चंद्र जिस नक्षत्र में बैठा है... वही आपकी आत्मा की भावनात्मक भाषा है।"

चंद्र जिस नक्षत्र में बैठा है... वही आपकी आत्मा की भावनात्मक भाषा है।"
"लोग आपकी बातों को समझ लें, यह आवश्यक नहीं... पर आपका चंद्र जिस नक्षत्र में बैठा है, वही बताता है कि आपकी आत्मा प्रेम, पीड़ा, स्मृति, विरह और मौन को किस भाषा में महसूस करती है।"
जब कोई शिशु जन्म लेता है, तब वह कोई भाषा नहीं जानता। वह संस्कृत नहीं जानता, हिन्दी नहीं जानता, अंग्रेज़ी नहीं जानता, किसी धर्म का नाम नहीं जानता, किसी देश की सीमा नहीं जानता। फिर भी वह रोता है, मुस्कुराता है, माँ की गोद पहचान लेता है, स्पर्श को पहचान लेता है, भय को पहचान लेता है, प्रेम को पहचान लेता है। तब प्रश्न उठता है—यह कौन-सी भाषा है जिसे उसने कभी सीखा ही नहीं, फिर भी वह जानता है? शायद यही वह भाषा है जिसे ऋषियों ने चंद्र की भाषा कहा। और जब चंद्र किसी नक्षत्र में बैठता है, तब वह केवल जन्म का समय नहीं बताता; वह यह भी संकेत देता है कि आपकी आत्मा किस भावनात्मक लय में संसार को सुनती है।
मैंने वर्षों तक कुंडलियाँ देखते हुए एक बात बार-बार अनुभव की। एक ही घटना दो लोगों के जीवन में घटती है। दोनों को समान शब्द सुनने पड़ते हैं। दोनों को समान सफलता या समान असफलता मिलती है। फिर भी एक व्यक्ति कुछ ही दिनों में सामान्य हो जाता है और दूसरा वर्षों तक उसी स्मृति में जीता रहता है। क्यों? क्योंकि घटना बाहर घटती है, पर उसका अर्थ चंद्र तय करता है। और चंद्र उस अर्थ को जिस सूक्ष्म ध्वनि में बदलता है, वह उसके नक्षत्र से निकलती है। यही कारण है कि कुछ लोग प्रेम को पकड़कर रखते हैं, कुछ लोग स्मृतियों को, कुछ लोग वचनों को, कुछ लोग मौन को, कुछ लोग विरह को। हर आत्मा की अपनी एक भावनात्मक मातृभाषा होती है।
कल्पना कीजिए... जन्म से पहले आत्मा एक दिव्य आकाश के नीचे खड़ी है। वहाँ सत्ताईस प्रकाश-द्वार हैं। प्रत्येक द्वार एक नक्षत्र है। प्रत्येक नक्षत्र एक अलग गीत गा रहा है। कहीं करुणा का स्वर है, कहीं साहस का, कहीं प्रतीक्षा का, कहीं त्याग का, कहीं सेवा का, कहीं मौन का, कहीं भक्ति का। ईश्वर आत्मा से कहते हैं—"तुम पृथ्वी पर जाओगी, पर याद रखना... वहाँ पहुँचकर तुम सब भूल जाओगी। इसलिए मैं तुम्हें एक भावनात्मक भाषा देकर भेज रहा हूँ। जब भी जीवन तुम्हें तोड़ेगा, जब भी प्रेम तुम्हें बदलेगा, जब भी विरह तुम्हें रुलाएगा, तुम्हारा चंद्र उसी भाषा में तुमसे बात करेगा।"
यही कारण है कि चंद्र केवल मन नहीं है। चंद्र स्मृति है। चंद्र अनुभूति है। चंद्र वह मौन डायरी है जिसमें आत्मा अपने अनकहे आँसू लिखती रहती है। और नक्षत्र उस डायरी की लिपि है। बहुत लोग पूरी दुनिया से हँसते हुए मिलते हैं, पर रात को अकेले तकिए में मुँह छिपाकर रोते हैं। कोई पूछता भी नहीं कि दर्द कहाँ है, क्योंकि दर्द शब्दों में नहीं होता। वह चंद्र की भाषा में होता है।
मेरा अनुभव कहता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं कि लोग उसे छोड़ देते हैं। सबसे बड़ा दुःख यह है कि लोग उसकी भावनात्मक भाषा समझ नहीं पाते। कोई व्यक्ति केवल एक "कैसे हो?" सुनना चाहता था, पर उसे सलाह मिल गई। कोई केवल गले लगना चाहता था, उसे उपदेश मिल गया। कोई केवल मौन चाहता था, उसे तर्क मिल गया। कोई केवल प्रतीक्षा चाहता था, उसे निर्णय मिल गया। और यहीं आत्मा अकेली पड़ जाती है। शायद इसलिए कुछ लोग भीड़ में भी अकेले होते हैं, क्योंकि उनकी भाषा कोई पढ़ नहीं पाता।
कई बार आत्मा इसलिए नहीं रोती कि उसे प्रेम नहीं मिला। वह इसलिए रोती है क्योंकि जिसे उसने अपना सबसे गहरा सत्य सौंपा था, उसने उसकी भाषा कभी सीखी ही नहीं। संसार ने उसके शब्द सुन लिए, पर उसके मौन को कोई नहीं पढ़ सका। कुछ आँसू आँखों से नहीं गिरते, वे वर्षों तक चंद्र के भीतर जमा रहते हैं। बाहर से मनुष्य सामान्य दिखाई देता है, पर भीतर उसका चंद्र हर पूर्णिमा पर फिर उसी स्मृति के आँगन में जाकर बैठ जाता है जहाँ से वह कभी लौट ही नहीं पाया। मुझे कई बार लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख मृत्यु भी नहीं है, बिछड़ना भी नहीं है। सबसे बड़ा दुःख यह है कि पूरी उम्र बीत जाती है और कोई एक व्यक्ति भी उसकी आत्मा की भावनात्मक भाषा नहीं पढ़ पाता।"
जब चंद्र रोहिणी में बैठता है, तो आत्मा प्रेम को पोषण की भाषा में महसूस कर सकती है। जब अनुराधा में बैठता है, तो निष्ठा और भक्ति की भाषा में। जब श्रवण में बैठता है, तो सुन लिए जाने की भाषा में। जब रेवती में बैठता है, तो करुणा और विदाई की भाषा में। जब आश्लेषा में बैठता है, तो भीतर की गहराइयों और सुरक्षा की भाषा में। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति एक जैसा होगा; बल्कि यह कि हर नक्षत्र आत्मा को अनुभव करने का एक विशिष्ट भावात्मक व्याकरण देता है। यही कारण है कि दो लोग एक ही "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ" सुनकर भी अलग अनुभव करते हैं। शब्द एक हैं, पर चंद्र की भाषा अलग है।
तभी गुरु चंद्र से पूछते हैं—"यदि मैं ज्ञान हूँ, तो तुम कौन हो?" चंद्र मुस्कुराकर कहते हैं—"मैं वह आँसू हूँ जिसे ज्ञान भी कभी-कभी शब्द नहीं दे पाता।" शुक्र कहते हैं—"मैं प्रेम हूँ।" चंद्र उत्तर देते हैं—"और मैं उस प्रेम की धड़कन हूँ।" शनि कहते हैं—"मैं समय हूँ।" चंद्र कहते हैं—"और मैं समय के भीतर बची हुई स्मृति हूँ।" राहु कहता है—"मैं भ्रम हूँ।" चंद्र कहते हैं—"और मैं वही हूँ जो भ्रम टूटने के बाद भी भीतर जीवित रहता है।" केतु आँखें बंद करके कहते हैं—"जब मन शांत हो जाता है, तब चंद्र अपनी सबसे पवित्र भाषा बोलता है।"
कई बार लोग पूछते हैं—"मुझे कोई समझता क्यों नहीं?" मेरा उत्तर होता है—शायद इसलिए कि वे आपकी भाषा नहीं जानते। यहाँ भाषा का अर्थ शब्द नहीं, भाव है। हर आत्मा का प्रेम करने का ढंग अलग है। किसी की भाषा सेवा है, किसी की प्रतीक्षा, किसी की प्रार्थना, किसी की चिट्ठियाँ, किसी की खामोशी, किसी की आँखें, किसी का स्पर्श। यदि सामने वाला आपकी भाषा नहीं जानता, तो वह आपको प्रेम करते हुए भी अधूरा पढ़ेगा। और यदि कोई आपकी भाषा समझ गया, तो वह बिना कुछ कहे भी आपका दुःख सुन लेगा।
शायद इसी कारण जीवन में कभी-कभी कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो बहुत कम बोलता है, फिर भी उसके पास बैठकर लगता है जैसे वर्षों से भीतर जमा हुआ बोझ हल्का हो गया। उसने कुछ समझाया नहीं, केवल आपकी आत्मा की भाषा सुन ली। यही चंद्र का चमत्कार है।
और अंत में जब आत्मा ईश्वर के पास लौटती है, तो शायद ईश्वर उससे यह नहीं पूछते कि तुम्हें जीवन में कितना प्रेम मिला। वे केवल इतना पूछते हैं—"क्या इस जन्म में कोई ऐसा मिला जिसने तुम्हारे चंद्र की भाषा समझ ली?" यदि आत्मा मुस्कुराकर "हाँ" कह दे, तो समझिए वह जन्म व्यर्थ नहीं गया।
क्योंकि अंततः मनुष्य को धन से अधिक, सफलता से अधिक, प्रसिद्धि से अधिक, किसी ऐसे हृदय की आवश्यकता होती है जो उसके भीतर बैठी उस मौन भाषा को सुन सके जिसे वह स्वयं भी कई बार शब्दों में नहीं कह पाता।
शायद यही कारण है कि चंद्र जिस नक्षत्र में बैठा है... वही आपकी आत्मा की भावनात्मक भाषा है। और जो उस भाषा को पढ़ ले... वह केवल आपका अपना नहीं बनता, वह आपकी आत्मा का साक्षी बन जाता है।

डॉ सुशील कश्यप 

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