क्यों कुछ लोग जन्म से ही संघर्ष लेकर आते हैं? क्या यह केवल भाग्य है... या आत्मा का स्वयं चुना हुआ मार्ग?
क्यों कुछ लोग जन्म से ही संघर्ष लेकर आते हैं? क्या यह केवल भाग्य है... या आत्मा का स्वयं चुना हुआ मार्ग?
कभी आपने किसी नवजात शिशु को बहुत ध्यान से देखा है? उसकी आँखों में न कोई छल होता है, न कोई अभिमान, न कोई पाप, न कोई पुण्य दिखाई देता है। वह अभी इस संसार की भाषा भी नहीं जानता। उसने किसी का हृदय नहीं तोड़ा, किसी का अधिकार नहीं छीना, किसी को धोखा नहीं दिया। फिर भी कोई जन्म लेते ही अस्पताल की मशीनों के बीच साँस लेना सीखता है, कोई जन्म लेते ही माता-पिता का स्नेह खो देता है, कोई गरीबी की धूल में आँख खोलता है, तो कोई राजसी सुखों के बीच। उसी क्षण मनुष्य के भीतर एक प्रश्न बिजली की तरह कौंधता है—"यदि ईश्वर न्यायकारी हैं, तो यह अंतर क्यों?" यही प्रश्न युगों से मनुष्य को बेचैन करता आया है। शायद यही वह प्रश्न है जिसने वेदों को जन्म दिया, उपनिषदों को जन्म दिया और ऋषियों को मौन में बैठने पर विवश किया।
लेकिन मुझे लगता है कि हम वर्षों से एक ही प्रश्न गलत पूछ रहे हैं। हम पूछते हैं—"मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?" जबकि शायद आत्मा पूछ रही होती है—"मैं इस अनुभव से क्या सीखने आई हूँ?" इन दोनों प्रश्नों के बीच ही पूरा जीवन छिपा हुआ है। पहला प्रश्न मनुष्य को शिकायत देता है, दूसरा प्रश्न उसे जागृति देता है। पहला ईश्वर को कठघरे में खड़ा करता है, दूसरा स्वयं के भीतर दीपक जलाता है। शायद इसलिए कुछ लोग दुख में टूट जाते हैं और कुछ लोग उसी दुख से ऋषि बन जाते हैं।
वैदिक दर्शन कर्म और पुनर्जन्म की बात करता है। ज्योतिष भी संकेत देता है कि जीवन केवल इस जन्म की घटनाओं का परिणाम नहीं हो सकता। पंचम भाव पूर्व संस्कारों की चर्चा करता है, नवम भाव कृपा की, अष्टम भाव गहरे परिवर्तन की, द्वादश भाव मोक्ष और त्याग की। परंतु किसी भी व्यक्ति के दुख को देखकर यह निश्चित रूप से कहना कि "तुमने यही चुना था" उचित नहीं होगा। फिर भी एक अत्यंत गहरी आध्यात्मिक संभावना हमारे सामने खड़ी रहती है—क्या ऐसा हो सकता है कि आत्मा कुछ कठिन अनुभवों को स्वीकार करके आई हो, क्योंकि बिना उनके वह अधूरी रह जाती? यह प्रश्न उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही प्रश्न मनुष्य को भीतर की यात्रा पर भेजता है।
कल्पना कीजिए... जन्म लेने से पहले आत्मा ईश्वर के सामने खड़ी है। वहाँ न कोई शरीर है, न कोई नाम, न कोई जाति, न कोई धर्म। केवल चेतना है। ईश्वर उससे यह नहीं पूछते कि "तुम्हें कितना धन चाहिए?" वे यह भी नहीं पूछते कि "तुम्हें कितना सुंदर जीवन चाहिए?" वे केवल मुस्कुराकर पूछते हैं—"इस बार तुम क्या सीखना चाहती हो?" और शायद कोई आत्मा उत्तर देती है—"प्रभु, पिछली बार मैं शक्ति में विनम्रता भूल गई थी, इस बार मुझे विनम्र बना दीजिए।" कोई कहती है—"मैंने प्रेम तो लिया बहुत, लेकिन देना नहीं सीखा। इस बार मुझे ऐसा हृदय दीजिए जो टूटकर भी प्रेम करना न छोड़े।" कोई कहती है—"मैंने लोगों का हाथ छोड़ा था, इस बार मुझे ऐसा जीवन दीजिए जहाँ मैं किसी का सहारा बन सकूँ, चाहे उसके लिए मुझे स्वयं संघर्ष करना पड़े।" यदि ऐसा है, तो फिर संघर्ष दंड नहीं रह जाता... वह आत्मा का चुना हुआ विद्यालय बन जाता है।
मैंने अपने जीवन में एक बात बार-बार देखी है। जिन लोगों ने सबसे अधिक आँसू बहाए, वही लोग सबसे अधिक करुणामय निकले। जिन्होंने सबसे अधिक प्रतीक्षा की, वही सबसे अधिक धैर्यवान बने। जिन्हें सबसे अधिक अस्वीकार किया गया, वही दूसरों को सबसे जल्दी स्वीकार करना सीख गए। तब मुझे लगा कि ईश्वर दुख देकर आनंद नहीं लेते। वे दुख के भीतर छिपे उस मनुष्य को जन्म देना चाहते हैं जो सुख में कभी जन्म ही नहीं ले सकता था। बीज यदि मिट्टी के अंधकार में न दबे, तो अंकुर कैसे निकले? सोना यदि अग्नि में न तपे, तो आभूषण कैसे बने? और आत्मा यदि संघर्ष से न गुज़रे, तो करुणा कहाँ से आए?
यही कारण है कि कुंडली का लग्न केवल शरीर नहीं है, वह यात्रा है। शनि केवल विलंब नहीं है, वह धैर्य का विद्यालय है। राहु केवल इच्छा नहीं है, वह अधूरी प्यास का दर्पण है। केतु केवल विरक्ति नहीं है, वह स्मरण है कि आत्मा का घर कहीं और भी है। अष्टम भाव केवल संकट नहीं है, वह पुनर्जन्म का द्वार है। द्वादश भाव केवल हानि नहीं है, वह छोड़ने की कला है। पूरी कुंडली जैसे आत्मा की पाठ्य-पुस्तक है, और हर ग्रह उस पुस्तक का एक अध्याय। कोई अध्याय आसान है, कोई कठिन, लेकिन कोई भी व्यर्थ नहीं।
इसलिए यदि आज जीवन आपको वहाँ ले आया है जहाँ सब रास्ते बंद दिखाई देते हैं, जहाँ प्रार्थनाएँ भी लौटती हुई लगती हैं, जहाँ अपने भी पराये लगने लगते हैं, तो एक बार रुककर केवल इतना पूछिए—"यदि यह दंड नहीं है, तो यह मुझे क्या सिखाना चाहता है?" हो सकता है उसी क्षण आपके भीतर एक नया द्वार खुल जाए। क्योंकि कई बार जीवन बदलता नहीं... जीवन को देखने वाली दृष्टि बदल जाती है। और जब दृष्टि बदल जाती है, तब वही संघर्ष जो कल तक अभिशाप लगता था, आज साधना बन जाता है।
और अंत में... शायद भाग्य वह नहीं है जो ईश्वर ने आपके माथे पर लिख दिया। शायद भाग्य वह है जिसे आपकी आत्मा ने साहस के साथ स्वीकार किया, और जन्म लेते ही भूल गई। इसलिए जब अगली बार आप अपने जीवन के सबसे कठिन मोड़ पर खड़े हों, तो अपने आँसुओं से केवल इतना कहिए—"यदि यह मार्ग मैंने चुना है, तो इसे पार करने की शक्ति भी मेरे भीतर कहीं अवश्य होगी।" क्योंकि ईश्वर किसी आत्मा को पर्वत पर चढ़ने के लिए नहीं भेजते, जब तक उसके भीतर पर्वत से ऊँचा साहस न रख दिया हो। यही शायद जीवन का सबसे मौन, सबसे गहरा और सबसे सुंदर रहस्य है।
डॉ सुशील कश्यप
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