क्या आत्मा जन्म लेने से पहले यह भी चुनती है कि उसे किससे प्रेम करना सीखना है?

क्या आत्मा जन्म लेने से पहले यह भी चुनती है कि उसे किससे प्रेम करना सीखना है?
जब भी कोई मनुष्य पहली बार प्रेम में पड़ता है, उसके भीतर एक प्रश्न अवश्य जन्म लेता है—"यही व्यक्ति क्यों?" संसार में करोड़ों चेहरे थे, अनगिनत आवाज़ें थीं, असंख्य लोग थे, फिर भी हृदय ने उसी एक व्यक्ति को क्यों चुना? क्या यह केवल संयोग था? क्या यह केवल शरीर का आकर्षण था? क्या यह केवल मन की रचना थी? या फिर आत्मा की कोई ऐसी यात्रा भी है जिसे जन्म लेते ही हम भूल जाते हैं? भारतीय दर्शन इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं देता। उपनिषद मौन हो जाते हैं, गीता कर्म की ओर संकेत करती है, योगवसिष्ठ चेतना की बात करता है, और ज्योतिष कहती है—"उत्तर बाहर मत खोजो, पहले अपनी आत्मा को पढ़ो।" शायद इसी कारण प्रेम संसार का सबसे बड़ा रहस्य है। इसे तर्क से समझा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है। मेरा अनुभव कहता है कि कुंडली में शुक्र केवल यह नहीं बताता कि विवाह कब होगा या प्रेम मिलेगा या नहीं; वह यह भी बताता है कि तुम्हारी आत्मा प्रेम के माध्यम से कौन-सा पाठ सीखना चाहती है। क्योंकि हर मिलन केवल मिलन नहीं होता, हर बिछड़ना केवल बिछड़ना नहीं होता और हर संबंध केवल इस जन्म की कहानी भी नहीं होता। कुछ संबंध आत्मा को विस्तृत कर देते हैं, कुछ तोड़ देते हैं, कुछ अहंकार गिरा देते हैं, कुछ प्रार्थना सिखा देते हैं। तभी मैंने स्वयं से पूछा—क्या आत्मा वास्तव में जन्म लेने से पहले यह भी चुनती है कि उसे किससे प्रेम करना सीखना है? इसका उत्तर शायद किसी एक शास्त्र में नहीं मिलेगा, पर अनेक भारतीय दार्शनिक परंपराएँ यह संकेत अवश्य करती हैं कि आत्मा अपने साथ केवल कर्मों के संस्कार नहीं, सीखने योग्य प्रवृत्तियाँ भी लेकर आती है। यदि ऐसा है तो संभव है कि व्यक्ति नहीं, प्रेम का पाठ पहले से चुना गया हो। व्यक्ति उस पाठ का माध्यम बन जाए, यह जीवन की लीला हो सकती है।
कल्पना कीजिए... जन्म से पहले आत्मा एक ऐसे लोक में खड़ी है जहाँ समय अभी उत्पन्न नहीं हुआ। वहाँ न सूर्य है, न चंद्र, न पृथ्वी, न शरीर, केवल एक मौन प्रकाश है। उसी मौन में आत्मा अपने असंख्य अनुभवों को देख रही है। कहीं उसने प्रेम किया था पर क्षमा नहीं सीखी, कहीं क्षमा की थी पर समर्पण नहीं सीखा, कहीं समर्पण किया था पर विश्वास टूट गया, कहीं विश्वास बचा रहा पर अहंकार नहीं टूटा। तभी ईश्वर उसके सामने प्रकट होते हैं और पूछते हैं—"इस बार पृथ्वी पर क्या सीखना चाहती हो?" आत्मा बहुत देर तक मौन रहती है, फिर धीरे से कहती है—"प्रेम..." ईश्वर मुस्कुराते हैं। वे किसी मनुष्य का नाम नहीं बताते, किसी चेहरे की ओर संकेत नहीं करते। वे केवल शुक्र की ओर देखते हैं। शुक्र आगे आते हैं। उनके हाथ में कमल है, आँखों में करुणा है और स्वर में ऐसी शांति है जिसमें समस्त संगीत छिपा हुआ है। वे कहते हैं—"यदि प्रेम सीखना है तो केवल मिलन नहीं मिलेगा। कभी प्रतीक्षा मिलेगी, कभी विरह मिलेगा, कभी अस्वीकार मिलेगा, कभी स्वीकार मिलेगा, कभी किसी को थामना होगा, कभी किसी को मुक्त करना होगा। क्या तुम तैयार हो?" आत्मा पूछती है—"क्या इतना कठिन होगा?" शुक्र उत्तर देते हैं—"प्रेम कठिन नहीं है, अहंकार के साथ प्रेम करना कठिन है।"
यहीं से शुक्र का वास्तविक स्वरूप प्रारम्भ होता है। संसार ने शुक्र को सौंदर्य तक सीमित कर दिया, ऋषियों ने उसे रस कहा। संसार ने उसे विवाह तक सीमित कर दिया, ऋषियों ने उसे भक्ति कहा। संसार ने उसे भोग कहा, ऋषियों ने उसे समर्पण कहा। यदि शुक्र केवल भोग होता तो महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य महान तपस्वी क्यों कहलाते? यदि शुक्र केवल आकर्षण होता तो उन्हें मृतसंजीवनी विद्या क्यों प्राप्त होती? यदि शुक्र केवल इन्द्रियों का सुख होता तो भारतीय परंपरा उन्हें गुरु क्यों कहती? क्योंकि गुरु वही बन सकता है जिसने आकर्षण को तप में, इच्छा को अनुशासन में और प्रेम को करुणा में रूपांतरित कर दिया हो। यहीं मुझे लगता है कि ज्योतिष का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह हुआ कि हमने शुक्र को केवल विवाह और विलासिता का ग्रह बना दिया। वास्तव में शुक्र वह ग्रह है जो पूछता है—"तुम किसके लिए अपना अहंकार छोड़ सकते हो?" क्योंकि जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं प्रेम जन्म लेता है और जहाँ प्रेम परिपक्व होता है, वहीं भक्ति प्रारम्भ होती है।
मैंने अनेक कुंडलियों में देखा है कि एक ही शुक्र दो व्यक्तियों के जीवन में दो बिल्कुल अलग कथाएँ लिख देता है। किसी को प्रेम मिल जाता है पर वह प्रेम उसे स्वार्थी बना देता है। किसी को प्रेम नहीं मिलता, पर वही विरह उसे संत बना देता है। किसी का विवाह सफल होता है पर भीतर रिक्तता रहती है। कोई जीवन भर अकेला रहता है, फिर भी उसके भीतर प्रेम का स्रोत कभी सूखता नहीं। तब समझ में आता है कि शुक्र व्यक्ति नहीं चुनता, चेतना चुनता है। राशि शुक्र को अभिव्यक्ति देती है, भाव उसे जीवन का क्षेत्र देते हैं, नक्षत्र उसकी सूक्ष्म लय बताते हैं और स्वयं मनुष्य के कर्म यह तय करते हैं कि वही शुक्र भोग बनेगा, योग बनेगा या भक्ति। यही कारण है कि दो व्यक्तियों का शुक्र एक ही राशि में होकर भी एक जैसा फल नहीं देता। क्योंकि ग्रह दिशा देते हैं, पर चेतना उस दिशा को कैसे जीती है, यह कर्म और परिपक्वता भी तय करते हैं।
तभी चंद्र धीरे से शुक्र से पूछता है—"यदि मैं मन हूँ, तो तुम कौन हो?" शुक्र मुस्कुराते हैं—"तुम प्रेम का अनुभव हो, मैं प्रेम की परिपक्वता हूँ।" गुरु पूछते हैं—"यदि मैं ज्ञान हूँ?" शुक्र उत्तर देते हैं—"मैं उस ज्ञान की करुणा हूँ, क्योंकि बिना करुणा का ज्ञान मनुष्य को विद्वान तो बना सकता है, महान नहीं।" शनि कहते हैं—"यदि मैं समय हूँ?" शुक्र कहते हैं—"तो मैं वह सुगंध हूँ जो समय की सबसे लंबी परीक्षा के बाद भी नहीं मिटती।" राहु कहता है—"मैं आकर्षण हूँ।" शुक्र मुस्कुराते हैं—"और मैं आकर्षण की अग्नि हूँ। यदि उसमें केवल वासना है तो वह जल जाएगी, यदि उसमें समर्पण है तो वही अग्नि भक्ति बन जाएगी।" केतु आँखें बंद करके कहते हैं—"जहाँ 'मैं' समाप्त हो जाए, वहीं प्रेम ईश्वर का मार्ग बन जाता है।"
और शायद इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि "क्या आत्मा ने जन्म से पहले किसी व्यक्ति को चुना था?" सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि "क्या आत्मा ने प्रेम का वह पाठ चुना था जो किसी व्यक्ति के माध्यम से पूरा होना था?" यदि उत्तर हाँ है, तो समझिए व्यक्ति साधन था, प्रेम साधना था और आत्मा साधक थी। तब मिलन भी प्रसाद है, विरह भी प्रसाद है। तब कोई तुम्हारे जीवन में आता है तो केवल साथ देने के लिए नहीं, कभी-कभी तुम्हें तुम्हारे भीतर छिपे प्रेम से मिलवाने के लिए भी आता है। और जब यह समझ में आने लगता है, तब प्रेम माँगना बंद हो जाता है, प्रेम बहना शुरू हो जाता है। शायद उसी दिन शुक्र कुंडली का ग्रह नहीं रहता... आत्मा का सबसे मौन गुरु बन जाता है।

डॉ सुशील कश्यप 

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