाहिए। इसका मतलब है कि षडवर्ग (छह प्रकार के सूक्ष्म वर्ग) की गणना में शुक्र 6 बार शुभ या अपनी उच्च/स्वराशि के अंशों में आए।
3. कर्क लग्न :- कई विद्वानों के मत अनुसार, यदि जातक का कर्क लग्न हो (जिसमें गुरु नवमेश/षष्ठेश होकर उच्च का हो सकता है या केंद्र में मजबूत हो) और ऊपर दी गई गुरु-शुक्र की स्थितियां पूरी होती हों, तो अमित आयु योग का निर्माण होता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस जातक की कुंडली में यह दुर्लभ योग पूर्ण रूप से घटित होता है, उसे सामान्य मानव नहीं बल्कि "देवता के समान" माना गया है:
शास्त्रीय भाषा में कहा गया है कि ऐसे जातक की आयु की कोई तय सीमा नहीं होती। वह इच्छा मृत्यु के कवच के समान जीवन जीता है और दीर्घकाल तक पृथ्वी पर बना रहता है।
ऐसा व्यक्ति समाज में पूजनीय, परम ज्ञानी, आध्यात्मिक रूप से सिद्ध और परोपकारी होता है।
कई विद्वान इसे 'दिव्यायु' से भी ऊपर रखते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी योगिक क्रियाओं, मंत्र साधना या कायाकल्प के बल पर सदियों तक जीवित रहने की क्षमता रखता है (जैसे हमारे ग्रंथों में ऋषियों या सिद्ध पुरुषों के बारे में सुना जाता है)।
व्यावहारिक रूप से आज के कलियुग में हुबहू 'अमित आयु' (सैकड़ों वर्ष की उम्र) मिलना अत्यंत दुर्लभ या असंभव सा है। आधुनिक ज्योतिष में जब यह योग किसी सामान्य जातक की कुंडली में आंशिक रूप से भी बनता है, तो इसे पूर्णायु (100 वर्ष या उससे अधिक का स्वस्थ जीवन) और समाज में अटूट कीर्ति व यश मिलने के रूप में देखा जाता है।
डॉ सुशील कश्यप
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