शुक्र और विरह — ईश्वर प्रेम को मिलन से अधिक बिछड़ने में क्यों परखते हैं?

शुक्र और विरह — ईश्वर प्रेम को मिलन से अधिक बिछड़ने में क्यों परखते हैं?
"शुक्र केवल प्रेम नहीं है... वह आत्मा की वह क्षमता है जहाँ 'मेरा' धीरे-धीरे 'तेरा' में विलीन होने लगता है।"
मनुष्य जब भी शुक्र का नाम सुनता है, उसके मन में सबसे पहले विवाह, प्रेम, स्त्री, पुरुष, सौंदर्य, भोग, विलासिता, आकर्षण और दाम्पत्य की छवि बनती है। यह गलत नहीं है, परंतु अधूरा अवश्य है। ज्योतिष का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि हमने ग्रहों को उनके बाहरी फल तक सीमित कर दिया और उनके आध्यात्मिक स्वरूप को लगभग भुला दिया। यदि शुक्र केवल भोग का ग्रह होता तो महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य हजारों वर्षों तक तपस्या क्यों करते? यदि शुक्र केवल स्त्री-सुख का ग्रह होता तो भगवान शिव स्वयं उन्हें मृतसंजीवनी विद्या क्यों प्रदान करते? यदि शुक्र केवल सौंदर्य होता तो वैदिक ऋषि उसे दैत्यों का गुरु कहकर भी सम्मान क्यों देते? क्योंकि वे जानते थे कि शुक्र का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, रस है; आकर्षण नहीं, अनुभूति है; संबंध नहीं, समर्पण है; और समर्पण की अंतिम अवस्था ही भक्ति है।
मैंने वर्षों तक हजारों कुंडलियाँ देखीं। प्रारम्भ में मैं भी शुक्र को उसी दृष्टि से देखता था जैसे अधिकांश ज्योतिषी देखते हैं—विवाह कैसा होगा, पत्नी कैसी होगी, पति कैसा होगा, प्रेम मिलेगा या नहीं, धन कितना होगा, वाहन कब मिलेगा, सुख कितना मिलेगा। लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगा कि शुक्र इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले एक और प्रश्न पूछता है—"तुम्हारे भीतर प्रेम को धारण करने की पात्रता कितनी है?" क्योंकि संसार प्रेम पाने में लगा है, शुक्र प्रेम बनने की यात्रा सिखाता है। संसार सुंदर चेहरा खोज रहा है, शुक्र सुंदर हृदय खोजता है। संसार चाहता है कि कोई उसे प्रेम करे, शुक्र चाहता है कि मनुष्य स्वयं प्रेम का स्रोत बन जाए। यही कारण है कि एक ही योग दो व्यक्तियों के जीवन में अलग रूप ले सकता है। किसी के लिए शुक्र विवाह बनता है, किसी के लिए संगीत, किसी के लिए कविता, किसी के लिए सेवा, किसी के लिए साधना, किसी के लिए ईश्वर का नाम। ग्रह केवल घटना नहीं बताते, वे चेतना की दिशा भी बताते हैं।
यहीं मुझे महर्षि पराशर की परंपरा का एक गहरा संकेत दिखाई देता है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में शुक्र को शुभ ग्रह कहा गया है, पर उसका शुभत्व केवल धन या विवाह तक सीमित नहीं है। वह सौम्यता, कला, रस, दया, सौंदर्य और जीवन की मधुरता का भी प्रतीक है। सारावली में शुक्र को विलास के साथ-साथ विनम्रता और कलात्मकता से जोड़ा गया। फलदीपिका में वह संबंधों की कोमलता का कारक है। जातक पारिजात में उसकी शुभता मनुष्य के संस्कारों को भी प्रभावित करती दिखाई देती है। यदि इन सबका निचोड़ निकालूँ तो मुझे एक ही सूत्र मिलता है—जहाँ जीवन कठोर होने से बच जाता है, वहाँ शुक्र उपस्थित है। जहाँ मनुष्य टूटकर भी क्रूर नहीं बनता, वहाँ शुक्र जीवित है। जहाँ शक्ति करुणा के साथ चलती है, वहाँ शुक्र मुस्कुराता है।
अब एक प्रश्न पूछिए स्वयं से। यदि शुक्र प्रेम है तो संसार में सबसे अधिक आँसू प्रेम में ही क्यों बहते हैं? यदि शुक्र सुख है तो सबसे अधिक पीड़ा भी संबंधों में ही क्यों मिलती है? यदि शुक्र मिलन है तो भारतीय संतों ने विरह को प्रेम की सर्वोच्च अवस्था क्यों कहा? क्या यह विरोधाभास है? नहीं। यही शुक्र का सबसे गूढ़ रहस्य है। ईश्वर प्रेम की परीक्षा मिलन में नहीं लेते, विरह में लेते हैं। मिलन में प्रेम सहज है क्योंकि सामने व्यक्ति है। विरह में केवल स्मृति रहती है। मिलन में स्पर्श है, विरह में केवल हृदय है। मिलन में अपेक्षा छिपी हो सकती है, विरह में अपेक्षा जल जाती है। यदि बिछड़ने के बाद भी तुम्हारे भीतर उस व्यक्ति के लिए शुभकामना बची रहे, यदि तुम्हारी प्रार्थना में उसके लिए मंगलकामना शेष रहे, यदि तुम्हारा हृदय कटु न होकर करुणामय हो जाए, तो समझना शुक्र ने तुम्हें भोग से उठाकर भक्ति की ओर बढ़ा दिया।
राधा इसलिए महान नहीं हैं कि कृष्ण उनके साथ थे। राधा इसलिए महान हैं कि कृष्ण की अनुपस्थिति में भी उनका प्रेम कम नहीं हुआ। मीरा इसलिए अमर नहीं हुईं कि उन्हें कृष्ण दिखाई देते थे; वे इसलिए अमर हुईं क्योंकि संसार ने उनसे सब कुछ छीन लिया, पर उनके भीतर का समर्पण कोई नहीं छीन पाया। यही विरह है। विरह का अर्थ खो देना नहीं, विरह का अर्थ है—प्रेम का शरीर से आत्मा तक पहुँच जाना। जब प्रेम स्पर्श से स्मरण बन जाए, स्मरण से प्रार्थना बन जाए और प्रार्थना से उपस्थिति बन जाए, तब शुक्र अपना सबसे ऊँचा रूप धारण करता है।
यहीं से भक्ति का वास्तविक अर्थ प्रारम्भ होता है। आज भक्ति को केवल पूजा-पाठ समझ लिया गया है। परंतु भक्ति मंदिर की दीवारों में कैद नहीं है। कोई कलाकार बीस वर्षों तक एक राग को साधता है—वह भी भक्ति है। कोई मूर्तिकार पत्थर में देवत्व खोजता है—वह भी भक्ति है। कोई माँ अपने बीमार बच्चे के सिरहाने पूरी रात बैठी रहती है—वह भी भक्ति है। कोई वैज्ञानिक सत्य की खोज में अपना जीवन लगा देता है—वह भी भक्ति है। कोई किसान वर्ष भर धरती की सेवा करता है—वह भी भक्ति है। कोई साधक एक मंत्र को जीवन भर जपता है—वह भी भक्ति है। भक्ति का अर्थ है—जहाँ तुम्हारा अहंकार समाप्त होकर समर्पण प्रारम्भ हो जाए। और जहाँ समर्पण है, वहीं शुक्र है।
और यहीं एक बात मैंने अपने अनुभव में बार-बार देखी है। ज्योतिष की पुस्तकों में शुक्र को शुभ ग्रह कहा गया है, परंतु व्यवहार में मैंने अनेक ऐसी कुंडलियाँ देखी हैं जहाँ विशेषकर षष्ठ (6) और अष्टम (8) भाव का शुक्र मनुष्य को भीतर तक परिपक्व करके ही छोड़ता है। बहुत लोग पूछते हैं—"शुभ ग्रह होकर भी शुक्र यहाँ इतना कष्ट क्यों देता है?" मेरा अनुभव कहता है कि क्योंकि शुक्र यहाँ प्रेम छीनने नहीं आता, प्रेम को शुद्ध करने आता है। षष्ठ भाव सेवा, ऋण, संघर्ष, रोग और दैनिक जीवन का भाव है। यहाँ बैठा शुक्र आत्मा से पूछता है—"क्या तुम केवल सुख में प्रेम करोगे, या सेवा में भी?"** यदि प्रेम केवल सुविधा पर टिका है तो षष्ठ का शुक्र उसे तोड़ देता है। वह सिखाता है कि किसी के साथ रहना आसान है, पर किसी के दुःख का भार उठाना ही प्रेम की पहली परीक्षा है।**
अष्टम भाव में शुक्र और भी रहस्यमय हो जाता है। अष्टम भाव परिवर्तन, गहराई, मृत्यु, पुनर्जन्म, गोपनीयता और आत्मिक रूपांतरण का भाव है। यहाँ शुक्र कई बार ऐसा अनुभव कराता है कि मनुष्य का हृदय टूट जाता है। संबंध बदल जाते हैं, विश्वास टूटते हैं, विरह मिलता है, अचानक जीवन करवट लेता है। पर धीरे-धीरे समझ में आता है कि अष्टम का शुक्र प्रेम को समाप्त नहीं कर रहा था; वह प्रेम से स्वार्थ को अलग कर रहा था। जैसे स्वर्ण अग्नि में तपकर शुद्ध होता है, वैसे ही अष्टम का शुक्र आत्मा से पूछता है—"तुम्हें व्यक्ति से प्रेम था... या प्रेम के अनुभव से?"** यदि उत्तर व्यक्ति है, तो पीड़ा होगी। यदि उत्तर प्रेम है, तो वही पीड़ा भक्ति में बदलने लगेगी।**
शायद यही कारण है कि षष्ठ और अष्टम भाव का शुक्र देखने में कठिन प्रतीत होता है, पर अनेक बार वही शुक्र मनुष्य को सबसे गहरा प्रेम, सबसे बड़ी करुणा और सबसे ऊँची आध्यात्मिक परिपक्वता दे जाता है। जो शुक्र प्रथम, पंचम या सप्तम में सहज मिल जाता है, वही शुक्र षष्ठ और अष्टम में तप बनकर आता है। वहाँ वह सुख कम देता है, पर आत्मा को गहराई अधिक देता है। इसलिए मैं ऐसे शुक्र को अशुभ कहने में सदैव सावधानी रखता हूँ। वह कठोर अवश्य हो सकता है, पर उसका उद्देश्य कई बार हृदय को तोड़ना नहीं, उसे इतना विशाल बना देना होता है कि एक दिन वही हृदय किसी एक व्यक्ति का नहीं, समस्त सृष्टि का हो जाए।
यहीं चंद्र धीरे से शुक्र से पूछता है—"यदि मैं मन हूँ तो तुम कौन हो?" शुक्र मुस्कुराकर उत्तर देता है—"तुम प्रेम का अनुभव हो, मैं प्रेम की परिपक्वता हूँ।" गुरु पूछते हैं—"यदि मैं ज्ञान हूँ?" शुक्र कहते हैं—"तो मैं उस ज्ञान की करुणा हूँ, क्योंकि करुणा के बिना ज्ञान कठोर हो जाता है।" मंगल पूछते हैं—"यदि मैं शक्ति हूँ?" शुक्र उत्तर देते हैं—"तो मैं बताऊँगा कि शक्ति किसकी रक्षा करेगी।" शनि पूछते हैं—"यदि मैं समय हूँ?" शुक्र कहते हैं—"तो मैं वह सुगंध हूँ जो समय की अग्नि में जलकर भी नष्ट नहीं होती।" राहु हँसकर कहता है—"मैं आकर्षण हूँ।" शुक्र मुस्कुराते हैं—"और मैं आकर्षण की परीक्षा हूँ। यदि उसमें केवल वासना है तो वह समय के साथ बुझ जाएगी, यदि उसमें करुणा है तो वह तप बन जाएगी।" केतु आँखें बंद करके कहते हैं—"जहाँ प्रेम में 'मैं' समाप्त हो जाए, वहीं से भक्ति प्रारम्भ होती है।"
जब मैं किसी कुंडली में शुक्र को देखता हूँ तो अब सबसे पहले यह नहीं पूछता कि विवाह कब होगा या प्रेम मिलेगा या नहीं। मैं पहले यह देखता हूँ कि यह आत्मा किस भाव में प्रेम को परिपक्व करना चाहती है, किस राशि में प्रेम की भाषा सीख रही है, किस नक्षत्र में प्रेम की लय सुन रही है और अपने कर्मों से प्रेम को किस दिशा में ले जा रही है। क्योंकि राशि शुक्र को अभिव्यक्ति देती है, भाव उसे जीवन का क्षेत्र देता है, नक्षत्र उसकी सूक्ष्म मनोभूमि बताते हैं और कर्म तय करते हैं कि वही शुक्र भोग बनेगा, योग बनेगा या भक्ति।
और शायद यही शुक्र का सबसे बड़ा रहस्य है—शुक्र यह नहीं पूछता कि तुम्हें जीवन में कितना प्रेम मिला; वह यह पूछता है कि तुम्हारे प्रेम ने तुम्हें कितना बदल दिया। जिस दिन यह प्रश्न समझ में आ गया, उसी दिन शुक्र केवल कुंडली का ग्रह नहीं रहेगा; वह आत्मा का सबसे कोमल गुरु बन जाएगा।

डॉ सुशील कश्यप 

Comments

Popular posts from this blog

अज्ञात भय

वैदिक ज्योतिष और नवम भाव

वीणा योग