केतु और मौन — जब ईश्वर उत्तर देना बंद कर देते हैं, तब वास्तव में क्या सिखा रहे होते हैं?
केतु और मौन — जब ईश्वर उत्तर देना बंद कर देते हैं, तब वास्तव में क्या सिखा रहे होते हैं?
"केतु आपको संसार से नहीं काटता... वह उस शोर से अलग करता है, जिसके कारण आप अपनी आत्मा की आवाज़ सुन ही नहीं पा रहे थे।"
मनुष्य जब भी ईश्वर के सामने हाथ जोड़ता है, उसके भीतर एक छोटी-सी आशा अवश्य होती है कि कोई उत्तर मिलेगा। कोई संकेत मिलेगा। कोई चमत्कार होगा। कोई रास्ता खुलेगा। लेकिन जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य बहुत प्रार्थना करता है, बहुत रोता है, बहुत पुकारता है... और फिर भी सब कुछ मौन रहता है। न कोई उत्तर आता है, न कोई संकेत, न कोई चमत्कार। तब मन टूटने लगता है। मन कहता है—"क्या ईश्वर ने मेरी सुनना बंद कर दिया?" शायद यहीं से केतु की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है।
राहु आपको संसार की ओर ले जाता है। वह कहता है—दौड़ो, पाओ, बनो, जीतो, प्रसिद्ध हो जाओ। लेकिन केतु ठीक विपरीत दिशा में खड़ा है। वह कहता है—"जिसे तुम खोज रहे हो, वह बाहर नहीं है। इसलिए मैं बाहर के सारे उत्तर धीरे-धीरे बंद कर दूँगा।" यही कारण है कि केतु का प्रभाव कई बार ऐसा अनुभव कराता है जैसे जीवन में पहले जो चीज़ें आनंद देती थीं, वे अब वैसी नहीं रहीं। जिन लोगों से बातें करके मन भर जाता था, अब वही बातें खाली लगने लगती हैं। भीड़ में भी अकेलापन महसूस होता है। सफलता मिलती है, पर भीतर कोई उत्सव नहीं होता। यही केतु का मौन है।
मैंने विगत समय मे कुंडलियाँ देखते हुए एक बात बार-बार अनुभव की। जिन लोगों का केतु जीवन में गहराई से सक्रिय हुआ, उन्होंने एक बात लगभग समान कही—"मुझे समझ नहीं आता, मैं पहले जैसा क्यों नहीं रहा?" यही केतु का पहला स्पर्श है। वह आपका जीवन नहीं बदलता, वह आपकी रुचियाँ बदल देता है। जो पहले महत्वपूर्ण था, वह महत्व खोने लगता है। जो पहले साधारण था, वही गहरा लगने लगता है। मनुष्य समझता है कि वह सब कुछ खो रहा है, जबकि वास्तव में वह केवल अपने भ्रम खो रहा होता है।
मेरा अनुभव कहता है कि ईश्वर हमेशा उत्तर नहीं देते। क्योंकि कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर शब्दों में नहीं दिया जा सकता। यदि कोई बच्चा समुद्र क्या है, यह पूछे, तो हजार पुस्तकें पढ़ाने से अच्छा है कि उसे एक बार समुद्र के किनारे खड़ा कर दिया जाए। उसी प्रकार आत्मा के कुछ प्रश्नों का उत्तर मौन में ही मिलता है। और उस मौन का सबसे बड़ा गुरु केतु है।
कल्पना कीजिए... आत्मा एक विशाल मरुस्थल में अकेली चल रही है। वह बार-बार आकाश की ओर देखकर पुकारती है—"प्रभु! कुछ तो कहिए।" लेकिन आकाश शांत है। वह फिर पुकारती है। फिर भी कोई उत्तर नहीं। धीरे-धीरे वह रोते-रोते थक जाती है। बैठ जाती है। पहली बार कुछ माँगना बंद कर देती है। उसी क्षण उसे अपने भीतर एक हल्की-सी ध्वनि सुनाई देती है। वह बाहर से नहीं आई थी। वह हमेशा से भीतर थी। केवल संसार का शोर इतना अधिक था कि वह कभी सुनाई ही नहीं दी। केतु बाहर के उत्तर बंद करता है... ताकि भीतर का उत्तर पहली बार सुनाई दे।
यही कारण है कि केतु को मोक्ष का ग्रह कहा गया। मोक्ष केवल मृत्यु के बाद मिलने वाली अवस्था नहीं है। मोक्ष वह क्षण भी है जब मनुष्य पहली बार यह समझ लेता है कि उसकी सबसे बड़ी कैद बाहर नहीं, उसकी इच्छाओं के भीतर थी। केतु इच्छाओं को जबरन नहीं छीनता। वह उन्हें धीरे-धीरे अर्थहीन बना देता है। इसलिए केतु की दशा में कई लोग कहते हैं—"अब कुछ भी पहले जैसा आकर्षित नहीं करता।" यह हमेशा दुर्भाग्य नहीं होता; कई बार यह चेतना का परिवर्तन भी होता है।
शास्त्रों में केतु को ध्वज कहा गया है। ध्वज स्वयं युद्ध नहीं लड़ता, पर दिशा बताता है। उसी प्रकार केतु स्वयं आपको ज्ञान नहीं देता; वह केवल उन चीज़ों से दूरी बना देता है जो ज्ञान के बीच खड़ी थीं। इसलिए जब केतु जीवन में आता है, तो कई बार मित्र कम हो जाते हैं, बातें कम हो जाती हैं, इच्छाएँ कम हो जाती हैं, योजनाएँ कम हो जाती हैं। बाहर से देखने वाले कहते हैं—"यह व्यक्ति बदल गया।" पर भीतर आत्मा पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप के निकट आ रही होती है।
मैंने कई लोगों से पूछा—"तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन कब आया?" बहुतों ने कहा—"जब मेरी कोई प्रार्थना पूरी नहीं हुई।" यह उत्तर सुनकर मुझे लगा कि शायद ईश्वर का सबसे गहरा उत्तर कभी-कभी "नहीं" भी होता है। क्योंकि यदि हर इच्छा पूरी हो जाए, तो मनुष्य कभी स्वयं को खोजने नहीं निकलेगा। केतु उसी खोज का आरम्भ है।
लेकिन सावधानी भी आवश्यक है। केतु का प्रभाव हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। उसका फल राशि, भाव, दृष्टि, युति, दशा और पूरी कुंडली पर निर्भर करता है। इसलिए यह कहना कि केतु आने का अर्थ केवल आध्यात्मिकता है, सही नहीं होगा। कुछ लोगों के लिए वह भ्रम का अंत है, कुछ के लिए दिशा बदलने का समय, कुछ के लिए भीतर उतरने का अवसर। ज्योतिष संकेत देती है; अंतिम निर्णय पूरे संदर्भ से ही किया जाता है।
और अंत में...
यदि कभी ऐसा लगे कि आपकी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिल रहा, यदि ऐसा लगे कि ईश्वर मौन हो गए हैं, यदि ऐसा लगे कि जीवन में कोई आवाज़ नहीं बची... तो तुरंत यह मत मान लीजिए कि आपको छोड़ दिया गया है।
हो सकता है ईश्वर ने बोलना बंद नहीं किया हो... उन्होंने केवल संसार का शोर कम किया हो।
क्योंकि जब गुरु बोलते हैं, तब ज्ञान मिलता है। जब शनि सिखाते हैं, तब धैर्य मिलता है। लेकिन...
जब केतु मौन हो जाता है... तब पहली बार आत्मा स्वयं से मिलती है।
शायद यही केतु का सबसे बड़ा रहस्य है—ईश्वर उत्तर देना बंद नहीं करते, वे आपको उस अवस्था तक ले जाते हैं जहाँ प्रश्न ही समाप्त होने लगते हैं। और जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाएँ... वहीं से मौन का वास्तविक प्रकाश प्रारम्भ होता है।
डॉ सुशील कश्यप
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