बुध बताता है कि आपकी आत्मा दुनिया को कैसे समझाती है... और ईश्वर आपको कैसे समझाते हैं।"

"बुध बताता है कि आपकी आत्मा दुनिया को कैसे समझाती है... और ईश्वर आपको कैसे समझाते हैं।"
"बुध केवल आपकी बुद्धि नहीं है... वह ईश्वर और आपकी आत्मा के बीच बैठा हुआ वह मौन दूत है, जो हर अनुभव का अर्थ आपको समझाने का प्रयास करता है।"
जब भी कोई व्यक्ति अपनी कुंडली में बुध को देखता है, तो उसके मन में सबसे पहले यही आता है कि यह बुद्धि का ग्रह है, वाणी का ग्रह है, व्यापार का ग्रह है, शिक्षा का ग्रह है। यह बात असत्य नहीं है, परन्तु अधूरी अवश्य है। यदि बुध केवल गणित और व्यापार का ग्रह होता, तो महर्षि पराशर उसे इतना महत्व क्यों देते? यदि बुध केवल बोलना सिखाता, तो वे ऋषि जो वर्षों तक मौन रहे, संसार के सबसे बड़े ज्ञानी कैसे बने? यदि बुध केवल शब्द होता, तो भगवान श्रीकृष्ण का गीता उपदेश केवल शब्दों का संग्रह रह जाता; वह अर्जुन की चेतना को कभी बदल ही नहीं पाता। तब समझ में आता है कि बुध शब्द नहीं है, अर्थ है। वाणी नहीं है, अनुभूति का अनुवाद है।
मेरा अनुभव कहता है कि संसार में सबसे कठिन कार्य बोलना नहीं है, सही अर्थ समझना है। दो व्यक्ति एक ही वाक्य सुनते हैं। एक अपमान समझ लेता है, दूसरा प्रेरणा। दो लोग एक ही घटना से गुजरते हैं। एक टूट जाता है, दूसरा बदल जाता है। दो लोग एक ही गुरु के पास बैठते हैं। एक को केवल कथा सुनाई देती है, दूसरे को आत्मज्ञान का द्वार खुल जाता है। क्यों? क्योंकि घटना बाहर घटती है, उसका अर्थ बुध तय करता है।
यही कारण है कि बुध को केवल बुद्धि कहना उसके वास्तविक स्वरूप को छोटा कर देना है। बुध चेतना का अनुवादक है। आपकी आत्मा जो अनुभव करती है, बुध उसे विचार बनाता है। विचार को शब्द बनाता है। शब्द को कर्म बनाता है। और कर्म को संसार तक पहुँचाता है। लेकिन यही बुध दूसरी दिशा में भी कार्य करता है। ईश्वर जो आपको सिखाना चाहते हैं, वे भी सीधे आपकी आत्मा तक नहीं पहुँचता। वह जीवन की घटनाओं में छिप जाता है। और उन घटनाओं का अर्थ समझाने का कार्य भी बुध ही करता है।
कल्पना कीजिए... जन्म लेने से पहले आत्मा ईश्वर से पूछती है—"प्रभु, पृथ्वी पर जाकर मैं सब भूल जाऊँगी। तब जब मैं भटकूँगी, तब आप मुझे कैसे समझाएँगे?"
ईश्वर मुस्कुराते हैं।
वे कहते हैं—"मैं हर बार आकाश से आवाज़ नहीं दूँगा। मैं तुम्हारे सामने बार-बार वही परिस्थितियाँ भेजूँगा। कभी एक गुरु के रूप में, कभी एक मित्र के रूप में, कभी एक शत्रु के रूप में, कभी एक असफलता के रूप में, कभी एक बीमारी के रूप में, कभी एक प्रेम के रूप में और कभी एक विरह के रूप में। लेकिन इन सबका अर्थ तुम्हें समझाने के लिए मैं तुम्हारे भीतर बुध को बैठाकर भेज रहा हूँ। यदि तुम्हारा बुध जागृत होगा, तो तुम मेरी शिक्षा पहचान लोगे। यदि तुम्हारा बुध भ्रमित होगा, तो तुम मुझे दंड देने वाला समझोगे।"
यही बुध का सबसे बड़ा रहस्य है।
बुध केवल यह नहीं बताता कि तुम लोगों से कैसे बात करते हो... बुध यह भी बताता है कि ईश्वर तुमसे किस भाषा में बात करते हैं।
मैंने वर्षों तक हजारों कुंडलियाँ देखते हुए एक बात अनुभव की है। कुछ लोग जीवन भर मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, मंत्र पढ़ते हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि ईश्वर उनसे कभी बात नहीं करते। दूसरी ओर कुछ लोग किसी साधारण-सी घटना से पूरा जीवन बदल लेते हैं। कोई एक बच्चे की मुस्कान देखकर बदल गया। कोई एक भिखारी को देखकर बदल गया। कोई एक असफलता के बाद पूरी तरह बदल गया। तब मुझे लगा कि अंतर ईश्वर में नहीं था। अंतर बुध में था। एक व्यक्ति घटना देख रहा था। दूसरा उसी घटना में ईश्वर का संदेश पढ़ रहा था।
बुध का संबंध केवल वाणी से नहीं है, श्रवण से भी है। जो सुनना नहीं जानता, वह बोलना भी नहीं जानता। यही कारण है कि जिनका बुध परिपक्व होता है, वे उत्तर देने से पहले सुनते हैं। वे निर्णय लेने से पहले समझते हैं। वे तर्क करने से पहले अनुभव करते हैं। क्योंकि उन्हें पता होता है कि हर शब्द के पीछे एक अदृश्य पीड़ा भी होती है।
मैंने यह भी देखा है कि जब बुध पर राहु का प्रभाव होता है, तब मनुष्य कई बार भ्रम को ज्ञान समझ बैठता है। उसे लगता है कि जितनी अधिक जानकारी है, उतना अधिक ज्ञान है। लेकिन जानकारी और ज्ञान में उतना ही अंतर है जितना मानचित्र और वास्तविक यात्रा में। राहु बुध को चतुर बना सकता है, पर गुरु ही बुध को प्रज्ञा देता है। और जब बुध पर गुरु की कृपा होती है, तब मनुष्य केवल शब्द नहीं पढ़ता, शब्दों के पीछे बैठा हुआ मौन भी पढ़ लेता है।
जब बुध पर शनि की दृष्टि आती है, तब जीवन कई बार मनुष्य को बोलने से अधिक चुप रहना सिखाता है। हर उत्तर तुरंत नहीं दिया जाता। हर सत्य तुरंत नहीं बोला जाता। कुछ सत्य समय माँगते हैं। इसलिए शनि बुध को धैर्य सिखाते हैं।
और जब बुध केतु से जुड़ता है, तब सबसे अद्भुत परिवर्तन होता है। तब शब्द कम होने लगते हैं और अनुभव बढ़ने लगते हैं। मनुष्य पहली बार समझता है कि हर प्रश्न का उत्तर शब्द नहीं होता। कुछ उत्तर केवल मौन होते हैं।
इसीलिए मुझे लगता है कि संसार का सबसे बड़ा संकट अज्ञान नहीं है। संसार का सबसे बड़ा संकट गलत अर्थ निकालना है। कोई व्यक्ति आपको छोड़कर चला गया, आपने समझ लिया कि आप प्रेम के योग्य नहीं थे। जबकि ईश्वर शायद आपको आसक्ति से मुक्त कर रहे थे। व्यापार में हानि हुई, आपने समझ लिया कि भाग्य समाप्त हो गया। जबकि जीवन शायद दिशा बदल रहा था। बीमारी आई, आपने समझ लिया कि ईश्वर दंड दे रहे हैं। जबकि शायद शरीर पहली बार आपको अपनी सीमाओं का बोध करा रहा था। घटना वही थी... अर्थ अलग था। और यही बुध का क्षेत्र है।
कई बार लोग पूछते हैं—"ईश्वर संकेत क्यों नहीं देते?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
शायद प्रश्न यह नहीं है कि ईश्वर संकेत देते हैं या नहीं।
प्रश्न यह है कि क्या हमारा बुध अभी भी संकेतों की भाषा समझता है?
क्योंकि ईश्वर कभी शब्दों में कम बोलते हैं। वे उगते हुए सूर्य में बोलते हैं। किसी माँ की आँखों में बोलते हैं। किसी संत की खामोशी में बोलते हैं। किसी असफलता की चोट में बोलते हैं। किसी बच्चे की हँसी में बोलते हैं। किसी विरह की पीड़ा में बोलते हैं। और कभी-कभी... वे बिल्कुल मौन रहकर भी बहुत कुछ कह देते हैं।
और अंत में मुझे लगता है कि बुध का सबसे बड़ा रहस्य यही है—
जिस दिन आपकी बुद्धि तर्क से ऊपर उठकर अर्थ को सुनना सीख जाती है, उसी दिन आपको पता चलता है कि ईश्वर कभी मौन नहीं थे। मौन केवल हमारी चेतना पर था।
बुध आपकी वाणी का ग्रह नहीं है। वह ईश्वर और आपकी आत्मा के बीच चलने वाला वह अदृश्य संवाद है, जो हर दिन, हर क्षण, हर अनुभव में आपको पुकार रहा है। प्रश्न केवल इतना है—क्या आपने उसे सुनना सीख लिया है?

डॉ सुशील कश्यप 

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