गुरु की शुभता किसे मिलता है और किसे नहीं???
मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि बृहस्पति शुभ ग्रह हैं, इसलिए वे सभी को बचा लेते हैं। वर्षों से हजारों कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद मेरे अनुभव ने मुझे एक अलग सत्य सिखाया। गुरु कभी किसी को बिना कारण नहीं बचाते और न ही किसी को बिना कारण छोड़ते हैं। गुरु दया के ग्रह अवश्य हैं, परन्तु दया और पक्षपात दोनों अलग-अलग बातें हैं। ईश्वर करुणामय हैं, लेकिन वे अधर्म का संरक्षण नहीं करते। यही नियम बृहस्पति का भी है। इसीलिए मैंने अनेक कुंडलियों में देखा—किसी का नीच का गुरु होकर भी जीवन दिव्य बन गया, और किसी का उच्च का गुरु होकर भी जीवन धीरे-धीरे बिखर गया। तब मुझे समझ आया कि गुरु ग्रह नहीं हैं, वे आपकी चेतना का दर्पण हैं। वे यह नहीं देखते कि आपकी कुंडली में उनकी स्थिति क्या है, वे यह देखते हैं कि आपके भीतर उनके ज्ञान का सम्मान कितना है। लोग समझते हैं गुरु भाग्य हैं, पर मेरा अनुभव कहता है—गुरु भाग्य नहीं, पात्रता हैं। भाग्य तो उसके बाद आता है। जिस पात्र में सत्य नहीं ठहर सकता, उसमें गुरु की कृपा भी अधिक समय तक नहीं ठहरती।
सबसे पहले यह समझिए कि बृहस्पति का सम्बन्ध केवल ज्ञान से नहीं है। ज्ञान तो राहु के पास भी हो सकता है। जानकारी आज मशीनों के पास भी है। परन्तु ज्ञान का सही उपयोग करने का विवेक केवल गुरु के पास है। इसलिए गुरु की पहली परीक्षा पुस्तकों से नहीं होती, निर्णयों से होती है। आपने कितनी पुस्तकें पढ़ीं, इससे गुरु प्रसन्न नहीं होते। आपने उनमें से कितना जीवन में उतारा, इससे गुरु प्रसन्न होते हैं। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो गीता कंठस्थ सुनाते हैं, पर अपने माता-पिता का अपमान करते हैं। वे वेदों की व्याख्या करते हैं, पर अपने कर्मचारियों का शोषण करते हैं। ऐसे लोगों की कुंडली में गुरु चाहे जितने बलवान हों, एक समय के बाद उनका तेज घटने लगता है। क्योंकि गुरु का सबसे बड़ा अपमान ज्ञान का व्यापार नहीं, ज्ञान का दुरुपयोग है।
गुरु किसे बचाता है? गुरु उसे बचाता है जो गलती करने के बाद भी सत्य स्वीकार कर ले। गुरु उसे बचाता है जो गिरकर भी अहंकार नहीं पालता। गुरु उसे बचाता है जो अपने लाभ से पहले धर्म को रखता है। गुरु उसे बचाता है जो अपने ज्ञान से किसी का जीवन प्रकाशित करता है। और गुरु किसे छोड़ देता है? गुरु उसे छोड़ देता है जो अपने ज्ञान से दूसरों को दबाने लगे, जो अपनी सफलता को अपना ही सामर्थ्य समझने लगे, जो गुरु, माता-पिता, आचार्य और परंपरा का अपमान करने लगे। याद रखिए—शनि पाप का दंड देते हैं, लेकिन गुरु पहले विवेक वापस ले लेते हैं। और जिस मनुष्य का विवेक चला गया, उसका पतन निश्चित है। इसलिए गुरु का सबसे बड़ा दंड बीमारी, गरीबी या अपमान नहीं है। गुरु का सबसे बड़ा दंड है—सही और गलत का भेद खो देना।
अब भाव अपनी कथा कहते हैं। यदि गुरु प्रथम भाव में हैं तो ईश्वर ने आपको केवल जीवन नहीं दिया, लोगों का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी दी है। यहाँ यदि अहंकार आया तो पतन भी सबसे बड़ा होगा। द्वितीय भाव में गुरु कहते हैं—तुम्हारी वाणी तुम्हारा पुण्य है। झूठ, कटुता और अपमान से द्वितीय का गुरु धीरे-धीरे मौन हो जाता है। तृतीय में गुरु कहते हैं—साहस का उपयोग संरक्षण के लिए करो, प्रदर्शन के लिए नहीं। चतुर्थ में गुरु माँ, करुणा और संस्कार की रक्षा करते हैं। जिसने अपने घर के बड़ों का सम्मान खो दिया, उसका चतुर्थ गुरु भीतर से सूखने लगता है। पंचम में गुरु पूर्व जन्म का पुण्य खोलते हैं, परन्तु साथ ही यह भी देखते हैं कि उस पुण्य का उपयोग केवल अपनी उन्नति के लिए होगा या समाज के लिए भी। षष्ठ में गुरु सेवा की परीक्षा लेते हैं। यदि सेवा बोझ लगने लगे तो वही गुरु रोग के माध्यम से मनुष्य को विनम्र बनाते हैं। सप्तम में गुरु विवाह को धर्म बनाते हैं। यहाँ गुरु पूछते हैं—क्या तुम प्रेम में भी सत्यवान हो? अष्टम में गुरु रहस्य देते हैं, पर हर रहस्य योग्य व्यक्ति को ही मिलता है। जिसने शक्ति को प्रदर्शन बना लिया, अष्टम का गुरु उससे अपने रहस्य छीन लेता है। नवम में गुरु स्वयं धर्म हैं। यहाँ वे सबसे अधिक कठोर होते हैं क्योंकि धर्म के नाम पर किया गया अधर्म सबसे बड़ा अपराध है। दशम में गुरु कर्म को पूजा बनाते हैं। यदि कर्म केवल धन का साधन बन गया, तो दशम का गुरु अवसर वापस ले सकता है। एकादश में गुरु लाभ देते हैं, पर पूछते हैं—क्या यह लाभ केवल तुम्हारे लिए है? द्वादश में गुरु त्याग सिखाते हैं। जिसने त्याग नहीं सीखा, वह मोक्ष के द्वार पर पहुँचकर भी लौट सकता है।
अब राशियाँ अपनी भाषा बोलती हैं। मेष का गुरु साहस बचाता है, पर क्रोध नहीं। वृषभ का गुरु संपत्ति बचाता है, पर लोभ नहीं। मिथुन का गुरु बुद्धि बचाता है, पर छल नहीं। कर्क का गुरु परिवार बचाता है, पर भावनात्मक स्वार्थ नहीं। सिंह का गुरु सम्मान बचाता है, पर अभिमान नहीं। कन्या का गुरु सेवा बचाता है, पर आलोचना नहीं। तुला का गुरु न्याय बचाता है, पर दिखावटी संतुलन नहीं। वृश्चिक का गुरु साधना बचाता है, पर नियंत्रण की भूख नहीं। धनु का गुरु सत्य बचाता है, पर कट्टरता नहीं। मकर का गुरु कर्म बचाता है, पर निर्दय महत्वाकांक्षा नहीं। कुंभ का गुरु समाज बचाता है, पर विद्रोह के नाम पर अराजकता नहीं। मीन का गुरु करुणा बचाता है, पर पलायन नहीं। इसलिए राशि केवल गुरु की अभिव्यक्ति बदलती है, गुरु का धर्म नहीं।
अब नक्षत्रों का रहस्य समझिए, क्योंकि यहीं से गुरु की कृपा का वास्तविक स्वरूप दिखाई देता है। पुनर्वसु में गुरु बार-बार अवसर देते हैं, क्योंकि वहाँ अदिति का अनंत क्षमाभाव है। पुष्य में गुरु पालन करते हैं, पर पालन का अर्थ अधिकार नहीं, संरक्षण है। विशाखा में गुरु लक्ष्य देते हैं, लेकिन यदि लक्ष्य धर्म से हट गया तो वही ऊर्जा महत्वाकांक्षा की आग बन जाती है। पूर्वाभाद्रपद में गुरु तपस्या कराते हैं। यहाँ कृपा भी अग्नि के भीतर छिपी होती है। रेवती में गुरु अंततः करुणा सिखाते हैं—जो जितना बड़ा होता है, वह उतना ही विनम्र होता है। इसलिए नक्षत्र बताते हैं कि गुरु आपको किस मार्ग से शिक्षित करेंगे—प्रेम से, परीक्षा से, प्रतीक्षा से या त्याग से।
बहुत लोग पूछते हैं—यदि गुरु इतने महान हैं तो फिर अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है? मेरा उत्तर है—गुरु आपको हमेशा बचाते हैं, पर हमेशा उस रूप में नहीं जैसा आप चाहते हैं। कभी वे धन बचाते हैं, कभी चरित्र। कभी प्रतिष्ठा बचाते हैं, कभी आत्मा। कई बार वे नौकरी छीन लेते हैं ताकि अधर्म से बच जाएँ। कई बार वे संबंध तोड़ देते हैं ताकि आपका धर्म बचा रहे। कई बार वे सफलता रोक देते हैं क्योंकि यदि वह सफलता अभी मिल गई तो आपका अहंकार आपकी चेतना से बड़ा हो जाएगा। इसलिए हर रुकावट दंड नहीं होती, कई बार वह गुरु की सबसे बड़ी कृपा होती है।
मैंने अपने जीवन में एक बात गहराई से अनुभव की है—जब तक मनुष्य गुरु को केवल लाभ देने वाला ग्रह समझता है, तब तक वह गुरु को जानता ही नहीं। गुरु का कार्य आपको अमीर बनाना नहीं है, योग्य बनाना है। यदि योग्यता आ गई तो धन, सम्मान, संबंध और यश समय आने पर स्वयं आ जाएँगे। लेकिन यदि योग्यता नहीं आई तो संसार की सारी उपलब्धियाँ भी भीतर का शून्य नहीं भर पाएँगी।
और अंत में एक ऐसा सूत्र जिसे मैं अपने हर शिष्य से कहता हूँ—बृहस्पति आपको आपके पापों से नहीं बचाते, वे आपको पाप करने से पहले रोकना चाहते हैं। यदि आपने उनके संकेतों की उपेक्षा की, यदि आपने अपने विवेक की आवाज़ दबा दी, यदि आपने धर्म को सुविधा के लिए बेच दिया, तो फिर गुरु भी मौन हो जाते हैं। और जब गुरु मौन हो जाते हैं, तब राहु आपके निर्णय लेने लगता है। वही मनुष्य का वास्तविक पतन है।
इसलिए अगली बार जब आप अपनी कुंडली में बृहस्पति को देखें, तो यह मत पूछिए—"गुरु मुझे क्या देंगे?" पहले यह पूछिए—"क्या मैं अभी भी गुरु की कृपा के योग्य हूँ?" क्योंकि गुरु का सबसे बड़ा आशीर्वाद धन नहीं, विवेक है। सबसे बड़ा वरदान सफलता नहीं, धर्म है। और सबसे बड़ी रक्षा मृत्यु से नहीं, अधर्म से होती है। जिस दिन यह बात समझ में आ गई, उसी दिन समझिए कि आपकी कुंडली का बृहस्पति पहली बार वास्तव में जाग गया।
डॉ सुशील कश्यप
Comments
Post a Comment