क्यों कुछ लोग प्रेम में टूटकर भी और सुंदर हो जाते हैं?
"हर टूटन विनाश नहीं होती। कुछ टूटनें आत्मा से अहंकार को अलग करती हैं। शुक्र जब प्रेम छीनता है, तब कई बार सौंदर्य नहीं छीनता... वह आत्मा का वास्तविक सौंदर्य प्रकट करता है।"
जब भी किसी का प्रेम टूटता है, संसार केवल आँसू देखता है। कोई कहता है समय सब ठीक कर देगा। कोई कहता है आगे बढ़ जाओ। कोई कहता है यह तो जीवन का हिस्सा है। लेकिन मैंने वर्षों तक लोगों की आँखों को पढ़ा है। मैंने देखा है कि कुछ लोग प्रेम में टूटने के बाद समाप्त नहीं होते... वे पहले से अधिक शांत, अधिक गहरे और अधिक सुंदर हो जाते हैं। तब मेरे भीतर एक प्रश्न उठा—ऐसा क्यों होता है? यदि प्रेम का टूटना केवल दुर्भाग्य है, तो उससे करुणा क्यों जन्म लेती है? यदि विरह केवल पीड़ा है, तो उसी विरह से कविता, भक्ति, संगीत और आत्मज्ञान क्यों जन्म लेते हैं? शायद इसलिए कि हर टूटन हानि नहीं होती, कुछ टूटनें आत्मा के पुनर्जन्म का द्वार होती हैं।
शुक्र को लोग केवल प्रेम का ग्रह कहते हैं, लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि शुक्र प्रेम नहीं, प्रेम की पात्रता का ग्रह है। वह यह नहीं पूछता कि तुम्हें कितना प्रेम मिला। वह पूछता है कि तुम्हारा प्रेम कितना शुद्ध था। क्या तुम किसी को इसलिए चाहते थे क्योंकि वह तुम्हारा था, या इसलिए क्योंकि उसके सुख में तुम्हारा सुख था? क्या तुम्हारा प्रेम स्वतंत्र था या उसमें अधिकार मिला हुआ था? क्या तुमने प्रेम किया था, या केवल अकेलेपन से बचने का प्रयास किया था? यही प्रश्न शुक्र पूछता है। और जब इन प्रश्नों का उत्तर भीतर से नहीं मिलता, तब जीवन कई बार एक ऐसे विरह से गुज़रता है जो मनुष्य को भीतर तक हिला देता है।
मैंने एक बात देखी है। जब प्रेम पहली बार टूटता है, तब मनुष्य सामने वाले को दोष देता है। दूसरी बार टूटता है, तब भाग्य को दोष देता है। तीसरी बार टूटता है, तब वह पहली बार स्वयं से प्रश्न पूछता है। और यहीं से उसकी यात्रा बदल जाती है। क्योंकि जो प्रश्न दूसरे से शुरू होता है, वह संघर्ष बनता है; जो प्रश्न स्वयं से शुरू होता है, वह साधना बन जाता है। शायद इसी कारण कुछ लोग टूटने के बाद कठोर हो जाते हैं और कुछ लोग करुणामय। अंतर घटना में नहीं होता, अंतर उस चेतना में होता है जो उस घटना का अर्थ समझती है।
कल्पना कीजिए... एक कुम्हार मिट्टी का घड़ा बना रहा है। बाहर से देखने वाला सोचता है कि वह मिट्टी को बार-बार मार क्यों रहा है। लेकिन कुम्हार जानता है कि बिना उन चोटों के घड़ा आकार नहीं लेगा। मुझे कई बार लगता है कि शुक्र भी ऐसा ही करता है। वह जिस आत्मा को प्रेम का पात्र बनाना चाहता है, उसे पहले विरह की भट्ठी से गुज़ारता है। क्योंकि जिसने कभी खोया ही नहीं, वह पाने का मूल्य नहीं जानता। जिसने कभी रोया ही नहीं, वह किसी और के आँसू नहीं समझ सकता। जिसने कभी अकेलापन नहीं जिया, वह किसी और को सच्चा सहारा नहीं दे सकता।
यही कारण है कि मैंने देखा है—कुछ लोग प्रेम में टूटने के बाद पहले से अधिक सुंदर दिखाई देने लगते हैं। उनके चेहरे की चमक मेकअप की नहीं होती, उनकी आँखों की गहराई नींद की नहीं होती। वह करुणा की चमक होती है। वह समझ की गहराई होती है। वे अब जल्दी निर्णय नहीं करते, जल्दी क्रोधित नहीं होते, जल्दी किसी का उपहास नहीं उड़ाते। क्योंकि वे स्वयं दर्द की भाषा सीख चुके होते हैं। दर्द मनुष्य को कुरूप नहीं बनाता, यदि वह उसे कड़वाहट में नहीं बदलता। दर्द जब करुणा में बदल जाता है, तभी आत्मा का वास्तविक सौंदर्य प्रकट होता है।
मैंने उन लोगों को भी देखा है जो आज भी किसी पुराने संदेश को मिटा नहीं पाए। जिनके मोबाइल में वर्षों पुरानी एक तस्वीर अब भी छिपी हुई है। जो हर जन्मदिन पर चुपचाप किसी के लिए मन ही मन शुभकामना कर देते हैं, जबकि वर्षों से कोई बात नहीं हुई। कुछ लोग आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन उनका हृदय वहीं किसी अधूरी शाम में बैठा रह जाता है। वे किसी से शिकायत भी नहीं करते, क्योंकि उन्हें पता है कि प्रेम को अदालत में साबित नहीं किया जाता। रात के किसी पहर जब पूरा संसार सो रहा होता है, तब उनकी आँखें अचानक खुल जाती हैं। वे छत को देखते रहते हैं, और बिना आवाज़ के दो आँसू तकिए में समा जाते हैं। दुनिया समझती है कि समय ने सब ठीक कर दिया, लेकिन आत्मा जानती है कि कुछ लोग जीवन से नहीं जाते... वे केवल हमारी प्रार्थनाओं में बदल जाते हैं। शायद ईश्वर भी ऐसे ही टूटे हुए लोगों के सबसे अधिक निकट होते हैं। क्योंकि जिस हृदय में पहली बार गहरा विरह उतरता है, उसी हृदय में करुणा जन्म लेती है। जिसने स्वयं रात भर रोकर सुबह मुस्कुराना सीखा हो, वही किसी और के आँसुओं की भाषा समझ सकता है।
यहीं मुझे शुक्र और भक्ति का सबसे गहरा संबंध दिखाई देता है। मीरा को यदि केवल मिलन मिला होता, तो क्या वे मीरा बनतीं? राधा की महिमा केवल मिलन में नहीं, विरह में भी गाई जाती है। भारतीय भक्ति परंपरा में विरह को शाप नहीं, कई बार साधना माना गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बिछड़न दिव्य है या हर पीड़ा आवश्यक है, बल्कि यह कि मनुष्य उस पीड़ा से क्या सीखता है, यही उसके जीवन की दिशा तय करता है। शुक्र का सर्वोच्च रूप यही है—जहाँ प्रेम किसी एक व्यक्ति से आगे बढ़कर करुणा, भक्ति और सौंदर्य की व्यापक अनुभूति बन जाए।
ज्योतिष की दृष्टि से भी शुक्र का फल केवल एक योग से तय नहीं होता। उसकी राशि, नक्षत्र, भाव, दृष्टि, युति, दशा और पूरी कुंडली मिलकर उसकी कथा कहते हैं। फिर भी मैंने एक बात बार-बार अनुभव की है—जब शुक्र कठिन अनुभवों से परिपक्व होता है, तब मनुष्य का आकर्षण केवल चेहरे में नहीं रहता, उसकी उपस्थिति में आ जाता है। कुछ लोग बहुत सुंदर होते हैं, फिर भी मन उनसे जुड़ता नहीं। कुछ लोग साधारण चेहरे वाले होते हैं, लेकिन उनके पास बैठते ही मन शांत हो जाता है। यही परिपक्व शुक्र है। यह सौंदर्य त्वचा का नहीं, चेतना का होता है।
और अंत में मुझे लगता है कि ईश्वर प्रेम इसलिए नहीं तोड़ते कि मनुष्य रोए। वे कई बार इसलिए अनुमति देते हैं कि मनुष्य पहली बार यह देख सके कि वह स्वयं कौन है, जब उसके पास पकड़कर रखने के लिए कोई नहीं बचता। उसी मौन में, उसी खालीपन में, उसी विरह में आत्मा पहली बार अपने भीतर उतरती है।
शायद यही कारण है कि कुछ लोग प्रेम में टूटकर बिखरते नहीं... वे पहले से अधिक सुंदर हो जाते हैं। क्योंकि उनका चेहरा नहीं बदलता, उनका हृदय बदल जाता है। और जब हृदय सुंदर हो जाए, तब संसार का कोई दर्पण उस सौंदर्य को पूरी तरह दिखा नहीं सकता।
डॉ सुशील कश्यप
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